सोचें, क्या समय आ गया है? भारतीय जनता पार्टी इस बात से परेशान है कि व्हाट्सएप पर उसकी सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा चल रहा है। सोचें, पिछले करीब 12 साल से कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां इस बात से परेशान थीं कि व्हाट्सएप पर प्रचारित होने वाले संदेशों और अनगिनत फॉरवर्ड से उनको नुकसान हो रहा है। तभी भाजपा समर्थकों के लिए कांग्रेस के इकोसिस्टम की ओर से व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में पढ़े होने का जुमला गढ़ा गया था। यह बात काफी हद तक सही भी है कि भाजपा ने सोशल मीडिया के मैसेंजर एप्स का खूब इस्तेमाल किया। उसी पर पंडित नेहरू और उनके परिवार के अन्य सदस्यों से लेकर राहुल गांधी के निजी जीवन की झूठी सच्ची कहानियां प्रचारित की गईं। हर दिन विपक्ष के किसी न किसी नेता के खिलाफ ऐसी कहानी प्रचारित होती रही, जिसका जवाब विपक्षी पार्टियां नहीं दे पाईं।
यह पहली बार हो रहा है कि भाजपा इस बात को लेकर परेशान है कि उसके खिलाफ व्हाट्सएप पर एजेंडा चलाया जा रहा है। भाजपा ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल से वीडियो डाल कर लोगों से अपील की है कि वे इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल यानी ई-20 को लेकर व्हाट्सएप पर फैलाई जा रही बातों पर ध्यान न दें। इस वीडियो में भाजपा ने सचाई बताने का दावा किया है। हालांकि भाजपा के नेता अब भी इस पर आत्ममंथन नहीं कर रहे हैं कि जो टूल उनके लिए इतना उपयोगी था वह अचानक इतना नुकसानदेह कैसे हो गया?
असल में यह यूजीसी के कथित समानता वाले दिशा निर्देश के बाद हुआ क्योंकि सोशल मीडिया में सक्रिय सवर्ण समर्थकों ने भाजपा का साथ छोड़ दिया। बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर भी भाजपा को इसी का नुकसान हुआ। वहां भी प्रशांत किशोर की टीम ने यह बात फैला दी कि रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि किसी कुत्ता, बिल्ली को चुनाव लड़ा कर भाजपा बांकीपुर जीत जाएगी। अब भाजपा के नेता कह रहे हैं कि उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा। सो, अब सोशल मीडिया भाजपा के लिए भस्मासुर बन रहा है और इसलिए कंपनियों को डराने का अभियान सरकारी स्त पर शुरू हो गया है।
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