क्या तमिलनाडु में राष्ट्रपति शासन लागू करने की जरूरत पड़ेगी? यह अपेक्षित स्थिति नहीं होगी। विधानसभा चुनाव में टीवीके भले बहुमत की संख्या से पीछे रह गई हो, लेकिन निर्विवाद रूप से उसकी राजनीतिक विजय हुई है।
तमिलगा वेट्री गड़गम (टीवीके) के नेता विजय से बहुमत लायक संख्या दिखाने की मांग कर राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर ने के.आर. नारायणन परिपाटी का पालन किया है। राजनीतिक अस्थिरता के उस दौर में तत्कालीन राष्ट्रपति नारायणन ने सरकार बनाने का आमंत्रण देने के पहले बहुमत के बारे में आश्वस्त होने की परंपरा तय की थी। उसके पहले सबसे बड़े दल के नेता को आमंत्रित करने की रवायत थी। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में टीवीके को 108 सीटें मिलीं, लेकिन विजय दो जगह से जीते हैं, अतः उन्हें एक सीट छोड़नी होगी। एक विधायक स्पीकर चुना जाएगा। स्पीकर सामान्य विधायी कार्यवाही में मतदान नहीं करते। इस तरह टीवीके के 106 विधायक बचते हैं। यानी कांग्रेस के पांच सदस्यों का समर्थन मिलने के बाद भी बहुमत की संख्या तक पहुंचने के लिए उसे सात और विधायक जुटाने होंगे। यह असंभव नहीं है, लेकिन फिलहाल ये संख्या टीवीके के पास नहीं है। डीएमके ने इस चर्चा पर विराम लगा दिया है कि एडीएमके के साथ मिलकर वह सरकार बनाने की किसी कोशिश में शामिल होगी। इस सूरत में ये सवाल है कि तमिलनाडु में सरकार गठन को कब तक टाला जा सकता है? क्या वहां राष्ट्रपति शासन लागू करने की जरूरत पड़ेगी? यह अपेक्षित स्थिति नहीं होगी। विधानसभा चुनाव में टीवीके भले बहुमत की संख्या से पीछे रह गई हो, लेकिन निर्विवाद रूप से उसकी राजनीतिक विजय हुई है। ऐसे में उचित होगा कि उसे सरकार बनाने का मौका मिले। यह अच्छी बात है कि डीएमके प्रमुख एम.के. स्टालिन ने विजय को मौका देने के पक्ष में राय जताई है। अब उनकी पार्टी को चाहिए कि वह राज्यपाल को सूचित करे कि वह एक निश्चित अवधि तक सरकार गिराने के किसी प्रयास का हिस्सा नहीं बनेगी। ऐसा आश्वासन एडीएमके और अन्य दल भी दे सकते हैं। इससे सरकार की स्थिरता संबंधी राज्यपाल की चिंता का समाधान हो जाएगा। साथ ही जनादेश का सम्मान करने की एक स्वस्थ परंपरा कायम होगी। उधर विजय को यह दिखाने का मौका मिलेगा कि उनके लोक-लुभावन वादे महज चुनावी हथकंडा नहीं थे, जिनसे लगभग 35 प्रतिशत मतदाता उनकी ओर आकर्षित हो गए!


