जिस दौर में संचार माध्यमों की भरमार है और किसी भी प्रतिबंधित ऐप का इस्तेमाल वीपीएन पर जाकर किया जा सकता है, तब एक ऐप को प्रतिबंधित करने का क्या तुक हो सकता है?
अनुमान लगाना कठिन है कि भारत सरकार के कर्ता-धर्ता सचमुच यह मानते हैं कि कुछ दिखावटी कदमों का एलान कर देने से ढहती जा रही परीक्षा व्यवस्था को दुरुस्त कर लिया जाएगा, अथवा उन्हें यह लगता है कि ऐसी घोषणाओं से लोग संतुष्ट हो जाएंगे? फिलहाल अतार्किक कदमों की शृंखला को आगे बढ़ाते हुए 21 जून को दोबारा होने वाली नीट परीक्षा के मद्देनजर मैसेजिंग ऐप टेलीग्राम को प्रतिबंधित करने का निर्णय लिया गया है। लेकिन अगर पेपर सिस्टम के अंदर बैठे हुए लोग लीक करते हैं, तो एक मैसेजिंग ऐप का इस्तेमाल रोकने से लीक कैसे रुकेगी, इसे समझना किसी के लिए कठिन है।
जिस दौर में मैसेजिंग ऐप्स या अन्य संचार माध्यमों की भरमार है और किसी प्रतिबंधित ऐप का इस्तेमाल वीपीएन पर जाकर किया जा सकता है, ऐसे कदम का क्या तुक हो सकता है? जिस रोज से ये फैसला लिया गया, उसी दिन ये चर्चा गर्म थी कि इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी में जारी परीक्षाओं के कुछ पेपर लीक हुए हैं और उन्हें मैसेजिंग ऐप के जरिए 199 रुपये में बेचा जा रहा है। इसी यूनिवर्सिटी की एक स्नातकोत्तर परीक्षा में देश भर के केंद्रों में गलत पेपर वितरित किए जाने की खबर भी मीडिया में आई है। सीबीएसई की 12वीं की परीक्षा में ऑन स्क्रीन मार्किंग में हुई गड़बड़ियां अभी भी चर्चा में हैं।
इन मामलों में जवाबदेही तय नहीं हुई है। जबकि इस सिलसिले में सबसे बड़ा प्रश्न उत्तरदायित्व का ही उठा है। यह निर्विवाद है कि जब तक जवाबदेही तय करने की कारगर व्यवस्था नहीं होगी, पेपर लीक तथा परीक्षा आयोजन संबंधी अन्य कुव्यवस्थाओं पर रोक लगाना कठिन बना रहेगा। इसीलिए नीट पेपर लीक और सीबीएसई उत्तर पुस्तिका जांच में गड़बड़ी के मामलों में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग ने जोर पकड़ा है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस दिशा में पहल करने के बजाय सरकार मैसेजिंग ऐप प्रतिबंधित कर या प्रश्न-पत्र को वायु सेना के विमानों से परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाने जैसी बात कह कर लोगों को भरमाने का प्रयास कर रही है। यह दरअसल, एक बेहद गंभीर मसले का मखौल बनाना है।


