ममता बनर्जी की पार्टी के नेताओं को लेकर भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व दुविधा में है। वैसे तो उद्धव ठाकरे की पार्टी के सांसदों को भी भाजपा ने सीधे अपने साथ लेने की बजाय एकनाथ शिंदे की पार्टी में शामिल कराया। लेकिन वहां का मामला अलग है। पश्चिम बंगाल में मामला दूसरा है। भाजपा नहीं चाहती है कि ममता बनर्जी के बहुत करीब रहे नेताओं को सीधे भाजपा में शामिल कराया जाए। इससे जनता के बीच धारणा बदलने का खतरा है। तभी उनकी पार्टी के 28 में से 20 सांसदों को सीधे भाजपा में लेकर अपना बहुमत बनाने की बजाय भाजपा ने घुमावदार रास्ता अख्तियार किया। उसने त्रिपुरा की नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया में इन 20 सांसदों को शामिल कराया। संसद के अंदर इनके अलग बैठने की व्यवस्था की। इसी तरह पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के 80 में से करीब 60 विधायकों का अलग गुट बनवाया गया और उसे असली पार्टी का दर्जा दिलाने का प्रयास चल रहा है।
इससे उलट भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस के तीन राज्यसभा सांसदों को सीधे अपनी टिकट देकर चुनवाया है। चौथी सांसद कोयल मल्लिक का भी इस्तीफा हो गया है और उनकी सीट पर भी उपचुनाव होगा तो वे सीधे भाजपा की टिकट से राज्यसभा पहुंचेंगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि राज्यसभा सांसदों में ज्यादातर ऐसे हैं, जिन्होंने भाजपा या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ आपत्तिजनक बयान नहीं दिए हैं। और दूसरी बात यह है कि ममता की पार्टी के ज्यादातर राज्यसभा सासंद किसी घोटाले या विवाद में नहीं रहे हैं। तभी सुखेंदु शेखर रॉय या सुष्मिता देब या प्रकाश चिक बड़ाइक को पार्टी में लेने में भाजपा को समस्या नहीं आई। दूसरी ओर जो विधायक या लोकसभा सांसद हैं उन्होंने भाजपा और उसके शीर्ष नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक बयानबाजी की है और किसी न किसी विवाद में घिरे रहे हैं। इसलिए उनके लिए घुमावदार रास्ता अख्तियार किया गया है।
लेकिन सवाल है कि क्या हमेशा यही स्थिति बनी रहेगी? य़ह सवाल इसलिए है क्योंकि ममता बनर्जी की पार्टी छोड़ने वाले नेता चाहते हैं कि वे भाजपा से जुड़ें और उनके हितों की रक्षा की जाए। जानकार सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की पश्चिम बंगाल यात्रा के दौरान इस पर चर्चा हुई है। आगे भी इस पर चर्चा होगी। बताया जा रहा है कि अमित शाह अपनी पार्टी के प्रदेश नेताओं से ममता की पार्टी छोड़ने वाले हर नेता के बारे में फीडबैक ले रहे हैं। यह सूची बनाई जा रही है कि किसके साथ क्या समस्या है। समस्या का मतलब कि किसके ऊपर क्या आरोप लगे हैं और उसमें उसके बचने की संभावना कितनी है। यह भी जानकारी ली जा रही है कि किस नेता को पार्टी में लेने पर जनता के बीच खराब प्रतिक्रिया होगी। ध्यान रहे पिछले दिनों सयानी घोष का लोगों ने बड़ा विरोध किया था। वे ममता बनर्जी की जबरदस्त समर्थक नेता थीं लेकिन पार्टी के चुनाव हारते ही उन्होंने पाला बदल लिया। भाजपा को लग रहा है कि ऐसे नेताओं की वजह से प्रदेश में भाजपा की छवि बिगड़ेगी। उनका तर्क है कि इनके बगैर ही जब बंगाल की जनता ने भाजपा को इतना बड़ा बहुमत देकर चुन दिया तो फिर इन नेताओं को साथ लेने की जरुरत नहीं है। प्रदेश भाजपा के नेता इस बात से भी आशंकित हैं कि ममता के विधायकों और सांसदों के पार्टी में आने से अगले चुनाव में उनकी टिकट पर संकट आएगा। भाजपा को इस मामले में भी अपने नेताओं को आश्वस्त करना है।
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