संसद के मानसून सत्र में दो स्तर पर राजनीतिक लड़ाई चल रही है। एक लड़ाई केंद्र सरकार और एनडीए बनाम विपक्ष की है। दूसरी लड़ाई विपक्ष के अंदर है। विपक्ष की पार्टियां एक दूसरे के खिलाफ स्कोर करने की संभावना तलाश रही हैं। तभी राहुल गांधी ने जब पेपर लीक को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया और राहुल वे प्रियंका दोनों ने इस पर सरकार को घेरा तो समाजवादी पार्टी को लगा कि उसे इस मामले में ज्यादा तवज्जो नहीं मिल रही है। अखिलेश यादव ने एक दिन लोकसभा में इस पर अपनी पीड़ा भी जाहिर की और स्पीकर ओम बिरला से कहा कि उनको बोलने का मौका नहीं मिल रहा है। तभी समाजवादी पार्टी पेपर लीक के बीच में ही अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मुद्दा उठा दिया। सपा के सांसद दान पेटी लेकर संसद पहुंचने लगे। अंत में जाकर कांग्रेस भी इसमें शामिल हुई।
शुक्रवार को मानसून सत्र के दूसरे हफ्ते के आखिरी कामकाजी दिन संसद परिसर में विपक्ष ने नुक्कड़ नाटक किया, जिसमें पप्पू यादव पुजारी बन कर बैठे और चढ़ावा चोरी का स्वांग किया। राहुल गांधी भी दान पेटी में चढ़ावा देने पहुंचे थे। सवाल है कि यह नाटक क्या विपक्ष को फायदा पहुंचाएगा या जिस तरह से इसे मंचित किया गया वह नुकसान कर देगा? पूरा नाटक देख कर ऐसा लगा कि कांग्रेस और सपा को साधु, संत, पुजारी आदि का कॉन्सेप्ट ही पता नहीं है। क्या उनको पता नहीं है कि अयोध्या में चढ़ावा चोरी का काम साधु, संत या किसी पुजारी ने नहीं किया है? क्या वे नहीं जानते हैं कि मंदिर का प्रबंधन पुजारियों का हाथ में नहीं है? चढ़ावा चोरी का काम श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की ओर से नियुक्त छोटे छोटे कर्मचारियों ने की है। हो सकता है कि उसमें ट्रस्ट के लोगों की मिलीभगत हो। लेकिन विपक्ष ने अपने नाटक में दिखाया जैसे भगवा पहनने वाले साधु, संत और पुजारी ही चोर हैं। अगर वहां आरएसएस और विहिप का स्वांग होता तो बेहतर होता। कोई चंपत राय और कोई अनिल मिश्रा का स्वांग करता तो ज्यादा अच्छा होता।
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