ममता बनर्जी की पार्टी के सांसदों को तोड़ने की योजना मुश्किल में फंस गई है। भाजपा को इसका अंदाजा था तभी शुभेंदु अधिकारी को दिल्ली बुलाया गया और उन्होंने तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए सांसदों की एक बैठक बुलाई है। केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव इस मामले में पहले से शामिल थे। सो, पहले की तरह ही बैठक उनके आवास पर हुई। बैठक के बाद जो तस्वीर जारी की गई उसमें शुभेंदु अधिकारी और भूपेंद्र यादव के साथ साथ झारखंड की गोड्डा सीट के सांसद निशिकांत दुबे भी थे। बाद में इस पर बड़ी चर्चा हुई और तरह तरह की बातें कही गईं। लेकिन सबसे अहम बात यह थी कि उसमें तृणमूल के मुस्लिम सांसद नदारद थे। हालांकि भाजपा के इकोसिस्टम की ओर से जारी तस्वीर को लेकर कहा गया कि सारे सांसद उसमें मौजूद थे। माना गया कि दिल्ली की मीडिया में लोग बंगाल के मुस्लिम सांसदों को नहीं पहचान पाएंगे और नैरेटिव पर विश्वास करेंगे। बाकियों को भले लोग नहीं पहचानते हों क्रिकेटर यूसुफ पठान को सब जानते हैं। वे उस बैठक में नहीं शामिल थे।
यही से बात बिगड़नी शुरू हुई और मीडिया में इस बात की चर्चा हुई की मुस्लिम सांसद वापस ममता के साथ लौटना चाहते हैं। तभी बुधवार को मीडिया के लोगों ने यूसुफ पठान को घेरा और इस बारे में पूछा। वे जवाब टालते रहे और अंत में कहा कि वे इस बारे में बात नहीं करना चाहते हैं। ध्यान रहे कुछ समय पहले ऐसी चर्चा हुई थी कि ममता बनर्जी चाहती हैं कि पठान अपनी बहरामपुर सीट खाली कर दें। कहा जा रहा था कि ममता वहां से लड़ना चाहती हैं। लेकिन पठान ने इसके लिए मना कर दिया। बाद में कहा कि उनसे किसी ने सीट खाली करने को नहीं कहा है। ध्यान रहे यूसुफ पठान गुजरात के रहने वाले हैं। ममता बनर्जी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में उनका इस्तेमाल अधीर रंजन चौधरी को हराने के लिए किया था। अब पठान की कोई खास उपयोगिता नहीं रह गई है। तभी उनसे सीट खाली कराने की बात हो रही है। लेकिन पठान अब गुजरात में अपने और परिवार की फिक्र कर रहे हैं। उनको लग रहा है कि भाजपा ही उनको कुछ दे सकती है।
लेकिन बाकी दो मुस्लिम सांसदों के साथ ऐसा नहीं है। उनको तो पश्चिम बंगाल में ही राजनीति करनी है। ममता के जो तीन मुस्लिम सांसद पाला बदल कर नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया के रास्ते एनडीए से जुड़े हैं उनमें यूसुफ पठान बहरामपुर से जीते हैं, खलील उर रहमान जंगीपुर से और मुर्शिदाबाद से जीते अबू ताहिर खान शामिल हैं। इन तीनों लोकसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 50 फीसदी से ऊपर है। तभी इन सांसदों को पता है कि ये भाजपा या भाजपा की प्रॉक्सी किसी पार्टी की टिकट से इन सीटों से सांसद नहीं बन सकते हैं। लेकिन दूसरी ओर केंद्र व राज्य सरकार की निगाहों से भी अगले चुनाव तक बचे रहने की जरुरत है।
इसलिए इनको एनएसपीआई का रास्ता मुफीद लगा था। परंतु मुश्किल यह है कि आजकल मतदाताओं को सभी बातों का पता होता है। इसलिए इनके चुनाव क्षेत्र में इन लोगों को भारी विरोध का सामना करना पड़ा। अब ये सांसद कह रहे हैं कि ये एनडीए में कैसे जा सकते हैं, इनको अपने मतदाताओं को मुंह दिखाना है। तभी इन सांसदों की घर वापसी की चर्चा शुरू हो गई है। अगर तीन सांसद वापस लौटते हैं तो बाकी 17 सांसदों पर दलबदल कानून की तलवार लटकेगी। हालांकि सबको पता है कि इस मामले में फैसला स्पीकर को करना होता है और स्पीकर कोई फैसला नहीं करेंगे। फिर भी ममता की पार्टी तोड़ कर उसका विलय दूसरी पार्टी में करा देने की योजना अटक जाएगी।
Leave a comment
You must be logged in to post a comment.



