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अकेले लोगों का मीडिया!

युवा या किसी उम्र वर्ग के व्यक्ति को सोशल मीडिया की लत क्यों लगती है? कुछ अध्ययनों के मुताबिक युवा अपने खालीपन की भरपाई सोशल मीडिया से करते हैं, जहां अल्पकालिक उत्तेजना और निरर्थक सूचना देने वाले स्रोतों की भी भरमार है।

भारत सहित तमाम देशों में सोशल मीडिया युवाओं के बीच खुशी घटा रहा है। वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट- 2026 के अनुसार कुल मिलाकर युवाओं की खुशी पर सोशल मीडिया का असर नकारात्मक है। बहरहाल, उभरे रुझानों के लिए महज सोशल मीडिया को दोष देना शायद ठीक ना हो। खुद इसी रिपोर्ट के मुताबिक जो युवा सोशल मीडिया का रोजाना एक घंटे से कम इस्तेमाल करते हैं, वे इससे खुशी और संतुष्टि प्राप्त करते हैं। संभवतः इसलिए कि इस दौरान वे अपने दोस्त- रिश्तेदारों से संपर्क करते हैं और अपने लिए जरूरी सूचनाएं या मनोरंजन हासिल कर लेते हैं। उसके बाद वास्तविक समाज या इनसानी दायरे से जुड़ने के लिए उनके पास पर्याप्त समय रहता है, जहां उन्हें बेहतर अहसास हासिल होता है।

तो प्रश्न है कि आखिर युवा या किसी उम्र वर्ग के व्यक्ति को सोशल मीडिया की लत क्यों लगती है? क्या यह परिवार में बढ़ते एकाकीपन एवं समाज में घटती सामूहिकता का परिणाम है? कुछ अध्ययनों के मुताबिक उपरोक्त कारणों से युवा खालीपन का शिकार होते हैं, जिसकी भरपाई वे सोशल मीडिया से करते हैं, जहां अल्पकालिक उत्तेजना, क्षणिक मनोरंजन, और निरर्थक सूचना देने वाले स्रोतों की भी भरमार है। हैप्पीनेस रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि युवाओं के सोशल मीडिया उपयोग पर नियंत्रण की दिशा में नीति-निर्माताओं को कदम उठाने चाहिए। दरअसल, हाल में कई देशों और भारत के कुछ राज्यों में ऐसे कदम उठाए भी गए हैं।

मगर उनकी सफलता संदिग्ध है, क्योंकि बच्चों और युवाओं के सामने समय के बेहतर और आनंददायक उपयोग का विकल्प दिए बिना जबरन सोशल मीडिया से उन्हें अलग करना अलग तरह की मुश्किलों को जन्म दे सकता है। वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट विभिन्न देशों के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद, सामाजिक सहायता प्रणालियों की उपलब्धता, स्वस्थ जीवन प्रत्याशा, जीवन संबंधी फैसले लेने की स्वतंत्रता की स्थिति, समाज में उदारता अथवा दानशीलता की भावना, और भ्रष्टाचार के संबंध में जन-धारणा की कसौटियों पर तैयारी की जाती है। अगर इन बिंदुओं पर समाज में अपेक्षित प्रगति हो, तो संभव है कि फिर सोशल मीडिया की लत की समस्या से भी समाज बचा रह सकेगा।

By NI Editorial

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