टीएमसी की ये उम्मीद गलत साबित हुई कि बांग्ला अस्मिता की प्रतिनिधि के रूप में खुद पेश कर वह ‘हिंदुत्व- हिंदी’ पहचान वाली भाजपा को जीतने से रोक देगी। असम में ऐसी सोच पहले ही गलत साबित हो चुकी है।
पश्चिम बंगाल का सियासी किला फतह करने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने 2026 का विधानसभा चुनाव युद्ध के अंदाज में लड़ा। अपने पास मौजूद तमाम गोले तो उसने वहां दागे ही, केंद्र में सत्ताधारी होने के नाते शासन तंत्र से हासिल होने वाली ताकत एवं प्रभाव का भी बेहिचक उपयोग किया। अपनी खास जूझारू भावना के लिए चर्चित ममता बनर्जी को चारों तरफ से घेर लेने की ये रणनीति कामयाब रही है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की विवादास्पद प्रक्रिया से तृणमूल कांग्रेस के लिए मुकाबले का धरातल असमान हो जाने के संकेत लगातार मिल रहे थे।
निर्वाचन आयोग के अन्य कदमों ने टीएमसी की राह को और भी कठिन बनाया। अन्य संवैधानिक संस्थाओं ने भी चुनाव प्रक्रिया पर उठे प्रश्नों की फिक्र नहीं की। 15 साल लगातार सत्ता में रहने के बाद किसी नेता या पार्टी के लिए चुनावी मुकाबला वैसे भी आसान नहीं रह जाता। एंटी-इन्कबेंसी से उत्पन्न चुनौतियां उसके सामने खड़ी होती हैं। ये सारे पहलू मिलकर इस बार ममता बनर्जी पर भारी पड़े। टीएमसी की ये उम्मीद कमजोर जमीन पर खड़ी नजर आई कि बांग्ला अस्मिता की प्रतिनिधि के रूप में खुद पेश कर वह ‘हिंदुत्व- हिंदी’ पहचान वाली भाजपा को जीतने से रोक देगी। असम में ऐसी सोच एक दशक पहले ही गलत साबित हो चुकी थी। अब वहां भाजपा ने जीत की हैट-ट्रिक बनाई है। इस बार वह और बड़े बहुमत से सत्ता में लौट रही है।
यह इस समझ की पुष्टि है कि मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा के नेतृत्व में उग्र हिंदुत्व और कैश ट्रांसफर के जरिए मतदाताओं को लुभाने की रणनीति वहां कामयाब बनी हुई है। इसके अलावा संभव है राज्य में हुए विवादास्पद परिसीमन का लाभ भी भाजपा को मिला हो। वैसे, इन बातों की आड़ लेकर कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों को जनता से दूर रहते हुए सियासत करने (टीएमसी अभी तक इसका अपवाद है) की अपनी कमजोरी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उन्हें देर-सबेर यह समझना होगा कि उनका मुकाबला बुल्डोजर जैसी एक चुनाव मशीनरी से है, जो जीत की राह में किसी नैतिक बाधा से बंधी हुई नहीं है।


