कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां चिंता में हैं। उनको तय करना है कि पश्चिम बंगाल और केरल के विधानसभा चुनाव में क्या करना है। यह कैच 22 सिचुएशन है, जिसे हिंदी में सांस छुछुंदर वाली गति कहते हैं। पिछली बार कांग्रेस और लेफ्ट ने पश्चिम बंगाल में मिल कर चुनाव लड़ा था और केरल में दोनों एक दूसरे के खिलाफ लड़े थे। इसका कोई फायदा पश्चिम बंगाल में तो नहीं हुआ लेकिन केरल में कांग्रेस को बड़ा नुकसान हो गया। पांच साल विपक्ष में रहने के बाद कांग्रेस सत्ता में वापसी को लेकर पूरे भरोसे में थी क्योंकि केरल में हर पांच साल में सत्ता बदलती है। लेकिन 2021 में पांच साल पर सत्ता बदलने का रिवाज बदल गया। वामपंथी पार्टियों का मोर्चा लगातार दूसरी बार सत्ता में आ गया। कांग्रेस के नेताओं को लग रहा है कि उस समय यह मैसेज हो गया कि कांग्रेस और लेफ्ट एक ही हैं। इसलिए दिल्ली के लिए कांग्रेस को और केरल के लिए लेफ्ट को चुनने का फैसला कर लिया लोगों ने। इस बार कांग्रेस ऐसा कोई मैसेज नहीं बनने देना चाहती है। वह लेफ्ट से लड़ने का मैसेज बनाना चाहती है। इसलिए बंगाल में भी अलग लड़ने का फैसला हो सकता है। दूसरी ओर लेफ्ट को लग रहा है कि अगर बंगाल में तालमेल हो जाए तो केरल में मैसेज बन जाएगा। दोनों को इस पर भी विचार करना है कि बंगाल में अलग अलग लड़ने का नतीजों पर क्या असर होगा, कहीं ऐसा न हो उसका फायदा भाजपा को हो जाए।
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