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युद्धः नौ दिन बाद

अमेरिका- इजराइल और ईरान का युद्ध किसी एक पक्ष की लड़ सकने की क्षमता चूकने जारी रहने की आशंका गहरी होती चली गई है। इसीलिए इसके संभावित आर्थिक एवं भू-राजनीतिक परिणामों को लेकर अब दुनिया चिंतित नजर आ रही है।

ईरान पर अमेरिका- इजराइल के साझा हमले के बाद पहले नौ दिन में जाहिर हुआ है कि ये जंग दूसरे विश्व युद्ध के बाद तमाम अमेरिकी युद्धों से कई मामलों में अलग है। आठ दशक में पहली बार हुआ है, जब किसी देश ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को इतने व्यापक रूप से और इतनी गहराई तक जाकर निशाना बनाया हो। अमेरिकी अपेक्षा से अधिक लंबा खिंचते युद्ध में साजो-सामान की सप्लाई को लेकर वॉशिंगटन में जैसी चिंता नज़र आई हैं, वह भी नई बात है।

उधर ईरान के हमलों में एक खास पैटर्न दिखा है। उसने ना सिर्फ खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों पर हमले किए हैं, बल्कि इस भरोसे पर भी चोट की है कि अमेरिकी सैन्य संरक्षण में कोई देश सुरक्षित हो जाता है। यूएई, कुवैत, कतर से लेकर ओमान और सऊदी अरब तक में इस समय जैसी बेचैनी है, वह इस विश्वास के कमजोर पड़ने से पैदा हुई बेबसी का नतीजा है। इस दौरान अमेरिकी वित्तीय वर्चस्व के आधार पेट्रोडॉलर के सिस्टम को भी ईरान ने क्षति पहुंचाने की कोशिश की है। होरमुज डलमडरुमध्य को रोक कर उसने कच्चे तेल के कारोबार को काफी हद तक
रोक दिया है।

इस तरह उसने वैश्विक आर्थिक संकट पैदा करने की अपनी ताकत दिखाई है। इस रूप में यह युद्ध वैश्विक प्रभाव डालने वाली घटना बन गई है। दूसरी तरफ अमेरिका- इजराइल ने आरंभिक हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व का खात्मा करने के बाद कॉरपेट बॉम्बिंग का तरीका अपनाया है, जिसमें ईरान की आबादी, शहरों और बुनियादी ढांचे को बेहद नुकसान हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप थल सेना को उतारने की बात भी कर चुके हैं, जो इसकी स्वीकृति है कि दूर से हमला कर मकसद साध लेने का तरीका ईरान में कामयाब होता नजर नहीं आता रहा। ऐसे में किसी एक पक्ष की लड़ सकने की क्षमता चूकने तक इस युद्ध के चलते रहने की आशंका हर रोज गहरी होती चली गई है। इसीलिए इसके संभावित दूरगामी आर्थिक एवं भू-राजनीतिक परिणामों का आकलन किया जाने लगा है, जो पूरी दुनिया के लिए चिंता का सर्व-प्रमुख कारण बना हुआ है।

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By NI Editorial

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