तो सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं!
हकीकत यही है कि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में मैनुफैक्चरिंग की हिस्सेदारी बढ़ाने के प्रयास सफल नहीं हुए। 'मेक इन इंडिया', पीएलआई योजना, बुनियादी ढांचे में निवेश, डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक आपूर्ति-शृंखला में आए परिवर्तनों का लाभ उठाने के अवसर सामने थे, लेकिन मैनुफैक्चरिंग क्षमता, रोजगार देने की क्षमता, आपूर्ति-शृंखला की गहराई और देश में तकनीकी सेवाओं का जाल फैलाने की कोशिशें अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंच पाईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या उनके मंत्री राजनीतिक कारणों से सार्वजनिक मंचों पर चाहे जो बोलते हों, मगर भारत सरकार का आंतरिक आकलन यह है कि अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर वह लाचार...