economy crisis

  • विषमता की ऐसी खाई

    भारत में घरेलू कर्ज जीडीपी के 40 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गया है। यह नया रिकॉर्ड है। साथ ही यह अनुमान लगाया गया है कि आम घरों की बचत का स्तर जीडीपी के पांच प्रतिशत से भी नीचे चला गया है। भारत के शेयर बाजार का मूल्य सोमवार को चार लाख करोड़ रुपए को पार कर गया। यह नया रिकॉर्ड है। मंगलवार सुबह अखबारों में यह खबर प्रमुखता से छपी। और उसी रोज यह खबर भी आई कि भारत में घरेलू कर्ज जीडीपी के 40 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गया है। यह भी नया रिकॉर्ड है। साथ ही...

  • मुश्किल में एमएमसीजी क्षेत्र

    हिंदुस्तान लीवर से लेकर आईटीसी, मेरिको, बजाज कंज्यूमर केयर और ज्योति लैब्स तक को अगले सितंबर तक बिक्री बढ़ने की संभावना नजर नहीं आ रही है। इस वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही के नतीजों ने इन कंपनियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। Economy crisis यह भी पढ़ें: भाजपा के दक्कन अभियान की चुनौतियां आम उपभोग के सामान बनाने वाली (एफएमसीजी) लगभग सभी कंपनियां इस निष्कर्ष पर हैं कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बदहाली के कारण फिलहाल उनके कारोबार की संभावनाएं मद्धम हैं। हिंदुस्तान लीवर से लेकर आईटीसी, मेरिको, बजाज कंज्यूमर केयर और ज्योति लैब्स तक को अगले सितंबर तक...

  • सरकारी दावों के विपरीत

    अगर आम जन की वास्तविक आय नहीं बढ़ती है, तो उनका उपभोग घटता है, जिसका असर बाजार में मांग पर पड़ता है और अंततः यह स्थिति कारोबार जगत को प्रभावित करती है। अब ऐसा होने के साफ संकेत मिल रहे हैं। भारत में आर्थिक वृद्धि दर के लाभ आम जन तक नहीं पहुंच रहे हैं, इस बारे में तो पहले से पर्याप्त आंकड़े मौजूद रहे हैं। लेकिन अब व्यापार जगत का कारोबार भी मद्धम हो चला है, यह रोज-ब-रोज जाहिर हो रहा है। वैसे देखा जाए, तो इन दोनों परिघटनाओं में सीधा संबंध है। अगर आम जन की वास्तविक आय...

  • तमाम शोर के बावजूद

    ऐसे आंकड़े सामने आए हैं, जो सवाल उठाते हैं कि जिस तीव्रतम गति से आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्था का शोर है, उसका संबंध भारतीय आबादी के किस और कितने बड़े हिस्से से है? और जो बाकी आबादी है, उसका इस अर्थव्यवस्था में कितना दांव है? शोर यह है कि भारत विश्व अर्थव्यवस्था का अगला हॉट स्पॉट है। चीन के गिरने और भारत के उठने की कहानियों से मीडिया पटा हुआ है। जबकि उसी समय हर कुछ दिन पर ऐसी सच्चाइयां सामने आती हैं, तो हमारा सामना सिक्के के दूसरे पहलू से करा जाती हैं। ऐसे आंकड़े सामने आते हैं, जो...

  • अर्थव्यवस्था की असल कहानी

    अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश करने की तमाम कोशिशों के बावजूद अखबारी सुर्खियां लगभग रोज ही असल कहानी बता रही हैं। बिगड़ते हालात का कारण हैः अनिश्चित आर्थिक माहौल, ऊंची महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी, औसत वेतन में कम बढ़ोतरी और अर्थव्यवस्था की (अंग्रेजी के) के अक्षर जैसी रिकवरी। भारतीय अर्थव्यवस्था की खुशहाल कहानी प्रचारित करने की कोशिशें अपनी जगह हैं, लेकिन इनके बीच ही देश के आम जन का असली हाल का इजहार मुख्यधारा मीडिया की सुर्खियों से भी हो जाता है। कोई ऐसा दिन नहीं जाता, जब अखबारों में ऐसी कोई खबर देखने को ना मिले, जिनसे देश में घटती...

  • ब्रिटेन की ये बदहाली

    अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश करने की तमाम कोशिशों के बावजूद अखबारी सुर्खियां लगभग रोज ही असल कहानी बता रही हैं। बिगड़ते हालात का कारण हैः अनिश्चित आर्थिक माहौल, ऊंची महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी, औसत वेतन में कम बढ़ोतरी और अर्थव्यवस्था की (अंग्रेजी के) के अक्षर जैसी रिकवरी। भारतीय अर्थव्यवस्था की खुशहाल कहानी प्रचारित करने की कोशिशें अपनी जगह हैं, लेकिन इनके बीच ही देश के आम जन का असली हाल का इजहार मुख्यधारा मीडिया की सुर्खियों से भी हो जाता है। कोई ऐसा दिन नहीं जाता, जब अखबारों में ऐसी कोई खबर देखने को ना मिले, जिनसे देश में घटती...

  • बदहाली का फैलता दायरा

    अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश करने की तमाम कोशिशों के बावजूद अखबारी सुर्खियां लगभग रोज ही असल कहानी बता रही हैं। बिगड़ते हालात का कारण हैः अनिश्चित आर्थिक माहौल, ऊंची महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी, औसत वेतन में कम बढ़ोतरी और अर्थव्यवस्था की (अंग्रेजी के) के अक्षर जैसी रिकवरी। भारतीय अर्थव्यवस्था की खुशहाल कहानी प्रचारित करने की कोशिशें अपनी जगह हैं, लेकिन इनके बीच ही देश के आम जन का असली हाल का इजहार मुख्यधारा मीडिया की सुर्खियों से भी हो जाता है। कोई ऐसा दिन नहीं जाता, जब अखबारों में ऐसी कोई खबर देखने को ना मिले, जिनसे देश में घटती...

  • अब प्रश्न औचित्य का

    अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश करने की तमाम कोशिशों के बावजूद अखबारी सुर्खियां लगभग रोज ही असल कहानी बता रही हैं। बिगड़ते हालात का कारण हैः अनिश्चित आर्थिक माहौल, ऊंची महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी, औसत वेतन में कम बढ़ोतरी और अर्थव्यवस्था की (अंग्रेजी के) के अक्षर जैसी रिकवरी। भारतीय अर्थव्यवस्था की खुशहाल कहानी प्रचारित करने की कोशिशें अपनी जगह हैं, लेकिन इनके बीच ही देश के आम जन का असली हाल का इजहार मुख्यधारा मीडिया की सुर्खियों से भी हो जाता है। कोई ऐसा दिन नहीं जाता, जब अखबारों में ऐसी कोई खबर देखने को ना मिले, जिनसे देश में घटती...

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