एसआईआर संसद के शीतकालीन सत्र में विवाद का बड़ा मुद्दा बनता दिख रहा है। उचित होगा कि सरकार पुराने संसदीय नियमों का हवाला देकर मौजूदा हाल पर बहस को ना रोके। सदन में सबको अपनी बात कहने दी जाए।
किसी प्रक्रिया के जारी रहने के दौरान उसके नियम बदलते रहें, तो उसे इसकी मिसाल ही समझा जाएगा कि संबंधित संस्था ने काम शुरू करने के पहले पर्याप्त तैयारी नहीं की। उस हाल में वह प्रक्रिया विवादों से घिरती जाए, यह लाजिमी है। इसकी पूरी जिम्मेदारी संचालक संस्था पर ही आएगी। मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर यह बात पूरी तरह लागू होती है। इसको लेकर पहले ही चेताया गया था कि इस कार्य को लेकर निर्वाचन आयोग जल्दबाजी दिखा रहा है। साथ ही इसकी विश्वसनीयता को लेकर भी वह गंभीर नहीं है। बिहार में पुनरीक्षण के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर कई बार उसे नियम बदलने पड़े, लेकिन उससे भी आयोग ने सबक नहीं लिया।
पुराने अंदाज में 12 राज्यों में सीमित समय के भीतर यह कार्य संपन्न कराने की जिद उसने दिखाई। नतीजा है कि यह प्रक्रिया अब पहले से भी अधिक विवादित हो चुकी है। बूथ स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) की आत्महत्या, काम के दबाव से मौत, और उनके तनावग्रस्त होने की खबरों ने आक्रोश एवं संशय का जो माहौल बनाया, उसी का नतीजा है कि बीच कार्य के दौरान आयोग को बीएलओ और सुपरवाइजरों के मानदेय एवं प्रोत्साहन राशि में वृद्धि करनी पड़ी। और अब एसआईआर फॉर्म इकट्ठा करने, इन्हें डिजटल रूप देने, तथा अस्थायी मतदाता सूची को जारी करने की समयसीमा बढ़ानी पड़ी है।
साथ ही अब जाकर आयोग ने एलान किया है कि जो नए नाम शामिल होंगे और जिन्हें हटाया जाएगा, सूची जारी होने के पहले उनकी लिस्ट राजनीतिक दलों के बूथ स्तरीय एजेंटों को दी जाएगी। सवाल है कि यह नियम आरंभ में ही घोषित क्यों नहीं होना चाहिए था? दरअसल, वे तमाम नियम आरंभ से लागू क्यों नहीं होने चाहिए थे, जो न्यायिक आदेश के कारण इसका हिस्सा बने? एसआईआर का प्रश्न संसद के शीतकालीन सत्र में विवाद का एक बड़ा मुद्दा बनता दिख रहा है। सरकार के लिए उचित होगा कि पुराने संसदीय नियमों का हवाला देकर मौजूदा हाल पर बहस को वह ना रोके। बल्कि सदन में सबको अपनी बात कहने दी जाए। चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता के लिए यह अनिवार्य है।


