पेरिस स्थित इनइक्वलिटी लैब की यह टिप्पणी महत्त्वपूर्ण है कि ‘भारत दुनिया के उन देशों में है, जहां गैर-बराबरी उच्चतम स्तर पर है और जिसे कम करने की दिशा में हाल के वर्षों में कोई प्रगति नहीं हुई।
वैसे तो यह पूरी दुनिया का हाल है कि आर्थिक गैर-बराबरी ‘ऐतिहासिक रूप से उच्चतम स्तर’ पर पहुंच गई है और इसमें ‘लगातार इजाफा’ हो रहा है, लेकिन पेरिस स्थित इनइक्वालिटी लैब की ताजा रिपोर्ट का भारत के संदर्भ में एक अलग महत्त्व भी है। हाल में सरकारी एजेंसियों ने आंकड़ों के खेल से नैरेटिव बनाने की कोशिश की है कि नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियां आर्थिक विषमता को घटाने में कामयाब रही हैं। ऐसे में 200 विश्व-स्तरीय अर्थशास्त्रियों के श्रमसाध्य शोध से तैयार इनइक्वालिटी लैब की रिपोर्ट में शामिल दो टिप्पणियां उल्लेखनीय हो जाती हैं।
पहली यह कि ‘भारत दुनिया के उन देशों में है, जहां गैर-बराबरी उच्चतम स्तर पर है और जिसे कम करने की दिशा में हाल के वर्षों में कोई प्रगति नहीं हुई है’तथा यह कि ‘भारत में आय, धन एवं लैंगिक लिहाज से हर स्तर पर विषमता मौजूद है, जो अर्थव्यवस्था के अंदर ढांचागत विभाजन पर रोशनी डालती है।’ रिपोर्ट बताती है कि भारत में आमदनी संबंधी गैर-बराबरी की चौड़ी खाई मौजूद है, जबकि धन संबंधी विषमता की खाई उससे भी ज्यादा गहरी है। मसलन, नीचे की 50 फीसदी आबादी के पास कुल आमदनी का महज 15 फीसदी हिस्सा जाता है, जबकि शीर्ष एक प्रतिशत लोगों की जेब 22.6 प्रतिशत हिस्सा चला जाता है।
धन की बात करें, तो निम्न आधी आबादी के पास देश के कुल धन का महज 6.4 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि इसका 40.1 फीसदी हिस्सा टॉप एक प्रतिशत लोगों के पास है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि निम्न 50 प्रतिशत आबादी की औसत सालाना आय एक लाख रुपये से कम है, जबकि उसके बाद की 40 फीसदी आबादी की औसत सालाना आय साढ़े चार लाख रुपये से कम है। तो कुल मिलाकर जिसे भारत का बाजार का जाता है, वह टॉप दस प्रतिशत लोगों तक सीमित रह जाता है, जिनकी औसत सालाना आय पांच लाख से एक करोड़ रुपये तक है। स्पष्टतः ये आंकड़े भारत के बारे में यथार्थवादी समझ बनाने का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। ऐसी समझ के बिना देश के विकास एवं प्रगति की तमाम बातें हवाई ही बनी रहेंगी।
Leave a comment
You must be logged in to post a comment.



