यह बहुत दिलचस्प स्थिति है। भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए की पार्टियों के सांसदों, विधायकों आदि की संख्या पहले जैसी बनी हुई है, उनमें कोई तोड़ फोड़ नहीं हो रही है फिर भी पार्टियां छोटी होती जा रही हैं। यहां तक कि एक महीने पहले तक एनडीए में भाजपा के बाद दूसरी और तीसरी सबसे बड़ी पार्टियों का दर्ज घट गया है। चौथी और पांचवीं सबसे बड़ी पार्टियां भी खिसक कर नीचे चली गई हैं। चौथे नंबर की पार्टी की रैंकिंग सुधर गई और अगर खेलों की शब्दावली में कहें तो बिना रैंकिंग वाला एक खिलाड़ी सीधे दूसरे स्थान पर गया। एनडीए में नंबर दो रैंकिंग के नेता चंद्रबाबू नायडू थे, जिनकी पार्टी के पास 16 लोकसभा सांसद हैं और अब उनके राज्यसभा सांसदों की संख्या भी बढ़ कर चार हो गई है। लेकिन अब वे एक रैंक नीचे हो गए हैं। नीतीश कुमार, जो पहले तीसरे स्थान पर थे वे खिसक कर चौथे स्थान पर चले गए हैं। यह कमाल एनडीए विरोधी पार्टियों में हो रही तोड़ फोड़ की वजह से हो रहा है।
गौरतलब है कि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को 240 सीटें मिली थीं। एनडीए की सहयोगियों में 16 सीटों के साथ टीडीपी दूसरे स्थान पर और 12 सीटों के साथ जनता दल यू तीसरे स्थान पर था। लेकिन यह रैंकिंग बदल गई है। ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने अलग गुट बना लिया और वे त्रिपुरा की बिना सासंद या विधायक वाली पार्टी नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल हो गए। अचानक यह 20 सांसदों वाली पार्टी बन गई और एनडीए सहयोगियों की सूची में चंद्रबाबू नायडू को रिप्लेस करके दूसरे स्थान पर आ गई। नीतीश की पार्टी तीसरे से चौथे स्थान पर चली गई। लेकिन जनता दल यू की गिरावट इतने पर नहीं रूकी। पिछले दिनों उद्धव ठाकरे की पार्टी के छह सांसद एकनाथ शिंदे की शिव सेना में शामिल हो गए। इससे उनके सांसदों की संख्या बढ़ कर 13 हो गई। इस तरह उनकी शिव सेना ने जनता दल को रिप्लेस करके चौथा स्थान ले लिया। इस तरह नीतीश की पार्टी पांचवें स्थान पर आ गई।
हो सकता है कि इस किस्म का बदलाव आगे भी जारी रहे। अगला खतरा भी बिहार की ही पार्टी पर है। चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी जो पहले पांचवें स्थान पर थी वह अब छठे स्थान पर आ गई है। लेकिन हो सकता है कि वह एक स्थान और खिसक जाए। खबर है कि शरद पवार की एनसीपी का विलय सुनेत्रा पवार की एनसीपी में होने वाला है। अगर ऐसा होता है तो सुनेत्रा पवार की एनसीपी के सांसदों की संख्या एक से बढ़ कर नौ हो जाएगी और वह छठी सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी। अगर विलय नहीं होता है और शरद पवार की पार्टी के सांसद अलग गुट बनाते हैं तब भी कहा जा रहा है कि छह सांसद अलग गुट बना सकते हैं। तब भी उनकी संख्या चिराग पासवान से ज्यादा होगी। हां, अगर वे भाजपा में विलय कर लेते हैं तो अलग बात है। लेकिन अभी भाजपा दूसरी पार्टियों के लोकसभा सांसदों को अपनी पार्टी में नहीं शामिल करा रही है। इस तरह कह सकते हैं कि नरेंद्र मोदी की तीसरी सरकार के दो साल पूरे होने के मौके पर जो सबसे बड़ा बदलाव हुआ है वह ये है कि भाजपा की निर्भरता सहयोगी पार्टियों खास कर चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार पर से कम हो गई है। अब एनसीपीआई और शिव सेना के दम पर ही एनडीए का बहुमत बन जाता है। अब तो भाजपा एनडीए का दो तिहाई बहुमत बनाने की ओर बढ़ रही है। उसके इस दिग्विजय अभियान में कई पार्टियों का होम हो सकता है।


