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तमिलनाडु की नई पसंद

टीवीके के संस्थापक विजय खुद को पेरियार की विरासत से जोड़ते हैं और भारतीय संविधान को अपनी आस्था का दस्तावेज मानते हैं। इस रूप कहा जा सकता है कि तमिलनाडु ने सिर्फ चेहरा बदला है, राजनीतिक विचारधारा नहीं।

तमिलनाडु में 59 साल बाद ऐसा हुआ है, जब वहां द्रविड़ मुनेत्र कड़गम या अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के अलावा कोई पार्टी कोई सत्ता की दावेदार बनी है। 1967 में पहली बार डीएमके सत्ता में आई। 1972 में एमजी रामचंद्रन ने इससे अलग होकर एडीएमके का गठन किया। 1967 से 2021 तक डीएमके ने सात बार और एडीएमके ने पांच बार सरकार बनाई। मगर 2026 में ये सिलसिला टूटने जा रहा है। चंद्रशेखर जोसेफ विजय पहले ही दांव में अपनी पार्टी टीवीके- तमिल वेट्री कड़गम (तमिल विजय संघ)- को सबसे बड़ा दल बनवाने में सफल रहे हैं।

फिल्म अभिनेता के रूप में सफल करियर के बाद राजनीति में आए 51 वर्षीय विजय ने 2024 में टीवीके का गठन किया। वे खुद को ईवी रामास्वामी नायकर पेरियार की विरासत से जोड़ते हैं और भारतीय संविधान को अपनी आस्था का दस्तावेज मानते हैं। इस रूप कहा जा सकता है कि तमिलनाडु ने सिर्फ चेहरा बदला है, राजनीतिक विचारधारा नहीं। जयललिता की मृत्यु के बाद एडीएमके के पास वैसे भी कोई लोकलुभावन चेहरा नहीं बचा है। इसके बावजूद इस चुनाव में पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया है, तो यह संभवतः राज्य में मौजूद एंटी इन्कबेंसी (डीएमके सरकार से असंतोष) का परिणाम है। लंबे समय से परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोपों के दाग डीएमके की छवि पर रहे हैं।

मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने गुजरे पांच साल में अपनी राजनीति को हिंदुत्व और हिंदी विरोध पर केंद्रित रखा। मगर जन आंकाक्षाओं के मोर्चे पर वे खरे नहीं उतरे। इससे विजय के उदय की पृष्ठभूमि बनी। बड़ी संख्या में मतदाताओं ने नए चेहरे पर दांव लगाने का मन बनाया। वैसे नीति या कार्यक्रम के मामले में विजय ने भी कुछ नया पेश नहीं किया है। उनका चुनाव घोषणापत्र भी प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण, दुल्हनों को आठ ग्राम सोना जड़ित सिल्क साड़ी देने, 200 यूनिट फ्री बिजली, किसानों की पांच लाख रुपये तक की कर्ज माफी और तमिलनाडु को 2023 तक 1.5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने जैसे बड़बोले वादों से भरा-पड़ा है। यानी तमिलनाडु में नए चेहरे की सदारत में भी लोकलुभावन- यानी वोट खरीदी- की पुरानी सियासत जारी रहेगी।

By NI Editorial

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