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जमीनी सूरत का आईना

आम जन का जीवन स्तर गतिरुद्ध हो, शिक्षा उज्ज्वल भविष्य की सीढ़ी नज़र ना आ रही हो, और बेरोजगारी से निपटने के उपाय दिखावटी बन गए हों, तो कैसी सामाजिक शांति की आशा की जा सकती है

विभिन्न जन समूहों में असंतोष क्यों फैल रहा है, सरकार चाहे तो इसे खुद अपने आंकड़ों से समझ सकती है। खुद उसकी नीतियों ने युवा वर्ग में भविष्य के प्रति निराशा भरी है, तो बहुसंख्यक ग्रामीण आबादी की जिंदगी को दूभर बनाया है। कुछ बानगियों पर गौर कीजिए। 2024 में युवा बेरोजगारी दूर करने के लिए धूम-धड़ाके से शुरू की गई प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना अपने लक्ष्य से 99 प्रतिशत पीछे चल रही है। कॉरपोरेट मंत्रालय ने एक आरटीआई अर्जी पर बताया कि 30 अप्रैल 2026 तक कंपनियों ने 2.97 लाख इंटर्नशिप अवसर पैदा किए, जो दो साल के लक्ष्य का लगभग दसवां हिस्सा है। तस्वीर और निराशाजनक हो जाती है, जब ध्यान जाता है कि वास्तविक ऑफर 1.73 लाख ही रह गए।

इनमें से जिन लोगों को ऑफ़र दिए गए, उनमें से लगभग 18,000 लोग ही काम पर पहुंचे। उनमें से केवल 5,200 लोग अंत तक टिके पाए। इस बीच ये आंकड़ा भी चर्चित हुआ है कि केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय के लिए आवंटन 2013-14 (4.6 फीसदी) की तुलना में 2025-26 में आधा (2.5 प्रतिशत) रह गया है। इसी बीच राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की एक ताजा रिपोर्ट से सामने आया है कि सिर्फ 27.7 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों की आय में पिछले वर्ष वृद्धि दर्ज हुई। यह सितंबर 2024 से शुरू हुए इस सर्वे का सबसे निचला स्तर है। इसके मुताबिक 52.6 फीसदी परिवारों की आय में कोई बदलाव नहीं हुआ, जबकि 19.8 प्रतिशत परिवारों की आय गिरी।

यानी 72 फीसदी परिवारों के जीवन स्तर में सुधार दर्ज नहीं हुआ। आय में सुस्ती और वित्तीय दबाव के कारण अनौपचारिक माध्यमों (जैसे रिश्तेदारों, दोस्तों, या स्थानीय साहूकारों) से कर्ज लेने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। ऐसे परिवारों की संख्या 23.6 प्रतिशत हो गई है। जब इस तरह लोगों का जीवन स्तर गतिरुद्ध हो, जमीनी स्तर पर अपनी जर्जर स्थिति के कारण शिक्षा उज्ज्वल भविष्य की सीढ़ी अब नज़र ना आ रही हो, और विकराल बेरोजगारी से निपटने के उपाय दिखावटी बन कर रह जाएं, तो समाज में कैसी स्थिरता और शांति की आशा की जा सकती है?

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By NI Editorial

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