चीन के साथ व्यापार भारत की प्रादेशिक अखंडता को उसकी चुनौतियों के साये में जारी नहीं रह सकता। यह बात भारत सरकार को दो-टूक कहनी चाहिए। निम्न कसौटी जैसे जुमलों से देश में भरोसा नहीं बंधेगा।
भारत- चीन के बीच फिर ज़ुबानी तकरार हुई है। इस बार मुद्दा लद्दाख का है। भारत ने अपने आधिकारिक नक्शे पर वहां के 28 स्थलों को प्रामाणिक नाम दिए, जिनमें गोगरा और हॉट स्प्रिंग जैसे टकराव वाली जगहें भी शामिल हैं। चीन ने इसे “गैर-कानूनी और अमान्य” कदम बताया। दावा किया कि ये क्षेत्र उसके हैं। भारत ने इसका उतने ही सख्त लहजे जवाब दिया। भारत ने ताजा कदम चीन- पाकिस्तान के संयुक्त सीमा आयोग को सक्रिय करने के फैसले के बाद उठाया है। वह आयोग जम्मू-कश्मीर के उन इलाकों से संबंधित है, जिन्हें अवैध कब्जा करने के बाद पाकिस्तान ने चीन को दे दिया था।
बहरहाल, जिस रोज भारत और चीन के विदेश मंत्रालयों में गरमा-गरमी हुई, उसी दिन विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि चीन से संबंध के मामले में भारत ने अपना पैमाना काफी नीचे रखा हुआ है। इसकी व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा- ‘हम इस पर जोर नहीं दे रहे हैं कि सीमा विवाद को हल करना आर्थिक संबंध जारी रखने की पूर्व शर्त है। हम यह कह रहे हैं कि कारोबार जारी रखने के लिए सरहद पर अमन बने रहना जरूरी है।’ मगर बीते अगस्त में सीमा विवाद पर दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों की बैठक के बाद कहा गया था कि दोनों देशों के बीच सीमा निर्धारण की प्रक्रिया में तेजी लाने और सीमा प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए 8-सूत्री सहमति बनी है।
इनमें सबसे खास था सीमा निर्धारण के लिए विशेषज्ञों के समूह का गठन। साथ ही सीमा के बेहतर प्रबंधन के लिए कार्य दल बनाने और उसके लिए विचार बिंदुओं पर भी सहमति बनी थी। उसके बाद दो महीनों के अनुभव से साफ है कि इन सहमतियों से ना तो अरुणाचल प्रदेश में चीन की दखलंदाजियों से पैदा हुआ विवाद थमा और ना ही लद्दाख में माहौल सुधरा है। इस बीच व्यापार में जरूर गति आई है। लेकिन व्यापार भारत की प्रादेशिक अखंडता पर बार-बार गहराते सवालों के साये में नहीं हो सकता। यह बात भारत सरकार को दो-टूक कहनी चाहिए। निम्न कसौटी जैसे जुमलों से देश में भरोसा नहीं बंधेगा।
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