यूरोपीय देशों की मुश्किल यह है कि अमेरिका का साया उन पर नहीं रहा, रूस से उनकी दुश्मनी है, और चीन को वे अपने आर्थिक हितों के लिए खतरा मानते हैं। जबकि आज की दुनिया में यही सबसे बड़ी ताकतें हैं।
पिछले महीने दावोस में हुए वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम के बाद अब जर्मनी में हुए म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में दुनिया में आए आमूल परिवर्तन से पैदा हुई चुनौतियां की गूंज सुनने को मिली। दावोस में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी जो कहा, उसे म्यूनिख में जर्मन चांसलर फ्रीडरिक मर्त्ज और अन्य यूरोपीय नेताओं ने दोहराया। स्वाभाविक रूप से यूरोपीय नेता इस परिवर्तन से अधिक परेशान हैं, क्योंकि नई परिस्थितियों में अमेरिका उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी से मुकरता नजर आया है। उलटे डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने रूस से तार जोड़ लिए हैं, जिसे यूरोपीय सरकारें अपने लिए सबसे बड़ा खतरा मानती हैं। जर्मन चांसलर ने म्यूनिख में अपने यूरोपीय सहयोगियों को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि ‘नियम आधारित’ पुरानी विश्व व्यवस्था अब मौजूद नहीं है।
उसकी जगह महाशक्तियों की होड़ ने ले ली है। मर्त्ज ने इसे यूरोप के लिए खतरे की घंटी बताया। कहा कि हम अब एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं, जो खुले तौर पर ताकत और सत्ता की राजनीति से परिभाषित होता है- जहां हर नियम-कायदे पर राष्ट्रीय हितों को तरजीह दी जा रही है। वैश्विक शक्ति संतुलन में अमेरिका की स्थिति पर भी उन्होंने स्पष्ट राय रखी। चेतावनी दी कि वैश्विक नेतृत्व पर अमेरिका का दावा अब चुनौती के घेरे में है- शायद यह खो भी चुका है। नतीजतन, दुनिया अब अनिश्चितता के दौर में है।
यूरोपीय देशों की मुश्किल यह है कि अमेरिका का साया उन पर नहीं रहा, रूस से उनकी दुश्मनी है, और चीन को वे अपने आर्थिक हितों के लिए खतरा मानते हैं। जबकि आज की दुनिया में यही सबसे बड़ी ताकतें हैं। म्यूनिख में चीन की कई नेताओं ने यह कहते हुए कड़ी आलोचना की कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था सुनियोजित रूप से दूसरे देशों की निर्भरता का फायदा उठाती है। चीन अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नई व्याख्या कर रहा है और नियमों को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़ रहा है। मगर करें क्या? इस सवाल पर कोई साफ समझ सामने नहीं आई। इस रूप में म्यूनिख दावोस का एक और संस्करण बनकर रह गया।
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