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ब्रज की प्रसिद्ध लठमार होली

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होली का प्रसंग छिड़ते ही मन में बरबस ब्रज का नाम आ जाता है। होली सप्ताह आरम्भ होते ही सबसे पहले ब्रज रंगों में डूब जाता है। होलिकोत्सव के लिए अत्यंत लोकप्रिय नंदगाँव और बरसाना की लट्ठमार होली फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को बड़ी धूमधाम व हर्षोल्लास पूर्वक मनाई जाती है। इस विशेष अवसर पर कई मंदिरों की पूजा करने के बाद नंदगाँव के पुरुष बरसाना होली खेलने जाते हैं और बरसाना की महिलाएं नन्दगांव होली खेलने आती हैं।

1-2 मार्च-लठमार होली

यूँ तो पूरे भारत में अच्छाई पर जीत का प्रतीक पर्व होली का त्यौहार मनाया जाता है, परन्तु उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के नंदगाँव (नन्दगांव) और बरसाना कस्बों में होली का यह त्यौहार पृथक रूप से और अजीबोगरीब प्रकार से मनाया जाता है, जिसे लठमार अर्थात लट्ठमार (लठामार) होली की संज्ञा से अभिहित किया गया है। लठमार का अर्थ है लाठी से मारना अथवा लाठी से मारने वाला और होली रंगों का एक लोकप्रिय भारतीय त्योहार का नाम है। लठमार होली उत्सव का एक रूप है, जिसमें लोग लाठी के साथ एक दूसरे को मारते हैं। बरसाना की लट्ठमार होली सर्वाधिक प्रसिद्ध है। और होली का प्रसंग छिड़ते ही मन में बरबस ब्रज का नाम आ जाता है। होली सप्ताह आरम्भ होते ही सबसे पहले ब्रज रंगों में डूब जाता है। होलिकोत्सव के लिए अत्यंत लोकप्रिय नंदगाँव और बरसाना की लट्ठमार होली फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को बड़ी धूमधाम व हर्षोल्लास पूर्वक मनाई जाती है। इस विशेष अवसर पर कई मंदिरों की पूजा करने के बाद नंदगाँव के पुरुष बरसाना होली खेलने जाते हैं और बरसाना की महिलाएं नन्दगांव होली खेलने आती हैं।

होली की टोलियों में नन्दगांव (नंदगाँव) के पुरूष होने का कारण यह है कि श्रीकृष्ण नंदगांव के ही थे और बरसाने की महिलाएं क्योंकि राधा बरसाने की थीं। राधा की जन्म स्थली बरसाना में यह होली शेष भारत में खेली जाने वाली होली से कुछ दिनों पहले ही शुरू हो जाती है। इस दिन लट्ठ महिलाओं के हाथ में रहता है, और नन्दगाँव के पुरुष अर्थात गोप राधा के मन्दिर लाडलीजी पर झंडा फहराने की कोशिश करते हुए महिलाओं के लट्ठ से बचने की कोशिश करते हैं। मान्यता है कि इस दिन सभी महिलाओं में राधा की आत्मा बसती है, और पुरुष भी हँस-हँस कर लाठियाँ खाते हैं। आपसी वार्तालाप के लिए श्रीकृष्ण और राधा के बीच वार्तालाप पर आधारित होरी गाई जाती है। यह होली उत्सव क़रीब सात दिनों तक चलता है। वृन्दावन की होली भी उल्लास भरी होली होती हैं, जहाँ बाँके बिहारी मंदिर की होली और गुलाल कुंद की होली बहुत महत्त्वपूर्ण है।

ब्रज की लठमार होली के सम्बन्ध में पौराणिक व निबन्ध ग्रन्थों में अनेक कथाएं अंकित हैं। मान्यता है कि ब्रज में स्वयं भगवान ने होलिकोत्सव मनाया था। यही कारण है कि देश -विदेश से लोग ब्रज की गलियों में खेली जाने वाली इस पृथक प्रकार की होली के दर्शन के लिए आते हैं।  मान्यता है कि ऐसा करके भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा द्वापर युग में की जाने वाली लीलाओं की पुनरावृत्ति की जा रही है। इस विशेष प्रकार की होली की शुरुआत ब्रज के बरसाना गाँव से हुई थी। और विगत साढ़े पांच हजार से भी अधिक वर्षों से मनाया जाने वाला यह वार्षिक आयोजन उत्साह और ऐतिहासिक गौरव आज भी मनाया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार नंदगाँव निवासी भगवान श्रीकृष्ण होली के समय राधा के निवास स्थल बरसाना गए थे। गोपियों के साथ मित्रता के लिए भी प्रसिद्ध श्रीकृष्ण के द्वारा बरसाना प्रवास के इस दिन राधा के चेहरे पर रंग लगा दिए जाने से क्षुब्ध राधा की सखियाँ और वहाँ की महिलाओं ने श्रीकृष्ण को बंदी बना लिया और उन पर बांस और डंडे की बौछार कर उन्हें बरसाना से निकाल दिया था।

होली के अवसर पर प्रतिवर्ष भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की इस घटना के स्मरण स्वरूप फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनोरंजन के रूप में लठमार होली मनाई जाती है। प्रतिवर्ष नंदगाँव के पुरुष बरसाना शहर में जाते हैं और वहाँ की महिलाएँ उनको उसी तरह लाठी और रंगों से खेलते हुए बाहर निकालती हैं। लठमार होली से सम्बन्धित एक अन्य  पौराणिक कथा के अनुसार श्रीकृष्ण और उनके साथियों के द्वारा स्नान घाट से कपड़ा चुरा लिए जाने से छुब्ध, गुस्साई और क्रोधित राधा श्रीकृष्ण व उनके साथियों को सबक सिखलाने के लिए अपनी सखियों संग नन्दगांव जाती हैं। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण के जीवन के पलों का स्मरण रखने के लिए नंदगाँव के पुरुष, ग्वाल- बाल विभिन्न मंदिरों में पूजा अर्चना के पश्चात होली खेलने बरसाना जाते हैं, जहाँ महिलाएँ उन्हें लाठी से मार गाँव से बाहर निकाल देती हैं। इन पुरूषों को हुरियारे (होरियारे) कहा जाता है।

एक सप्ताह तक चलने वाली बरसाने की इस होली में पुरुष और महिलाएँ रंगों, गीतों, नृत्यों और लठमार खेल में लिप्त होते हैं। नंदगाँव से बरसाना आने वाले पुरुष महिलाओं को गाने गाकर उन्हें और उकसाते हैं। महिलाएँ गोपियों का काम करती हैं और मस्ती की धुन में पुरुषों पर लाठी बरसाती हैं। बरसाना की महिलाओं के हाथों लाठी खाने वाले पुरुषों को महिलाओं के कपड़े पहनना और सार्वजनिक रूप से नृत्य करना होता है। इस लठमार होली में चोट लगने से बचने के लिए पुरुष सुरक्षात्मक कवच पहने हुए आते हैं। इस लठमार होली में रंग सभी लोगों के उत्साह को और बढ़ाता है। इस खेल में शामिल होने वाले लोग श्रीकृष्ण और उनकी राधा को श्री कृष्ण और श्रीराधे बोलते हुए स्मरण करते हैं। बरसाना की होली के बाद अगले दिन दशमी को बरसाना की महिलाएं नंदगाँव आती हैं और यह उत्सव जारी रहता है। इस वर्ष लठामार होली 1 मार्च 2023 को बरसाना में और 2 मार्च 2023 को नंदगाँव में होगी। श्रीकृष्ण भूमि मथुरा में लठमार होली 3 मार्च को मनाई जाएगी ।

उल्लेखनीय है कि लठमार होली का यह उत्सव बरसाना में राधा को समर्पित एकमात्र मन्दिर राधा रानी मंदिर में होता है। एक सप्ताह तक वृंदावन बांके बिहारी मंदिर में जारी रहने वाले इस विशेष त्यौहार में फूलों से बने रंग और गुलाल का इस्तेमाल किया जाता है। इस पवित्र त्यौहार पर बिहारीजी की मूर्ति को सफेद कपड़े पहने भक्तों द्वारा होली खेलने के लिए लाया जाता है। इसके बाद लोग पानी और रंगों के इस खेल में खो जाते हैं और संगीत के साथ नृत्य करते हैं। लोक व पौराणिक मान्यतानुसार ब्रज की विशेष मस्ती भरी होली होने का कारण यह है कि इसे कृष्ण और राधा के प्रेम से जोड़ कर देखा जाता है। लोक मान्यतानुसार बरसाना की लठमार होली भगवान कृष्ण के काल में उनके द्वारा की जाने वाली लीलाओं की पुनरावृत्ति जैसी है। मान्यता है कि श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ इसी प्रकार कमर में फेंटा लगाए राधारानी तथा उनकी सखियों से होली खेलने पहुंच जाते थे, तथा उनके साथ हंसी- ठिठोली किया करते थे, जिस पर राधारानी तथा उनकी सखियां ग्वाल वालों पर डंडे बरसाया करती थीं। ऐसे में लाठी-डंडों की मार से बचने के लिए ग्वाल वृंद भी लाठी या ढ़ालों का प्रयोग किया करते थे, जो धीरे-धीरे होली की परंपरा बन गया। यही कारण है कि आज भी इस परंपरा का निर्वहन उसी रूप में किया जाता है। नाचते – झूमते गाते गांव में पहुंचने वाले लोगों को औरतें हाथ में ली हुई लाठियों से पीटना शुरू कर देती हैं और पुरुष स्वयं को बचाते भागते हैं। सब मारना पीटना हंसी -खुशी के वातावरण में होता है।

औरतें अपने गांवों के पुरूषों पर लाठियां नहीं बरसातीं, लेकिन शेष आस- पास खड़े लोग बीच -बीच में रंग बरसाते हुए दिखाई देते हैं। बरसाने में टेसू के फूलों के भगोने तैयार रहते हैं। दोपहर तक घमासान लठमार होली का समाँ बंध चुका होता है। नंदगाँव के लोगों के हाथ में पिचकारियाँ और बरसाने की महिलाओं के हाथ में लाठियाँ होती हैं और फिर शुरू हो जाती है होली। पुरूषों को बरसाने वालियों की टोली की लाठियों से बचना होता है, और नंदगाँव के हुरियारे लाठियों की मार से बचने के साथ- साथ उन्हें रंगों से भिगोने का पूरा प्रयास करते हैं। इस दौरान होरियों का गायन भी साथ-साथ चलता रहता है, और आसपास की कीर्तन मंडलियाँ वहाँ जमा हो जाती हैं। धार्मिक परम्परागत भावना से भरपूर अत्यंत मनोरंजन पूर्वक कुछ लोग कपड़े को गीला करके मोड़कर उससे मारते हैं। पुरुष हर सम्भव कोशिश करते हुए बचने के लिए भागते हैं, ढाल से अपने आपको बचाते हैं।

बरसाना की महिलाएं नंदगाँव के व्यक्ति को मार रही होती हैं क्योंकि वे बरसाने में लठमार होली मनाने आए हैं। महिलाएँ पुरुषों को लट्ठ मारती हैं, लेकिन गोपों को किसी भी तरह का प्रतिरोध करने की इजाजत नहीं होती है। उन्हें सिर्फ गुलाल छिड़क कर बरसाना की महिलाओं को चकमा देना होता है। पकड़े जाने पर नंदगांव के पुरुषों की जमकर पिटाई होती है अथवा महिलाओं के कपड़े पहनाकर, श्रृंगार इत्यादि करके उन्हें नचाया जाता है। मान्यता है कि द्वापर युग में श्रीकृष्ण को बरसाना की गोपियों ने नचाया था। दो सप्ताह तक चलने वाली इस मस्ती भरी होली में सिर्फ प्राकृतिक रंग- गुलालों का ही प्रयोग किया जाता है, जिससे वातावरण बहुत ही सुगन्धित, आनन्दित व  उत्साहित रहता है। अगले दिन यही प्रक्रिया पुनः दोहराई जाती है, लेकिन इस बार बरसाना नहीं बल्कि नंदगांव में, जहाँ नंदगांव की गोपियाँ, बरसाना के गोपों की रंग – अबीर और लट्ठों से जमकर धुलाई करती है।

By अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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