समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव का पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का कार्ड पिछले लोकसभा चुनाव में चल गया था। वे पीडीए के जरिए भाजपा के हिंदुत्व कार्ड को रोकने में कामयाब रहे थे। तभी उनकी पार्टी राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से सबसे ज्यादा 37 सीटों पर जीती। उनकी सहयोगी कांग्रेस को भी छह सीटें मिल गईं। अब विधानसभा चुनाव चुनाव की तैयारी में भी अखिलेश यादव पीडीए पर ही फोकस बनाए हुए हैं। लेकिन असलियत अलग है। उनकी पार्टी के नेता भी मान रहे हैं कि अखिलेश यादव ने भले पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक की बात कही है लेकिन उनका असली निशाना पिछड़ा और दलित पर है यानी हिंदू बहुजन पर है। वे अल्पसंख्यक को किनारे कर देंगे। उन्होंने कहा भी है कि इस बार विधानसभा चुनाव में ने 14 सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवार उतारेंगे। ध्यान रहे पहले से 84 सीटें दलित के लिए और दो सीटें आदिवासी के लिए आरक्षित हैं। अगर वे 14 और दलित उम्मीदवार उतारते हैं तो इस तरह एससी, एसटी के एक सौ उम्मीदवार होंगे।
पिछली बार विधानसभा चुनाव में बसपा प्रमुख मायावती ने एक सौ मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। मुस्लिम वोट सपा को ही गया। इसलिए अखिलेश मुस्लिम उम्मीदवार घटाएंगे और हो सकता है कि यादव उम्मीदवार भी घटाएं, जैसा उन्होंने लोकसभा चुनाव में किया था। उन्होंने लोकसभा चुनाव में अपने कोटे की 63 सीटों में से सिर्फ पांच यादव उम्मीदवार दिए थे। कांग्रेस कोटे की 17 सीट में से एक भी यादव उम्मीदवार नहीं था। यानी विपक्ष ने 80 में से पांच य़ादव उम्मीदवार दिए और पांचों मुलायम सिंह के परिवार से थे। खुद अखिलेश यादव के अलावा उनकी पत्नी डिंपल यादव, चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव और दो भतीजे अक्षय व आदित्य यादव चुनाव लड़े थे। इसके बावजूद उनको यादव और मुस्लिम वोट थोक में मिला। विधानसभा चुनाव में भी वे इस दांव को आजमाएंगे। मुस्लिम और यादव की बजाय वे पिछड़ा, दलित और सवर्ण हिंदुओं को प्राथमिकता देंगे।


