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आतंक का साया हटे

ऑपरेशन सिंदूर

आतंक के साये से मुक्ति मिले, यह भारतीय जन मानस की अपेक्षा है। आशा है कि ताजा सैन्य कार्रवाई इस आकांक्षा की पूर्ति तक जारी रहेगी और अब शुरू हुई कार्रवाई सचमुच आर-पार की साबित होगी। 

दशकों से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की दंश झेल रहे भारत ने अब ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के जरिए सशक्त संदेश भेजा है। पाकिस्तान कब्जे वाले कश्मीर और पाकिस्तानी पंजाब में कई ठिकानों पर हमला कर दहशतगर्दियों और उनके संरक्षकों को दो टूक बताया गया है कि भारतीयों के खून बहाने की महंगी कीमत उनको चुकानी पड़ेगी। अब अपेक्षित यह है कि ये कार्रवाई सिर्फ एक संदेश देने तक सीमित ना रहे। 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 में बालाकोट ऑपरेशन के जरिए भारत ने सख्त पैगाम दिए थे, लेकिन उनसे सीमा पार स्थित आतंकवादी ढांचों को खत्म नहीं किया जा सका।

बेशक, इस बार की कार्रवाई उनसे बड़ी है और उससे पाकिस्तान में नुकसान भी ज्यादा हुआ है। अब जरूरत इसके जरिए इतना गहरा असर छोड़ने की है कि आतंकवाद के संचालक अपनी गतिविधियां स्थायी रूप से रोकने के लिए मजबूर हो सकें।

यह संभव है कि मंगलवार रात हुए हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के प्रयास तेज हों और भारत पर कार्रवाई रोकने के लिए दबाव डाला जाए। इसलिए यह भारतीय कूटनीति की परीक्षा का भी वक्त है। यह अच्छी बात है कि मंगलवार रात अपनी सीमा में रहते हुए पाकिस्तानी ठिकानों पर हमला करने के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने अनेक महत्त्वपूर्ण देशों से संपर्क कर उन्हें अपनी कार्रवाई के औचित्य के बारे में बताया।

आतंक के साये से मुक्ति की कार्रवाई

भारत को यह संपर्क लगातार बनाए रखना चाहिए। साथ ही देश को चौकस रखने की जरूरत है। पाकिस्तान के अधिकारी लगातार भारतीय कार्रवाई का जवाब देने की बात कर रहे हैं। भारतीय सेनाएं निश्चित रूप से ऐसी किसी कार्रवाई को सफल ना होने के लिए सतर्क होंगी। पाकिस्तान स्थित आतंकवाद के संरक्षकों को सबक सिखाने के मुद्दे पर पूरा भारत एकमत है।

तमाम राजनीतिक दलों ने जिस तरह एक स्वर से भारतीय सेना की कार्रवाई का समर्थन किया है, वह उत्साहवर्धक है। आम जन का भी पूरा समर्थन भारतीय सेना के साथ है। असल में आतंक के साये से मुक्ति मिले, यह भारतीय जन मानस की अपेक्षा है। आशा है, कि ये कार्रवाई इस आकांक्षा की पूर्ति का लक्ष्य पूरा करने तक जारी रहेगी और अब शुरू हुई कार्रवाई सचमुच आर-पार की साबित होगी।

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By NI Editorial

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