फ्लैशबैक में, लम्हों की खता!

ख्याल कौंधा है कि महामारी काल में जो ठहराव है वैसा अपने अनुभव में पहले कब था? दूसरा सवाल है कि ठहरे वक्त की किंकर्तव्यविमूढ़ता में पुरानी घटनाओं को फ्लैशबैक में टटोलें तो क्या निकलेगा? … आजाद भारत के इतिहास में सिर्फ छह-सात क्षण हैं, घटनाएं हैं जो 75 साल का कुल अनुभव हैं। कौन सी हैं ये घटनाएं? एक, चीन से हार। दो, बांग्लादेश जीत। तीन, इमरजेंसी। चार, ब्लूस्टार ऑपरेशन। पांच, नरसिंह राव की अर्थ क्रांति। छह, अयोध्या में मस्जिद ध्वंस। सात, मंडल आयोग। आठ, कोविड-19 महामारी। पंडित का जिंदगीनामा: लंदनः समझदारी की पाठशाला पंडित का जिंदगीनामा-18:  ( hari shankar vyas ) महामारी काल….. अनिश्चित जिंदगी और उसे छोटा बनाता समय! तभी मुझे जीवन के उत्तरार्ध में वक्त को यादों में गुनगुनाते हुए होना चाहिए। जिंदगीनामा लिखते जाना चाहिए। लेकिन मैं भटका हूं! मान नहीं रहा हूं कि अखबारी सुर्खियों के खटराग में कुछ नहीं है। हिंदुओं का कलियुग कभी खत्म नहीं होगा। हमारे जीवन में देवत्व, आजादी, निर्भीकता, सत्यता और वह सभ्यता, वह सतयुग खिल ही नहीं सकता जो पशुता-एनिमल फार्म से दीगर पृथ्वी के कई मानवों का विकास है। यही सोचते हुए दिमाग फिर जिंदगी पर लिखने को कुलबुला रहा है। क्यों नहीं कुछ दिन दिमाग में… Continue reading फ्लैशबैक में, लम्हों की खता!

झूठ को फिर भी शर्म नहीं!

मैं थक गया, सूख गई स्याही.. पर झूठ न हारा। सांसे फडफडा कर मर गई… पर झूठ न पसीजा। गिद्धों ने नौचा जिंदा इंसानों (मरीजों) को.. पर झूठ नहीं लजाया। लोभी-लालची बन गए नरपशु…पर झूठ नहीं कांपा। चिताओं से जल उठे श्मशान …पर झूठ नहीं जला। शवों पर टूट पड़े कुत्ते… पर झूठ नहीं ठिठका।… गंगा रो पड़ी लाशों से… पर झूठ नहीं रोया। देवता हुए रूष्ट… पर झूठ नहीं घबराया। दुनिया सन्न लावारिश देश के लावारिशों को देख…पर झूठ आंकड़ों से चिंघाडता हुआ। दुनिया दौडी आई..पर झूठ मगरूर। गरीब-गुरबे बिना कफन रेत में दबते हुए… पर झूठ को फिर भी शर्म नहीं! हां, झूठ ही है कलियुग! हिंदुओं की काल नियति! कलियुगी हिंदुओं की गुरूता का गरूर! …बिना बुद्धी, बिना लाज, बिना शर्म, बिना भावना, बिना संवेदना और बिना आंसू के। हे झूठमेव जयते का कलियुग… और भय-भक्ति, दासता, दीनता-हीनता, नरसंहार, लूट के सतत सफर के बाद 21वीं सदी के सन् इक्कीस में गंगा किनारे जा बने हिंदू जीवन की टायर-घासलेटी चिता के मुक्ति फोटो… क्या कोई विचलित? 33 करोड़ देवी-देवताओं के कलियुगी रूपों के लाखों मठाधीश साधू-संतों, करोड़ों भक्तों में क्या किसी की उफ! यह भी पढ़ें: कहां है पुण्यभूमि का गौरव मैं फिर लिखने लगा.. जबकि निश्चय… Continue reading झूठ को फिर भी शर्म नहीं!

साहेब तुम्हारे रामराज में..

सन् इक्कीस का राजा… महाबली, महा भाग्यवान। पर क्या सचमुच? राजा का भाग्य तो प्रजा का सुख होता है। राजा भाग्यवान होता तो भला वह हेडलाइन बनवाने में क्यों खपा होता?  क्यों राजा को लंगूरों की फौज की जरूरत होती? क्यों वह आंकड़े बनवाते हुए होता? राजा का भाग्य प्रजा से है, प्रजा का भाग्य अच्छे वक्त से है तो वक्त का अच्छा या बुरा होना क्या राजा के कर्मों का परिणाम नहीं? वक्त का कमाल देखिए कि जिस कवियत्री (पारुल खक्कर) को गुजरात के लोग भजन लेखन के लिए जानते थे, उन्होने वक्त की हकीकत पर सिर्फ चौदह लाईनों में मन के उद्गार लिखे और राजा का कथित भाग्य कंपकंपा गया। वे और उनके ट्रौल-लंगूर सैनिक उन पर टूट पड़े… यह मजाल।… पर सत्य तो सत्य। अपने आप कविता का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ और पारूल खक्कर गुजरात में घर-घर चर्चित। उस कविता का यह हिंदी अनुवाद हैः एक साथ सब मुर्दे बोले ‘सब कुछ चंगा-चंगा’ साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा ख़त्म हुए शमशान तुम्हारे, ख़त्म काष्ठ की बोरी थके हमारे कंधे सारे, आँखें रह गई कोरी दर-दर जाकर यमदूत खेले मौत का नाच बेढंगा साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा नित लगातार जलती चिताएँ राहत माँगे… Continue reading साहेब तुम्हारे रामराज में..

जान से बड़ा कुछ भी नहीं

आपने भी सुना होगा अच्छा सोचो, शुभ-शुभ सोचो, पॉजिटिव बनो! बकौल मोहन भागवत…. जो चले गए वो एक तरह से मुक्त हो गए,….ये जीवन मरण का चक्र चलता रहता है, जैसे मनु्ष्य मैले और पुराने कपड़े त्याग कर नए कपड़े बदलता है, वैसे पुराना शरीर छोड़ कर नया शरीर धारण करके आता है….हम अपने मन को निगेटिव नहीं होने देंगे। हमें मन को पॉजिटिव रखना है!….. तो विचार करे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना लिखित कविता पर और उसकी इस पंक्ति पर- जो विवेक, खड़ा हो लाशों को टेक, वह अंधा है। देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में आग लगी हो तो क्या तुम दूसरे कमरे में सो सकते हो? यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रहीं हों तो क्या तुम दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो? यदि हां तो मुझे तुम से कुछ नहीं कहना है। यह भी पढ़ें: कहां है पुण्यभूमि का गौरव देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता कि एक हिस्से के फट जाने पर बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें और नदियां, पर्वत, शहर, गांव वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें अनमने रहें। यदि तुम यह नहीं मानते तो मुझे तुम्हारे साथ नहीं रहना है।… Continue reading जान से बड़ा कुछ भी नहीं

राष्ट्र के नाम

सब कुछ raashtr के नाम पर है। भारत को महान बनाने के नाम पर है। गंगा-बनारस सब देश का गौरव बढ़ाने के लिए हैं।

कहां है पुण्यभूमि का गौरव

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के नीति-सिद्धांत का कोर बिंदु पुण्यभूमि के गौरव में है। हम और वे का पूरा सिद्धांत इस बात पर है कि भारत जिनकी मातृभूमि है उनकी पुण्यभूमि दूसरी जगह कैसे हो सकती है? फिर इस पुण्यभूमि की आज ऐसी हालत क्यों है? इस पुण्यभूमि पर कैसा संकट आया हुआ है और इस संकटकाल में जिनके ऊपर इसकी रक्षा का भार है वे क्या कर रहे हैं? इस महान गौरवशाली सभ्यता का प्रतिनिधित्व करने वाले कहां हैं? साहिर ने आजादी के थोड़े समय बाद ही लिखा था- जरा मुल्क के रहबरों को बुलाओ, ये कूचे-ये गलियां-ये मंजर दिखाओ। आज फिर यह कहने का समय है। मुल्क के रहबरों को बाहर निकलना चाहिए। गंगा की रेती में दबी या गंगा की लहरों में डूबती-उतराती लाशों को देखना चाहिए। गलियों से उठते क्रंदन को सुनना चाहिए। अस्पतालों के अंदर-बाहर हो रही प्रार्थनाओं की आवाजें सुनने की कोशिश करनी चाहिए। इंसानियत के नाते नहीं तो अपनी पुण्यभूमि की रक्षा करने की जिम्मेदारी के नाते ही इसे बचाने की कोशिश करनी चाहिए। राष्ट्रकवि दिनकर ने आजादी से पहले और बाद में भी कई मौकों पर पुण्यभूमि के संकट का आख्यान लिखा और मुल्क के रहबरों व नागरिकों को ललकारते हुए उन्हें हकीकत… Continue reading कहां है पुण्यभूमि का गौरव

जिंदगीनामा ठहरा, ठिठका!

 ‘पंडित का जिंदगीनामा’ लिखना कोई साढ़े तीन महिने स्थगित रहा। ऐसा होना नहीं चाहिए था। आखिर जब मौत हवा में व्याप्त है तो जिंदगी पर  सोचना अधिक हो जाता है। तब स्मृति, आस्था, जिंदगी के गुजरे वक्त की याद ज्यादा कुनबुनाती है।

लंदनः समझदारी की पाठशाला

जिंदगी को समझने और जीने की अपनी तीसरी लोकेशन लंदन है। मैं जनसत्ता की तरफ से 1985 में पहली बार लंदन गया। वह मेरी पहली विदेश यात्रा थी।

दिल्ली की चौखटः मेरा और भारत का सार!

लोग मेरा अहोभाग्य कहेंगे जो मैं देश की चौखट दिल्ली में रहा। हां, दिल्ली का एक अर्थ दहलीज, चौखट भी है। इस चौखट में छुपा हैभारत का तिलिस्म! मैंने इसलोकेशन के तिलिस्म को भेदने की कोशिश मेंजिंदगी के 45 वर्ष जाया किए।

भोपालगंज

जिंदगी लोकेशन और पात्रों की भीड़ लिए होती है। आपकी भी होगी। अपनी लोकेशन को याद करेंगे तो जिंदगी के शहर, कॉलोनी, मोहल्ले फ्लैशबैक में दौड़ेंगे।

जान, माल की सुरक्षा भगवान भरोसे

देश के पॉपुलर मूड का पता इस बात से चलता है कि कौन सा मुहावरा चर्चा में लोकप्रिय हो रहा है या किस बात पर सबसे ज्यादा मजाक बन रहे हैं, चुटकुले बनाए जा रहे हैं या चिंता जाई जा रही है।

गर्मी में लगी जो बुरी लत!

मेरा लिखना, पढ़ने की बुरी लत से है! मतलब बचपन की बुरी लत से मैं बना हुआ हूं। पिता अखबार मंगाते थे तो मेरे लिए पराग, चंदामामा भी लगवाई। बाद में नंदन। इससे किस्से-कहानियों का कौतुक बना तो सामान्य ज्ञान भी।

छोटी बातों का यादगार वक्त

यदि इंसान के वश में वक्त विशेष को लौटाना, उसमें दोबारा जीना संभव होता तो वह जिंदगी के किस वक्त में दोबारा जीना चाहता? गुजरी जिंदगी के किस हिस्से को फ्लैशबैक के पर्दे पर पहले देखता?

खूंटे, रिश्ते और आजादी

‘मैं’, ‘मैं’ हूं! ‘मैं’ अकेला! खाली हाथ आए थे खाली हाथ जाएंगे। लेकिन जिंदगी तो प्राप्त परिवार,प्राप्त रिश्तेदारी, जिम्मेवारी व सामाजिकता में बंधी होती है।

वायरस और भूख का कुंआ

भारतीय रेलवे, रेलवे बोर्ड जब किराया लेकर लोगों को दो वक्त खाने के पैकेट नहीं बांट सका तो गांव-गांव गरीब के घर में खाने के पैकेट, राशन बांटना क्या सरकारों के बूते में है?

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