प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार की करनी से पैदा हुई समस्या का मुकाबला करने की सारी जिम्मेदारी नागरिकों पर डालने का प्रयास किया है। मगर उससे हालात नहीं सुधरेंगे। बेहतर होगा वे अपना धनी तबकों पर ले जाएं।
आर्थिक संकट के बारे में प्रधानमंत्री के भाषणों से देश में फैले भय के बीच अब केंद्र ने सोना, चांदी और अन्य कीमती धातुओं के आयात पर शुल्क बढ़ा कर 15 (10 प्रतिशत कस्टम+ 5 फीसदी कृषि एवं विकास उपकर) कर दिया है। गौरतलब है कि सोने का आयात विदेशी मुद्रा भंडार में सेंध लगने का बड़ा कारण बना रहा है। मगर कारणों की पड़ताल करें, तो आयात बढ़ने की सीधी जिम्मेदारी नरेंद्र मोदी सरकार पर जाएगी।
केंद्र ने मई 2022 में यूएई के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर अमल शुरू किया, जिसके तहत वहां से टैरिफ रेट कोटा सिस्टम के तहत स्वर्ण आयात पर शुल्क सामान्य छह प्रतिशत से एक प्रतिशत कम (यानी पांच प्रतिशत) कर दिया गया। इसके पहले (2022 में) भारत के कुल स्वर्ण आयात में यूएई का हिस्सा 7.9 प्रतिशत (2.9 बिलियन डॉलर) था, जो पिछले साल 28 प्रतिशत (16.5 बिलियन डॉलर) हो गया। इस बीच पिछले साल सोने के भाव में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई। इससे सोना आम मध्य वर्ग की पहुंच से बाहर हो गया। जबकि अति धनी लोग खरीदारी करते रहे, जिससे डॉलर बाहर गया। प्रधानमंत्री ने मध्य वर्ग से विदेश जाने से बचने का आह्वान भी किया है। लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक विदेश जाने वाले भारतीयों की संख्या में पिछले दो साल में गिरावट आई है।
फिर भी डॉलर बाहर जाने में बढ़ोतरी हुई, तो उसका कारण अति धनी व्यक्तियों का विदेश में चल और अचल संपत्ति में निवेश है। अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 तक 26.4 बिलियन डॉलर का निवेश इन लोगों ने विदेश में किया। ऐसा इसलिए संभव हुआ, क्योंकि मोदी सरकार ने लिबरलाइज्ड रेमिटैंस स्कीम, टैक्स राहत, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस आदि के नाम पर विदेशी कर्मियों के लिए खुद इसका मार्ग प्रशस्त किया। ये मुद्दे इसलिए उठे हैं, क्योंकि नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार की करनी से पैदा हुई समस्या का मुकाबला करने की सारी जिम्मेदारी नागरिकों पर डालने का प्रयास किया है। मगर उससे हालात नहीं सुधरेंगे। बेहतर होगा सरकार संकट-कालीन प्रशासनिक उपाय करे और अपना ध्यान मध्य वर्ग के बजाय धनी तबकों पर ले जाए।
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