राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

तृणमूल और शिव सेना की ठीक नहीं तुलना

पिछले कई दिनों से यह तुलना हो रही है कि जैसे शिव सेना टूटी और एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे की पार्टी पर कब्जा कर लिया उसी तरह तृणमूल कांग्रेस में भी टूट हुई है। दोनों के टूटनें में कई समानताएं हैं लेकिन एक ऐसी असमानता है, जो इस पूरी तुलना को गलत कर देती है। समानता यह है कि दोनों पार्टियों के सांसद और विधायक टूट गए। दो तिहाई से ज्यादा विधायकों ने अलग गुट की मान्यता हासिल कर ली है और दो तिहाई सांसद भी अलग होकर एक पार्टी में शामिल हो गए हैं। यह समानता भी है कि अलग होने के बाद बागी विधायक और सांसद तृणमूल कांग्रेस के नाम, झंडे, चुनाव चिन्ह पर भी नजर लगाए हुए हैं। महाराष्ट्र में एक फर्क यह रहा कि एकनाथ शिंदे ने कई चीजें उद्धव ठाकरे के पास छोड़ दीं। शिव सेना का मुख्यालय और ‘सामना’ अखबार उसमें शामिल है। शिव सेना के खजाने पर भी उन्होंने दावा नहीं किया। लेकिन पश्चिम बंगाल में बागी नेताओं की नजर खजाने पर भी है। एक विधायक की शिकायत पर तृणमूल कांग्रेस के तीन खाते सील कर दिए हैं, जिनमें कई सौ करोड़ रुपए हैं।

लेकिन दोनों में फर्क यह है कि ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक हैं, जबकि उद्धव ठाकरे शिव सेना के संस्थापक नहीं थे। शिव सेना की स्थापना बाल ठाकरे ने की थी। एक समय उनके भतीजे राज ठाकरे को असली उत्तराधिकारी माना जाता था। लेकिन पुत्र मोह में बाल ठाकरे ने बेटे उद्धव को उत्तराधिकारी बनाया। जिस दिन वे उत्तराधिकारी बने उसी दिन से पार्टी के कमजोर होने और टूटने की शुरुआत हो गई थी। राज ठाकरे ने अलग पार्टी बना कर इसकी शुरुआत की थी। बाद में एकनाथ शिंदे ने पार्टी ही कब्जा कर ली। ममता बनर्जी का मामला अलग है। इससे पहले एकाध ही मिसाल है, जब किसी ने किसी प्रादेशिक पार्टी के संस्थापक के जीवित रहते ही उसकी पार्टी पर कब्जा कर लिया और उसी को पार्टी से बेदखल कर दिया हो। आमतौर पर प्रादेशिक पार्टियों का ढांचा इतना मजबूत होता है कि संस्थापक के रहते उस पर कोई और कब्जा नहीं कर सकता हैं। हां, पाटियां टूटती हैं, कुछ विधायक और सांसद अलग भी होते हैं, जैसे बसपा कई बार टूटी या आम आदमी पार्टी अभी टूटी है लेकिन उस पर किसी और का कब्जा नहीं होता है। अन्ना डीएमके या लोक जनशक्ति पार्टी में जो भी विवाद हुए वह संस्थापक नेता के निधन के बाद हुए।

इस लिहाज से जो सबसे नजदीकी समानता दिखती है वह तेलुगू देशम पार्टी से दिखती है। तेलुगू देशम पार्टी के संस्थापक और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे एनटी रामाराव ने अपनी दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती को पार्टी सौंपने का प्रयास किया तो उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू ने बगावत कर दी और एनटी रामाराव के जीवित रहते ही उनकी पार्टी पर कब्जा कर दिया और उनको उन्हीं की पार्टी से बेदखल कर दिया। ऐसी मिसाल एकाध किसी छोटी पार्टी का हो तो हो लेकिन किसी बड़ी प्रादेशिक पार्टी में ऐसा नहीं हुआ था। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इस लिहाज से पहली बड़ी प्रादेशिक पार्टी होगी, जिसमें संस्थापक को ही पार्टी से बेदखल करके उसकी पार्टी पर कब्जा कर लिया जाएगा। उसकी पार्टी का नाम, झंडा, चुनाव चिन्ह आदि सब छिन जाएंगे और साथ ही पार्टी का खजाना भी हाथ से निकल जाएगा। चंद्रबाबू नायडू ने जब एनटीआर के हाथ से उनकी पार्टी छीनी तो एनटीआर ने दूसरी पार्टी बनाई लेकिन वे उसे स्थापित नहीं कर पाए। क्या ममता बनर्जी नए सिरे से पार्टी खड़ी कर पाएंगी?

By NI Political Desk

Get insights from the Nayaindia Political Desk, offering in-depth analysis, updates, and breaking news on Indian politics. From government policies to election coverage, we keep you informed on key political developments shaping the nation.

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 × five =