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‘समरसता’ में तनाव?

जब ‘सामाजिक न्याय’ की राजनीति उभरी, तब उसकी काट के तौर पर आरएसएस-भाजपा ने ‘सामाजिक समरसता’ की रणनीति पेश की थी, जो काफी हद तक कामयाब रही। लेकिन हालिया घटनाओं ने संकेत दिया है कि अब रणनीति के आगे चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।

मुमकिन है कि राजपूत जाति का भारतीय जनता पार्टी से “विद्रोह” दिखावटी हो और उससे भाजपा को असल में कोई नुकसान ना हो। फिर भी जिस पैमाने पर गुजरात से पश्चिम उत्तर प्रदेश और राजस्थान तक इस जाति के लोग नरेंद्र मोदी के विरुद्ध गुस्सा जताते नजर आए, उससे आरएसएस-भाजपा की ‘सामाजिक समरसता’ की रणनीति में तनाव पैदा होने का संकेत मिला है। यह अकेली घटना होती, तो उसके आधार पर कोई सामान्य राय जताना संभवतः उचित नहीं होता। लेकिन हाल में महाराष्ट्र में ऐसे ही तनाव का नज़ारा मराठा और ओबीसी समुदाय के बीच देखने को मिला है। उधर कुछ अन्य राज्यों में आदिवासी और ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर एक दूसरे के खिलाफ सड़कों पर उतरे हैं। इन सभी समुदायों में सामान्य बात यह है कि कम-से-कम एक दशक से मोटे तौर पर ये भाजपा का वोट आधार हैं। स्मरणीय है कि 1990 के दशक में जब ‘सामाजिक न्याय’ की राजनीति उभरी, तब उसकी काट के तौर पर आरएसएस-भाजपा ने ‘सामाजिक समरसता’ की रणनीति पेश की, जिसे कुछ हलकों में ‘सोशल इंजीनियरिंग’ भी कहा गया।

लक्ष्य था सभी जातियों को प्रतिनिधित्व देते हुए राजनीतिक अर्थ में हिंदू समुदाय की व्यापक एकता कायम करना। अल्पसंख्यकों- खासकर मुस्लिम समुदाय को हिंदू हितों के विरुद्ध पेश कर इस एकता का आधार तैयार किया गया। ये रणनीति 2019 आते-आते अपनी सफलता के चरम पर ऩजर आई। लेकिन अब चुनौती यह है कि कैसे सभी जातियों की आकांक्षाओं और उनके वास्तिवक हितों के बीच तालमेल बनाकर उनकी एकता कायम रखी जाए? इन जातियों की सामाजिक हैसियत में जो अंतर है, उसके बीच ऐसा करना आसान नहीं है। चूंकि जमीनी स्तर पर आर्थिक विकास ठप है, इसलिए हर जाति की तरफ से अधिक आरक्षण की मांग तीखी होती जा रही है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व की भी सीमा है। इस बिंदु पर अक्सर आकांक्षाएं टकराव के मुकाम पर पहुंच जाती हैं। वैसे में जातीय गौरव और अल्पसंख्यक विरोधी भावनाएं ही जोड़ने वाले तत्व रह जाती हैं। हालिया घटनाओं ने संकेत दिया है कि दीर्घकालिक नजरिए से यह पर्याप्त नहीं है। संभव है, आने वाले वर्षों में यह संकेत और मजबूत हो कर उभरे।

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