प्रश्नों के अमरत्व पर नहीं है कोई प्रश्नचिह्न
संसद के चालू शीतकालीन सत्र में उठ रहे सवाल मामूली नहीं हैं। वे हमारे देश की मूलभूत परंपराओं की हिफ़ाज़त के लिए उपजे हैं। वे हमारे मुल्क़ के शाश्वत मूल्यों की रक्षा के लिए जन्मे हैं। वे हमारे जनतंत्र की बुनियाद को पोला बनाने की साज़िश के ख़िलाफ़ परचम लहरा रहे हैं। निर्वाचन प्रक्रिया की पवित्रता और पारदर्शिता का सवाल क्या नहीं उठना चाहिए? अमीरी-ग़रीबी की बढ़ती खाई के सुरसापन का प्रश्न क्या नहीं उठना चाहिए? दुनिया में सब मिला कर 201 देश हैं। इन में से सिर्फ़ 89 को ही पूर्णतः लोकतांत्रिक या ठीकठाक लोकतांत्रिक माना जाता है। बाकी...