भारत की कथित लोकतांत्रिक राजनीति भटक चुकी है। ‘लोक’ को भरमाने, बहकाने और बहलाने के उपाय ढूंढना ही इसमें कामयाबी का मूलमंत्र बन गया है। वरना, अगर रोजगार की चिंता होती, तो बिहारी नेता इस समस्या पर समग्र नजरिए से विचार करते।
बिहार में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मूल निवासी (डोमिसाइल) का मुद्दा गरमाया हुआ है। महा-गठबंधन के नेता तेजस्वी यादव ने कुछ रोज पहले एलान किया कि उनकी सरकार बनी, तो सभी सरकारी नौकरियां बिहार के मूलवासियों के आरक्षित कर दी जाएंगी। नई उभरी जन सुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर का भी मुख्य मुद्दा अब तक हुई ‘बिहार की उपेक्षा’ और ‘बिहार के पुनरुत्थान’ का उनका वादा है। तो इस बहती गंगा में अब नीतीश कुमार की सरकार ने भी हाथ धोया है। उसने निर्णय लिया है कि अब से बिहार में महिलाओं के लिए आरक्षित पदों पर 35 फीसदी स्थान बिहार की मूलवासी महिलाओं के लिए रिजर्व रहेंगे।
इसी बीच महाराष्ट्र में हिंदी विरोध से बने माहौल का भी बिहार के नेता पूरा लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। जो जुब़ान महाराष्ट्र में हिंदी भाषियों के खिलाफ बोली गई है, उससे भी कहीं आगे जाकर बिहारी नेता उसका जवाब दे रहे हैं। ये बातें क्या बताती हैं? सिर्फ यही कि भारत की कथित लोकतांत्रिक राजनीति भटक चुकी है। ‘लोक’ को भरमाने, बहकाने और बहलाने के उपाय ढूंढना ही इसमें कामयाबी का मूलमंत्र बन गया है। वरना, अगर सचमुच रोजगार की चिंता होती, तो बिहार के नेता इस समस्या के राष्ट्र-व्यापी स्वरूप पर गौर करते। वे समझने और समझाने की कोशिश करते कि आखिर आज मांग के अनुपात में रोजगार पैदा क्यों नहीं हो रहा और बिहार से लोगों का पलायन क्यों होता है?
वे इसके नीतिगत पक्ष पर ध्यान देते। साथ ही भूमि से घिरे और तटीय राज्यों की आर्थिक संचरना के बीच फर्क को समझने की कोशिश करते। साथ ही उन मूलभूत कमियों को भी, जिनकी वजह से बिहार में भौतिक एवं मानव पूंजी के विकास का रास्ता बाधित रहा है। वे इन सबके समाधान पर आम सहमति तैयार कर ठोस योजनाओं पर अमल की दिशा में होड़ करते। मगर यह श्रमसाध्य काम है। आसान रास्ता लोगों की भावनाओं से खेलना है। तो इस खेल में सभी जुटे हुए हैं। वैसे यह बात सिर्फ बिहार की नहीं है। बिहार तो सिर्फ आगामी चुनाव के कारण अभी चर्चा में है।