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अखिलेश व आजम का विवाद कितना सही

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Akhilesh Yadav

समाजवादी पार्टी में नए और पुराने नेताओं की बहस लगभग समाप्त हो गई है। पुराने नेताओं में अब सिर्फ आजम खान हैं, जिनकी कोई हैसियत है और जिनके साथ गाहे बगाहे अखिलेश यादव के टकराव की खबरें आती हैं। दोनों के बीच संबंधों को लेकर कई तरह की चर्चाएं होती रहती हैं और यह आम धारणा बनी है कि जब आजम खान का मुश्किल समय शुरू हुआ और किसी न किसी मुकदमे में उनके परिवार के हर सदस्य के खिलाफ कार्रवाई उस समय अखिलेश ने उनको छोड़ दिया, उनका साथ नहीं दिया।

हालांकि जब आजम खान बीमार थे तब अखिलेश उनसे मिलने अस्पताल भी गए थे और पिछल दिनों जेल में भी उनसे मिलने गए। गौरतलब है कि आजम खान और उनके परिवार के सदस्यों के ऊपर 80 से ज्यादा मुकदमे हैं, जिनमें से चार या पांच मामलों में सजा भी हो गई है। आजम खान के साथ साथ उनकी पत्नी और बेटे भी किसी न किसी जेल में बंद हैं।

अब खबर है कि रामपुर और मुरादाबाद की सीट को लेकर आजम खान और अखिलेश यादव में टकराव हुआ है और अखिलेश यादव ने उनकी ओर से चुने गए उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिया है। कहा जा रहा है कि आजम खान चाहते थे कि रामपुर सीट से आसिम रजा को टिकट दिया जाए। गौरतलब है कि आजम खान के इस्तीफे से जब रामपुर सीट खाली हुई थी तो आसिम रजा उपचुनाव लड़े थे और कड़े मुकाबले में 40 हजार वोट से हारे थे।

इस बार अखिलेश ने उनको टिकट नहीं दी है और दिल्ली की एक मस्जिद के इमाम मोहिबुल्ला नदवी को उम्मीदवार बना दिया है। यह मेरी नहीं तो तुम्हारी नहीं चलेगी का रवैया है। असल में अखिलेश गैर मुस्लिम उम्मीदवार चाहते थे। वे अपने परिवार के सदस्य और पूर्व सांसद तेज प्रताप यादव को लड़ाना चाहते थे। इसके लिए वे जेल में आजम खान से मिलने गए थे। बताया जा रहा है कि आजम खान इसके लिए राजी नहीं हुए तो अखिलेश ने उनकी पसंद के आसिम रजा की जगह नदवी को टिकट दे दिया।

ऐसे ही मुरादाबाद की सीट को लेकर भी हुआ। वहां भी आजम खान चाहते थे कि पार्टी के मौजूदा सांसद एसटी हसन को टिकट दिया जाए। ध्यान रहे एसटी हसन सपा के पुराने नेता हैं और वे 2014 में इस सीट से हारे थे, जबकि 2019 में सपा के जीते पांच सांसदों में से एक वे भी थे। वे आजम खान के दूर के रिश्तेदार भी हैं। अखिलेश जिस तरह से रामपुर में गैर मुस्लिम उम्मीदवार चाहते थे वैसे ही वे मुरादाबाद में भी चाहते थे। जब आजम खान तैयार नहीं हुए तो अखिलेश ने अपनी ओर से वैश्य समाज की रूचि वीरा को उम्मीदवार बना दिया, जो पहले सपा से विधायक थीं और थोड़े समय के लिए बसपा में चली गई थीं।

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