आखिर, हिंसा, अन्याय, उत्पीड़न रोकना ही स्वाभिमानी राजनीति का पहला काम है। स्टेट-पावर का काम है। जिस के साथ में सैन्य शक्ति समेत सभी शक्तियाँ होती हैं। जो सुरक्षा बलों को हुक्म देता है। किन्तु यह पावर अपने हाथ में लेने के बाद भी हिंदू नेताओं की आम राजनीति केवल उपदेश, शेखी, परनिन्दा, रोटी एवं तमाशा (ब्रेड एंड सर्कस), बहानेबाजी, और कुर्सी साधे रखने की रही है।
हिंदुस्तान में हिंदू संहार -1
बंगलादेश में हिंदुओं की हत्याओं पर दुनिया निर्विकार है। क्योंकि भारत निर्विकार है। जब बंगलादेश में रोज हिंदुओं की हत्या हो रही है, तो भारत के नेता राष्ट्रगान बनाम राष्ट्रगीत पर लोगों को उलझाने, और विकास का गीत गाने में लगे हैं। नेहरू को जिन्ना जैसा बताकर, हिंदुओं को ही एक-दूसरे के खिलाफ उकसा रहे हैं। यह दैनिक कार्य जैसा हो गया है। जबकि सामने खड़े आज के जिन्नाओं की खुली चुनौती पर चुप रहते हैं।
वे ‘अखंड भारत’ के सपने दिखाते हैं, जबकि बंगलादेश के हिंदुओं पर बेपरवाह हैं। पर अपने सुरक्षित सभागारों में उस ‘इतिहास का प्रतिशोध’ लेने के हुंकारे भरते हैं, जब भारत में ‘मंदिरों को लूटा’ गया था। तब उन्हें याद नहीं रहता कि जिस भारत के इतिहास का प्रतिशोध लेने का वादा कर रहे हैं, उस में बंगाल-बंगलादेश भूमि एक है! पर सारी शक्ति और संसाधन हाथ में ले कर भी सामने हो रहे हिंदू विनाश पर निर्विकार रहना — जबकि ‘इतिहास का प्रतिशोध’ लेने के जुमलों से युवाओं को गुमराह करना — यही हिंदू नेतृत्व है।
इस हाल में, बंगलादेश में जारी हिंदू संहार पर बाकी दुनिया कर ही क्या सकती है? जिस का घर जल रहा हो, जब वही लनतरानी में अपने बच्चों को बहला कर मस्त हो, तब गाँव के दूसरे लोग क्या करें! गत अठहत्तर सालों में पूरी भारतभूमि — बंगलादेश, पाकिस्तान, भारत — के विभिन्न क्षेत्रों में हिंदुओं का क्रमशः अपमान, जबरन धर्मांतरण, विनाश और मंदिरों का विध्वंस कमोबेश अनवरत चलता रहा है। क्या शेखी बघारने वाले नेताओं, दलों ने कभी इस पर संसद में विचार भी किया?
वे अपने दल की शताब्दी मनाने, अज्ञानी नेताओं को चिंतक बताने, और ऊल-जुलूल विषयों पर सैकड़ों सेमिनार, व्याख्यान कराने में संसाधन बरबाद करते हैं। क्या उन्होंने बंगलादेश, कश्मीर, या इतिहास में हिंदुओं के संहार पर एक भी राष्ट्रीय गोष्ठी की? एक भी अधिकारिक दस्तावेज या पर्चा तक छापा? जबकि नेताओं के चलताऊ भाषणों और गप्पों की मोटी जिल्द दर जिल्द छापी जाती है। यानी ऐसे प्रकाशन जिन का शीघ्र गंतव्य और पाठक कबाड़ी ही होते हैं। किन्तु जिस ‘इतिहास का प्रतिशोध’ लेने की वे हाँक रहे हैं — उस पर क्या उन्होंने कोई श्वेत-पत्र तक छापा है? नहीं।
बल्कि, अकादमिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों, आदि में भी वैसे शोध-अध्ययन प्रस्तावों को उन के वफादार सरसरी नामंजूर करते हैं। कोई उस विषय पर बोले, उन के दोहरेपन पर ऊँगली रखे, तो उसे भी दंडित करते हैं। चाहे वह उन के ही दल की छोटी हस्ती क्यों न हो। यह सब भारतीय नेताओं की भगोड़ी, आरामपसंद, स्वार्थी, मंद-दृष्टि राजनीति का स्थाई पैटर्न है। दशकों से एक समान। तब हिंदुओं के क्रमशः, पर निश्चित, विनाश को कौन रोक सकता है — चाहे उस में कितना भी समय क्यों न लगे?
यह डेमोग्राफी नहीं, गलत राजनीति का मामला है। अमेरिका में एक प्रतिशत हिंदू हैं। पर सुरक्षित हैं। बंगलादेश में आठ प्रतिशत हैं, पर खात्मे की ओर हैं। भारत में अठहत्तर प्रतिशत होकर भी हिंदू चिन्तित हैं। जम्मू कश्मीर, असम, बंगाल ही नहीं अनेक राज्यों के असंख्य जिलों में हिंदू भय में रहते हैं। इसे डेमोग्राफी का मामला बताना डफर दिमाग की उपज है। जो हमेशा अपना पल्ला झाड़ने की फिराक में रहता है।
आखिर, हिंसा, अन्याय, उत्पीड़न रोकना ही स्वाभिमानी राजनीति का पहला काम है। स्टेट-पावर का काम है। जिस के साथ में सैन्य शक्ति समेत सभी शक्तियाँ होती हैं। जो सुरक्षा बलों को हुक्म देता है। किन्तु यह पावर अपने हाथ में लेने के बाद भी हिंदू नेताओं की आम राजनीति केवल उपदेश, शेखी, परनिन्दा, रोटी एवं तमाशा (ब्रेड एंड सर्कस), बहानेबाजी, और कुर्सी साधे रखने की रही है। गत सौ सालों से इस का क्रम अविच्छिन्न है।
कभी, किसी राष्ट्रीय दल या नेता ने सामने खड़ी हिंसक समस्या का मुकाबला — मौखिक भी — करने का उदाहरण नहीं दिखाया। स्वतंत्र भारत में कश्मीर से हिंदुओं का सफाया दशकों में, लगातार, खुलेआम चुनौती, धमकी, और चुन-चुन कर हत्याएं करके किया गया। जो आज भी जारी है। इस पर हिंदुओं की स्टेट पावर और संसदीय दलों ने क्या किया?
सभी दल और नेता, विशेषकर जो अधिकाधिक हाँकने में रहते हैं — उन के मुँह से उस पूरी गतिविधि पर कभी कोई निर्णय या प्रस्ताव तक नहीं निकला। जबकि तब, पैंतीस वर्ष पहले, वे और तंदुरुस्त, जवान, और अनेक तो खाली भी थे! राजनीति में सक्रिय थे, पर उसी आराम के साथ जो हिंदू लीडर की सदाबहार शैली है। नेहरू-इन्दिरा को, या ‘हिंदू सांप्रदायिकता’ को कोसने, विशेष अल्पसंख्यकों के लिए रोने, तथा इस-उस जातियों को उकसाने के अलावा उन की कोई नियमित चिन्ता कभी रिकॉर्ड पर शायद ही मिले।
इसीलिए बंगलादेश के हिंदुओं की तबाही पर हिंदू नेताओं से कोई कदम उठाने की आशा उन के समर्थक भी नहीं करते! उन्हें अपने नेताओं की सिफत मालूम है। सो, पिछले डेढ़ साल से बंगलादेश से बार-बार हिंदुओं पर हमले, मंदिरों के विध्वंस, हत्याओं के समाचार आ रहे हैं। क्या हिंदू नेताओं के समर्थक दर्जनों संगठनों या उन के एक्टिविस्टों ने कभी कोई आशा जताई कि उन के नेता कुछ करेंगे? नहीं। वे नित नये, चित्र-विचित्र जुमलों पर देश भर में सम्मेलन कर एक-दूसरे को हार पहना रहे हैं। कभी गीता, कभी योग, या वास्तु पर देश-विदेश में भाषण दे रहे हैं। चंदा, अनुदान वसूल रहे हैं। यही उन की कुल राजनीतिक-बौद्धिक गति है।
इस तरह, मूढ़ता, आरामपसंदगी, और कुर्सी-साधन के हमाम में सभी हिंदू एक से हैं। पचहत्तर बरस से ऊपर के महान, और तीस-चालीस उम्र वाले युवा, प्रायः सब के सब नेता हर कठिन समस्या पर बगलें झाँकने वाले। पर वीरता और गहनता की भंगिमा देने के आदी। अपने ही ड्रामे पर खुद फिदा वे समझते हैं कि महाशक्ति और विश्वगुरु होने की साधना कर रहे हैं! अपने ही प्रोपेगंडा से उन्हें दुनिया में अपनी महत्ता बढ़ गई लगती है।
परन्तु, अपने दावे या कल्पना को किसी कसौटी पर परखना हिंदू नेताओं, और फलत: अनुयायियों को न सौ साल पहले आता था। न आज आता है। बल्कि वे इस से बचते हैं! ऐसा करने वाले को उपेक्षित या नीचा तक दिखाते हैं। तब टैगोर, श्रीअरविन्द, या निराला जैसे मनीषी टोकने वाले थे। लेकिन उन की हर बात हिंदू नेताओं ने अनसुनी की। कारण वही था: अपनी काल्पनिक बातों, सस्ते उपदेशों, बचकानी योजनाओं में मगन रहना। जिस में कहीं अपने को दाँव पर न लगाना पड़े, न हिसाब देना पड़े। जबानी जमा-खर्च काम चलता रहे। यही राजनीति हिंदुओं ने सौ सालों से दिखाई है।
आज कुछ मामलों में स्थिति और खराब है। चाहे आर्थिक क्षेत्र में स्थित सुधरी हो। जो भी मुख्यतः प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता, पश्चिमी तकनीक, और हिंदू व्यापारी वर्ग की पारंपरिक कुशलता का परिणाम है। परन्तु राजनीति पहले से अधिक दयनीय हुई है। अंग्रेजी राज में नागरिकों को मिलती शासकीय सुरक्षा के प्रति हिंदू लोग आश्वस्त रहते थे। हर जिहादी, अकेला या गिरोह, शीघ्र ही नियमानुसार फाँसी या गोली खाता था। उन विषयों पर हिंदू लेखक खुलकर लिखते, बोलते थे। आज?
खुद सब से बड़े दलों के प्रतिनिधि मुँह सिये रहते हैं। वे देखते हैं कि उन के नेता जिहादियों पर कार्रवाई तो दूर, उलटे उन के सरपरस्तों को ही आदर, ईनाम देते हैं। अप्रैल 1929 में महाशय राजपाल की हत्या करने वाला जिहादी इलमदीन आठ महीने में फाँसी पर चढ़ा दिया गया। पर 2007 में तसलीमा पर घातक हमला करने वाले न केवल छुट्टा घूमते रहे, बल्कि उन के नेता तमाम बड़े राष्ट्रीय मंचों पर शोभित होते रहते हैं। उलटे सच लिखने वाले लेखकों, प्रकाशकों को ही फटकारा जाता है। यह अंग्रेजी राज के समय से हिंदुओं की बदतर हुई स्थिति का संकेत भर है। पर जिसे शायद ही कोई राजनीतिक दल मानता भी है। कुछ करना तो दूर रहा।
सो, आज हिंदू लेखक को किसी मुस्लिम से नहीं, हिंदू नेताओं से ही दंडित होने का भय है! यह भय अंग्रेजी राज में नहीं था। वे जिहाद की, इस्लाम की, शरीयत की खुली आलोचना करते थे। डॉ. अंबेडकर की पुस्तक ‘पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया’ (1940) में ही दो-दो मोटे अध्याय इस पर लिखे हुए हैं। इस्लाम की आलोचना के जबाव में मुस्लिम भी जो चाहे बोलते, लिखते थे। परन्तु लिखने, बोलने, आलोचना के जबाव में हिंसा करने पर अंग्रेजी राज कठोर कार्रवाई करता था।
यह स्थिति देसी राज में बदल गई। हिंदू लेखक शासकीय सुरक्षा से अघोषित वंचित हो गये, यदि उन्होंने इस्लाम की राजनीति पर कुछ भी प्रतिकूल कहा। यह अकादमिक और मीडिया जगत भी जानता है। अतः ऐसे लेख, पर्चे, या सेमिनार को ठुकराता है जिस में इस्लाम की आलोचना हो। क्यों? इसलिए नहीं कि वह भीरू है। बल्कि इसलिए कि स्टेट-पावर न्याय करने में, अपने ही संविधान में लिखे कर्तव्य से कतराता है। वह जिहादी हिंसा रोकने के प्रति कटिबद्ध नहीं हैं। इसीलिए, और केवल इसीलिए, कश्मीर से हिंदुओं का सफाया हो गया।
क्योंकि हिंदू नेताओं में न अंग्रेज शासकों वाली सेक्यूलर दृढ़ता है, न हिंदू मनीषियों वाली धर्मनिष्ठा। उन के लिए चाणक्य, शिवाजी, या विवेकानन्द केवल बेचने की चीज हैं। जिस के बहाने वे नेहरू या मैकॉले को फींचकर अपने को ऊँचा बताते हैं। जबकि वास्तव में उन में मैकॉले, या नेहरू जैसी भी निष्ठा नहीं। यह उन के कुर्सी के निकट पहुँचते ही, उस पर बैठने से भी पहले झलक जाता है। अधिकांश हिंदू नेताओं के लिए धर्म जीने की नहीं, केवल उस का तमाशा बना कर लोगों को लुभाने की वस्तु है।
इसीलिए तमाम हिंदू नेताओं पर मृत लॉर्ड मैकॉले या जीवित मौलाना मदनी अकेला भारी रहता है। क्योंकि वह अकेला भी निष्ठावान है। जबकि हिंदू नेता झुण्ड के झुण्ड, सैकड़ों कुर्सियों पर काबिज भी, केवल मर चुके शासकों, सज्जन विरोधियों, या वफादार अनुयायियों पर वीरता दिखाते हैं। ऐसे नेता-राजाओं की पोशाक पर कोई एंडरसन वाला अबोध बच्चा ही बोल सकता है। जानकार चांसलर, चेयरमैन, या चीफ एडीटर भी चुप रहना ही ठीक समझते हैं। भय से उतना नहीं, जितना बोलना बेकार समझ कर। हिंदू नेता वोट-कुर्सी के सिवा कोई शब्द नहीं समझते। तब बोलकर क्या! यह दशकों का अनुभव है।
सो, बंगलादेश में हिंदू हत्याएं बरायनाम चल रही हैं। उसी दौरान यहाँ विवेकानन्द के चित्र, और उद्धरण लाखों की संख्या में एक-दूसरे को साझा किए जा रहे हैं। क्योंकि विवेकानन्द बेचने की, भरमाने की, आत्म-प्रवंचना की, मूर्ति बनाकर जहाँ-तहाँ ढेर लगा देने की, और बस यही सब करके दूसरों को नीचा और अपने को ऊँचा समझने की चीज हैं। विवेकानन्द के किसी निर्देश पर चलना हिंदू नेताओं का काम नहीं है। अतः उन के अनुयायियों का भी काम नहीं है।(जारी)


