अमेरिका और ईरान के बीच समझौता का जश्न भारत में भी मनाया जा रहा है। सबको उम्मीद है कि अब होर्मुज की खाड़ी खुल जाएगी और कच्चा तेल आसानी से आने लगेगा तो तेल की कीमतें कम होंगी। हालांकि इस बात की संभावना बहुत कम है कि भारत में तेल की कीमत कम होगी। इसके दो कारण हैं। पहला कारण तो यह है कि भारत सरकार, तेल कंपनियों और प्रतिबद्ध मीडिया की ओर से यह बात स्थापित कर दी गई है कि तेल कंपनियों को बहुत बड़ा घाटा हुआ है। आंकड़े बताए गए हैं कि पिछले पूरे साल में सभी पेट्रोलियम मार्केटिंग कंपनियों को मिला कर जितना मुनाफा हुआ था उससे ज्यादा नुकसान तीन महीने में हो गया। सो, यह धारणा बनाई गई है कि कंपनियां अपने घाटे की भरपाई करेंगी, जिसमें बहुत समय लगेगा। दूसरा कारण यह है कि भारत के लोग अब बढ़ी हुई कीमत के अभ्यस्त हो गए हैं। वे इस बात से ही खुश हैं कि इतना बड़ा संकट था फिर भी मोदीजी ने साढ़े सात रुपए लीटर ही दाम बढ़ाए।
इस कंडीशनिंग के कारण लोग दाम कम नहीं किए जाने का विरोध नहीं करेंगे, बल्कि इस बात पर खुश होंगे कि अब और कीमत नहीं बढ़ेगी। बहरहाल, समस्या सिर्फ पेट्रोलियम कंपनियों के घाटे की भरपाई की नहीं है। सरकार ने भी ईरान युद्ध शुरू होने के बाद पेट्रोल और डीजल दोनों पर आयात शुल्क में कटौती की थी। प्रति लीटर 10 रुपए की कटौती से सरकारी खजाने को भी अच्छा खासा नुकसान हुआ है। सो, जब होर्मुज की खाड़ी खुलेगी, तेल की कीमत कम होगी और तेल की आवाजाही सुचारू हो जाएगी तो सबसे पहले सरकार अपने खजाने को भरेगी। इसकी शुरुआत हो गई है। अमेरिका और ईरान का समझौता होने के साथ ही भारत सरकार ने डीजल पर 14 रुपए और एटीएफ पर साढ़े 12 रुपए निर्यात शुल्क बढ़ा दिया है। सरकार के कंपनियां अपने कथित घाटे की भरपाई करेंगी। जब तक सरकार और कंपनियों का खजाना फिर से भरेगा तब तक पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत का मामला सार्वजनिक विमर्श से बाहर हो जाएगा। ध्यान रहे आपदा हर बार इस सरकार के लिए अवसर की तरह रही है। कोरोना के समय इसी तरह उत्पाद शुल्क बढ़ा कर सरकार ने पैसे कमाए थे और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत कम होने का लाभ लोगों को नहीं दिया था।


