भारत के चीन के साथ सामरिक संबंध चाहे जैसे भी रहे लेकिन आर्थिक संबंधों में कोई कमी नहीं आई। गलवान में भारत के 20 जवानों के शहीद होने और सीमा पर कई साल तक तनाव रहने के बावजूद चीन से व्यापार कम नहीं हुआ। उलटे व्यापार बढ़ता गया। तभी चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 10 लाख करोड़ रुपए सालाना तक पहुंच गया। सोचें, भारत के साथ व्यापार में अमेरिका का घाटा कोई तीन लाख करोड़ रुपए का था तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कितना बड़ा कदम उठाया। लेकिन चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगभग 10 लाख करोड़ रुपए का है फिर भी कोई सख्त कदम उठाने की बजाय भारत उससे व्यापार बढ़ाने के उपाय कर रहा है।
भारत ने गलवान की घटना के बाद 2020 में प्रेस नोट तीन के जरिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के कुछ नियमों की घोषणा की थी, जो खासतौर से उन देशों के लिए थी, जिनकी जमीनी सीमा भारत के साथ लगती है। इसके जरिए चीन के निवेश को रोकने या नियंत्रित करने का प्रयास किया गया था। लेकिन भारत सरकार ने उसमें छूट दे दी है। अब चीन और दूसरे जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों को एफडीआई के नियमों से छूट दी गई है। सोचें, छह साल के बाद आखिर ऐसा क्या हो गया कि भारत को एफडीआई के लिए इस नियम में बदलाव करना पड़ा? ध्यान रहे इन छह सालों में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की सबसे ज्यादा चर्चा हुई है। लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत की निर्भरता दूसरे देशों पर खास कर चीन पर और बढ़ गई है। यह सही है कि कुछ सामरिक क्षेत्रों को निवेश से बाहर रखा गया है लेकिन अगर भारत को आत्मनिर्भर बनना है तो क्यों किसी भी सेक्टर में चीन पर निर्भरता बढ़ाई जाएगी?


