वित्त मंत्रालय के मुताबिक तीन कारणों से दुनिया नया आकार ले रही हैः महाशक्तियों में प्रतिस्पर्धा, पश्चिमी गठबंधन में दरार, और मैनुफैक्चरिंग में चीन का वर्चत्व। इसके अनुरूप ढलने के लिए भारत के पास बहुत कम वक्त है।
बढ़ती आर्थिक चुनौतियों के बीच वैश्विक आपूर्ति शृंखला में आए बदलावों से तालमेल बनाने के लिए भारत के पास “एक बहुत छोटी खिड़की” मौजूद है। यह बात केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने स्थायी संसदीय समिति के सामने कही। बताया गया कि चीन ने अपने नए कानून के तहत वहां स्थित आपूर्ति शृंखला को बाधित कर दिया है। वहां से अपने कारखाने हटाने वाली कंपनियों को वह दंडित कर रहा है। इससे भारत में मैनुफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए अपनाई गई नीति के सामने मुश्किलें खड़ी हुई हैँ। वित्त मंत्रालय ने कहा कि इस समय ये तीन परिघटनाएं दुनिया को नया आकार दे रही हैः बड़ी ताकतों में प्रतिस्पर्धा, पश्चिमी गठबंधन में दरार, और मैनुफैक्चरिंग में चीन का प्रभुत्व।
मंत्रालय ने कहा कि इन परिवर्तनों पर भारत को अधिक फुर्तीला और रणनीतिक प्रतिक्रिया दिखानी होगी। ऐसा करने के लिए देश के पास ‘बहुत छोटा अवसर’ है। मंत्रालय ने कहा कि महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के तहत व्यापार, तकनीक, और वित्त का उपयोग सामान्य लाभ उठाने के बजाय रणनीतिक हितों के मुताबिक किया जा रहा है। इसी क्रम में चीन ने अपने यहां से कारखाना, तकनीक, या विशेषज्ञों को दूसरे देशों में- खासकर भारत ले जाने की राह में कानूनी रुकावट खड़ी कर दी है। भारत में साझा उद्यम या देशी निवेश के तहत लगाए जा रहे कारखानों की इन मामलों में चीन पर निर्भरता रही है। स्पष्टतः ये दोनों परिघटनाएं भारत के लिए चुनौती बनकर आई हैँ।
हालांकि यूरोप और अमेरिका के बीच पड़ती दरार को वित्त मंत्रालय ने भारत के लिए अवसर के रूप में देखा है, मगर इसका लाभ उठाने के लिए तुरंत खुद को तैयार करने की चुनौती उसके सामने है। मंत्रालय ने माना कि इसके लिए ज्यादा वक्त नहीं है। कहा जा सकता है कि वित्त मंत्रालय को बदल रही दुनिया का सही अहसास है। मगर, नई परिस्थितियों के मुताबिक नजरिए एवं नीतियों में जिस तरह के आमूल परिवर्तन की जरूरत है, उसकी समझ का संकेत उसने नहीं दिया है। क्या बिना घरेलू बाजार के विस्तार पर ध्यान केंद्रित किए, नए बाहरी हालात का मुकाबला किया जा सकता है- यह बुनियादी सवाल है।


