nayaindia one nation one election कृत्रिम स्थिरता की चाहत
Editorial

कृत्रिम स्थिरता की चाहत

ByNI Editorial,
Share
one nation one election
one nation one election

एक राष्ट्र-एक चुनाव’ योजना की प्रेरक सोच पर गंभीर सवाल हैं। ऐसी ही सोच के तहत दल-बदल विरोधी कानून बनाया गया था। उससे दल-बदल तो नहीं रुका, इससे सांसदों-विधायकों की स्वतंत्र चेतना पर जरूर ताला लग गया। one nation one election 

खबरों के मुताबिक ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ योजना पर 22वां विधि आयोग अपनी सिफारिशें जल्द ही केंद्र सरकार को सौंप देगा। इस बीच आयोग ने अपनी सिफारिशों की प्रस्तुति पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद के नेतृत्व में बनी उच्चस्तरीय समिति के सामने की है। इसमें दो संविधान संशोधनों की सिफारिश की गई है।

कोविंद समिति नरेंद्र मोदी सरकार की इस इच्छा पर सुझाव देने के लिए बनाई गई है कि लोकसभा, सभी राज्यों की विधानसभाओं, और पूरे देश में नगर-निकायों के चुनाव एक साथ संपन्न कराए जाएं। इस बीच विधि आयोग ने जो सुझाव रखे हैं, उसके मुताबिक सभी विधानसभाओं के चुनाव दो किस्तों में इस तरह संपन्न कराए जाएंगे, जिससे 2029 में लोकसभा के साथ-साथ उन सबका चुनाव कराया जा सके। एक दूसरा संशोधन इस योजना को टिकाऊ बनाने के लिए दिया गया है। one nation one election

इसके तहत अगर सदन की मध्यावधि में कोई सरकार गिर जाती है, तो विकल्प के तौर पर विभिन्न दलों की ‘एकता सरकार’ बनाई जाएगी। अगर यह संभव नहीं हुआ, तो फिर नया चुनाव बची अवधि भर तक के लिए कराया जाएगा, ताकि एक राष्ट्र- एक चुनाव का क्रम बना रहे। इस योजना में यह समझ अंतर्निहित है कि सभी दलों की नीतियां कमोबेश एक जैसी हैं और सारी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा व्यक्तियों की महत्त्वाकांक्षाओं के बीच है।

इसलिए यूनिटी गवर्नमेंट सहजता से बन जाएगी। बहरहाल, उससे कहीं ज्यादा गंभीर सवाल इस योजना की प्रेरक सोच पर है। स्पष्टतः यह सोच कृत्रिम राजनीतिक स्थिरता थोपने की है । ठीक ऐसी ही सोच के तहत 1985 में दल-बदल विरोधी कानून बनाया गया था। इस कानून से दल-बदल तो नहीं रुका, इससे सांसदों-विधायकों के स्वतंत्र राजनीतिक रुख तय करने की प्रवृत्ति पर जरूर ताला लग गया। one nation one election

अब जो सुझाव विधि आयोग ने दिए हैं, उनसे राजनीतिक प्रक्रिया और सरकारों को जवाबदेह बनाए रखने की विधायिका की भूमिका पर वैसा ही अंकुश लग सकता है। आज भारतीय लोकतंत्र की मूलभूत समस्या सत्तासीन लोगों और संस्थाओं की जवाबदेही तय करने की व्यवस्था का कमजोर पड़ते जाना है। अब जो सुझाव दिए गए हैं, उनसे खर्च तो शायद ही बचे, लेकिन जवाबदेही का सिस्टम जरूर और कमजोर हो जाएगा।  one nation one election

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

और पढ़ें

  • भारत का डेटा संदिग्ध?

    एक ब्रिटिश मेडिकल जर्नल, जिसके विचार-विमर्श का दायरा राजनीतिक नहीं है, वह भारत के आम चुनाव के मौके पर संपादकीय...

  • युद्ध की फैली आग

    स्पष्टतः पश्चिम एशिया बिगड़ती हालत संयुक्त राष्ट्र के तहत बनी विश्व व्यवस्था के निष्प्रभावी होने का सबूत है। जब बातचीत...

  • एडवाइजरी किसके लिए?

    भारत सरकार गरीबी से बेहाल भारतीय मजदूरों को इजराइल भेजने में तब सहायक बनी। इसलिए अब सवाल उठा है कि...

  • चीन पर बदला रुख?

    अमेरिकी पत्रिका को दिए इंटरव्यू में मोदी ने कहा- ‘यह मेरा विश्वास है कि सीमा पर लंबे समय से जारी...

Naya India स्क्रॉल करें