बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ऐसे नहीं थे। वे मुफ्त में वस्तुएं और सेवाएं देने के खिलाफ थे। उन्होंने स्कूल जाने वाली लड़कियों को साइकिल और पोशाक देने की योजना शुरू कर की थी, जो कि एक लक्षित योजना थी और इसका बड़ा लाभ बहुत बड़े वर्ग को मिला था। लेकिन वे कभी भी मुफ्त बिजली, पानी या अनाज बांटने के पक्ष में नहीं रहे थे। उन्होंने महिलाओं को सशक्त बनाया था और उनको आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया था। अब नीतीश कुमार अपनी आखिरी राजनीतिक पारी खेल रहे हैं और इस बार वे उस रास्ते पर चल रहे हैं, जिस रास्ते पर देश की दूसरी तमाम पार्टियां चलती हैं। भाजपा और कांग्रेस ने मुफ्त की चीजें और सेवाएं बांटने का जो रास्ता चुना है उसी पर नीतीश भी चल रहे हैं।
उनकी सरकार ने एक अगस्त से मुफ्त बिजली की योजना लागू कर दी। उनकी योजना दिल्ली की अरविंद केजरीवाल की योजना से अलग है। वे बिहार के हर नागरिक को 125 यूनिट बिजली फ्री देंगे। जिनके यहां इससे ज्यादा बिजली जलती है वे इससे ऊपर के यूनिट का ही भुगतान करेंगे। यानी यह यूनिवर्सल योजना है। इसी तरह नीतीश ने युवाओं को इंटर्नशिप के नाम पर छह छह हजार रुपए देने की घोषणा की है। आंगनवाड़ी सेविकाओं को फोन खरीदने के लिए 11 हजार रुपए देने की घोषणा की है। दीदी की रसोई में अब 40 की बजाय 20 रुपए में थाली मिलेगी। इसके अलावा उन्होंने हर वर्ग का वेतन व पेंशन बढ़ा दिया है। आशा व ममता कार्यकर्ताओं का मानदेय दोगुना हो गया है तो मिड डे मील बनाने वाले रसोइयों का मानदेय भी दोगुना किया है। उच्चतर स्कूलों में नाइट गार्ड की ड्यूटी करने वाले और स्कूलों के शारीरिक प्रशिक्षकों का मानदेय भी दोगुना किया है। सामाजिक सुरक्षा पेंशन को एक बार में तीन गुना कर दिया गया।


