nayaindia Congress plenary session दिल्ली में खिड़की खोली एमपी में दरवाजे बंद...!
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दिल्ली में खिड़की खोली एमपी में दरवाजे बंद…!

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भोपाल। कमलनाथ जिन्होंने राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव से पहले तक दिल्ली से दूरी बनाकर खुद को मध्यप्रदेश तक सीमित कर लिया था.. नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी छोड़ने के वक्त भी जिनकी प्राथमिकता में मध्य प्रदेश ही रहा ..अब कमलनाथ ने निर्वाचित अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे की कांग्रेस में एक खिड़की खोल ली है.. रायपुर से मध्यप्रदेश के लिए भी फिलहाल बड़ा संदेश यही निकल कर आया कि कमलनाथ ही सबसे स्वीकार्य लीडर .. दिल्ली को उनकी जरूरत क्या इसलिए उन्हें मध्यप्रदेश में फ्री हैंड दिया जाएगा.. या प्रमोशन की आड़ में डिमोशन का फंडा 23 के लिए पार्टी की नई व्यवस्था के तहत सीएम का चेहरा कमलनाथ और संगठन की कमान किसी युवा को यह विकल्प नेतृत्व के हस्तक्षेप के साथ संतुलन बनाए रखने के लिए खोल दिया जाएगा..

राष्ट्रीय अधिवेशन के साथ कमलनाथ का दिल्ली में बढ़ता दखल और मध्यप्रदेश में उनके द्वारा सारे सूत्र अपने पास रखने की कवायद क्या पार्टी छोड़ चुके सिंधिया जैसे दूसरे महत्वाकांक्षी नेताओं के लिए भी संदेश दे रहा कि सावधान.. चाहे फिर वह क्षत्रप हो या टिकट के दावेदार और युवा नेतृत्व समय रहते सभी समझ जाओ कांग्रेस के नाथ वो ही है और आगे भी उनकी ही जमावट रहेगी ..फिलहाल अंतिम सत्य यही है यदि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की राजनीति करना है तो नाथ शरणम गच्छामि.. यानी सीएम का चेहरा भी वही होंगे और प्रदेश अध्यक्ष की कमान भी उनके पास ही रहेगी … संदेश साफ है दिल्ली नेतृत्व उनसे बिना पूछे या यूं कहें कि उन्हें भरोसे में लिए बिना किसी को दिल्ली से लेकर भोपाल तक पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी सौंपने की स्थिति में नहीं है..

कुल मिलाकर खुद को 2023 विधानसभा चुनाव तक सीमित रखे हुए कमलनाथ को कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व ने अनुभवी नेता के तौर पर 2024 की रणनीति बनाने के लिए भरोसे में ले लिया है.. इसे सोनिया का वीटो पावर माने या नवागत राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की जरूरत और राहुल गांधी की मजबूरी कमलनाथ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. फिलहाल रायपुर अधिवेशन में आर्थिक प्रस्ताव लाने के साथ कमलनाथ यदि चर्चा में है तो उसकी वजह है समापन से पहले पार्टी के नुमाइंदे के तौर पर नाथ द्वारा यह कहना कि हमारी बात को गंभीरता से सुनो जिन्होंने सभी प्रतिनिधियों के दोनों हाथ खड़े करवा कर प्रस्तावों को मंजूरी के लिए समर्थन हासिल किया.. आर्थिक मोर्चे पर कमलनाथ की नई तैनाती उस वक्त जब रायपुर से ही कांग्रेस ने अडानी के खिलाफ राहुल गांधी की लाइन को पूरे देश में आंदोलन के जरिए सड़क तक ले जाने का फैसला किया है.. यही नहीं आने वाले समय में जब रायपुर अधिवेशन से विचारधारा से इत्तेफाक रखने वाले भाजपा विरोधी दूसरे दलों के लिए गठबंधन की राजनीति की नई संभावनाएं तलाशने की कवायद शुरु होने जा रही है..

तब कमलनाथ के ममता बनर्जी से लेकर नीतीश कुमार, मायावती, अखिलेश यादव से व्यक्तिगत संबंधों का भी संभवत पार्टी नेतृत्व फायदा उठाना चाहेगा.. उद्योगपतियों से कमलनाथ के रिश्ते जगजाहिर है.. सवाल रायपुर से 2024 लोकसभा के लिए गठबंधन की सियासत के संकेत जरूर दिए गए.. लेकिन उससे पहले जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव होना है उसमें तेलंगाना, राजस्थान, छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यप्रदेश भी शामिल है.. यहां पार्टी की कमान कमलनाथ के पास है .. मुख्यमंत्री से लेकर नेता प्रतिपक्ष और दिल्ली के सभी पदों से प्रदेश अध्यक्ष की अलग ताकत को कमलनाथ ने बखूबी समझा और उसे अपने पास बनाए रखा है.. सीएम का चेहरा प्रोजेक्ट कर कमल आपसे संगठन की जिम्मेदारी किसी और को सौंपे जाने की चर्चा के बीच कमलनाथ ने कभी भी अपना दावा कमजोर नहीं होने दिया.. फिर भी मध्यप्रदेश में 2023 विधानसभा चुनाव कमलनाथ के लिए अंतिम मौका माना जा सकता है.. जहां दूसरे प्रतिस्पर्धी और महत्वाकांक्षी कांग्रेस नेताओं के लिए कमलनाथ ने या तो दरवाजे पूरी तरह बंद कर रखे या फिर उन्हें सिर्फ ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स तक सीमित रखे हुए हैं..

ऐसे नेताओं को अपने खिलाफ कभी एकजुट नहीं होने दिया.. सड़क की सियासत में फोकस कमलनाथ अपने ऊपर ही बनाए रखना चाहते.. कमलनाथ का एक बार फिर बढ़ता सियासी कद और दिल्ली की राजनीति में बढ़ती दिलचस्पी इस बात का भी संकेत माना जा सकता है कि मध्य प्रदेश से राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस में नई भूमिका और पद प्रतिष्ठा की चाहत रखने वाले किसी भी नेता को पहले कमलनाथ का भरोसा जीतना होगा.. कमलनाथ एक साथ मध्यप्रदेश से लेकर दिल्ली तक 2 पावर सेंटर नहीं बनने देना चाहेंगे.. वह किंग मेकर से यदि कांग्रेस के किंग बने तो वजह है दिल्ली से प्रदेश अध्यक्ष बन कर उनका आना.. कांग्रेस में दिल्ली की राजनीति को उनसे बेहतर कौन समझ सकता है.. मध्य प्रदेश के दूसरे वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह पहले ही कमलनाथ को निर्विवाद नेता मानकर अपनी ओर से कोई विवाद नहीं खड़ा करने की मंशा जाहिर कर चुके है.. दिग्विजय हमेशा कहते हैं कि 2023 विधानसभा का चुनाव बहुत निर्णायक यदि नहीं जागे तो फिर ढूंढते रह जाओगे.. सिर्फ नाथ ही नहीं राजा जो सांसद है फिर भी वह अच्छी तरह जानते कांग्रेस तो आगे पीछे होती रहेगी लेकिन व्यक्तिगत तौर पर उनके लिए भी यह चुनाव बदलती कांग्रेस में अंतिम साबित हो सकता है..

वह बात और है कि अरुण यादव, जीतू पटवारी ,अजय सिंह जैसे नेताओं के बयान विवाद बढ़ाने के साथ कमलनाथ की स्वीकार्यता पर जाने अनजाने सवाल खड़ा करते रहे हैं.. तो यह भी सच है कि फिलहाल मामला ठंडे बस्ते में है .. सभी को अपने और समर्थकों के टिकट के साथ अपनी नई जिम्मेदारी का इंतजार है ..आधी अधूरी प्रदेश कार्यसमिति के बाद एआईसीसी डेलीगेट की सूची सामने आ चुकी है ..तो प्रदेश प्रभारी जेपी अग्रवाल एडजस्टमेंट का विकल्प खोल असंतुष्ट को चुप कर चुके हैं ..कमलनाथ ने प्रदेश अध्यक्ष बन मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के बाद भी संगठन की जिम्मेदारी हमेशा अपने पास ही रखी थी.. चाहे फिर बगावती तेवर के साथ सिंधिया और उनके समर्थकों को पार्टी ही क्यों नहीं छोड़ना पड़ी.. एक व्यक्ति एक पद उदयपुर डिक्लेरेशन से पहले ही कमलनाथ ने नेता प्रतिपक्ष के दायित्व से खुद को मुक्त कर अपनी प्राथमिकता कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी को बनाया ..2023 के सीएम इन वेटिंग की अपनी दावेदारी को चुनौती देने वालों को लेकर कमलनाथ पूरी तरह से सजग और सतर्क है ..रायपुर अधिवेशन में अपना सियासी रुतवा दिखाकर मध्य प्रदेश के सभी दूसरे नेताओं को संदेश दे दिया है कि विधानसभा चुनाव के टिकट में भी उनकी पसंद निर्णायक भूमिका निभाएगी..

फिर भी सवाल खड़ा होना लाजमी है दिल्ली की खिड़की खोल कर आखिर कमलनाथ बदलती और चुनौतियों से घिरी कांग्रेस के लिए कितने और कब तक उपयोगी साबित होंगे.. क्या ऐसे में द्वंद के चलते कमलनाथ का मिशन 2023 यानी कांग्रेस की सत्ता में वापसी और फिर मुख्यमंत्री की शपथ लेने का सपना कहीं प्रभावित तो नहीं होगा.. आखिर विधानसभा चुनाव जब नजदीक तब उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस की बेहतरी के लिए दिल्ली का रुख क्यों किया.. जबकि अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के विकल्प की तलाश और नए अध्यक्ष के निर्वाचन के दौरान कमलनाथ ने दिल्ली से दूरी बनाकर खुद को मध्यप्रदेश तक सीमित कर लिया था.. यह वही समय है जब G23 दबाव बना रहा था, राहुल गांधी ने अध्यक्ष के लिए अपनी दावेदारी से किनारा कर लिया था .. एक समय ऐसा भी आया जब भारत जोड़ो यात्रा छोड़कर दिग्विजय सिंह नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए दावेदार बनकर सामने आए.. उस वक्त राजा को अपने दावे के बावजूद पैर वापस खींचना पड़े थे.. क्योंकि पर्दे के पीछे कमलनाथ का दांव भी चर्चा बटोर रहा था.. कमलनाथ सिर्फ अनुभवी नेता नहीं बल्कि आर्थिक संकट से जूझ रही कांग्रेस के खेवनहार भी माने जाते हैं.. मोर्चा प्रबंधन का हो या फिर व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए जरूरी इंतजाम पार्टी नेतृत्व को कमलनाथ का बड़ा सहारा रहा है.. अपनी उपयोगिता और अहमियत का एहसास करा कर कमलनाथ हमेशा सोनिया गांधी के नजदीक नजर आए..

अधिवेशन के दौरान सोनिया गांधी ने राजनीति से सन्यास लेने का जो इशारा किया उस पर अलका लांबा ने व्यक्तिगत चर्चा का हवाला देकर विराम भी लगा दिया.. ऐसे में सवाल क्या सोनिया कमलनाथ की जुगलबंदी 2023 तक जरूर देखने को मिलेगी.. क्यों कि राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान मध्यप्रदेश के प्रवास पर कमलनाथ कांग्रेस की गहराई पहले ही नाप चुके हैं.. फिर भी बड़ा सवाल कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी जिसकी संख्या में इजाफा हो रहा है क्या मध्य प्रदेश से कमलनाथ उसका हिस्सा बनेंगे.. तो दिग्विजय सिंह भी इस निर्णायक फोरम पर क्या उनके साथ रहेंगे.. राजा ने भारत जोड़ो यात्रा के बाद अपनी उपयोगिता साबित की तो रायपुर अधिवेशन ने कमलनाथ को नई ताकत दी है.. ऐसे में नेतृत्व जब पुरानी पीढ़ी के मल्लिकार्जुन का तब मध्यप्रदेश के किसी युवा पर भरोसा कर जमावट राहुल गांधी की भी देखने को मिलेगी..

रायपुर अधिवेशन ने मध्यप्रदेश के भी नए चेहरों को दिया मौका
दिल्ली की खिड़की खोलकर शायद कमलनाथ बदलती कॉन्ग्रेस की हवा का रुख जानना चाहेंगे.. उदयपुर डिक्लेरेशन और रायपुर अधिवेशन के चिंतन मंथन के बाद जहां मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी यानी अनुभवी और युवा बदलने की जुगत में कांग्रेस पार्टी के मजबूत भविष्य के लिए तत्कालिक और दूरगामी रणनीत का का खाका तैयार कर आगे बढ़ेगें.. अगले कुछ महीनों में चुनावी राज्य में शामिल मध्यप्रदेश की पटकथा भी 2023 से आगे 2024 को लेकर सामने लाई जा सकती है ..शायद कभी दिल्ली से दूरी और खुद को मध्यप्रदेश तक सीमित रखने का दावा करने वाले कमलनाथ की दिलचस्पी प्रदेश और यहां के नेताओं की दिल्ली में नई भूमिका और उनके बढ़ते कदम पर भी रहेगी.. 2023 विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस की दशा और दिशा को ध्यान में रखते हुए नई जमावट में विशेष दिलचस्पी ले रहे दिग्विजय सिंह हो या फिर नेतृत्व की पसंद के और दूसरे किरदार कमलनाथ सभी पर पैनी नजर रखना चाहेंगे.. वर्किंग कमेटी से लेकर राष्ट्रीय और राज्य संगठन के दूसरे पदों पर मध्य प्रदेश से किस नेता को नवाजा जाए.. इसमें कमलनाथ अपनी पसंद और समर्थकों का ध्यान जरूर रखेंगे..

खडगे कांग्रेस में खिड़की खुलने के साथ कमलनाथ ने मध्य प्रदेश में उन दरवाजों को भी पूरी तरह बंद करने का शायद मन बना लिया है.. जिससे अंदर घुसकर कोई भी दूसरा नेता आज नहीं तो कल उन्हें चुनौती देता हुआ नजर आ सकता है.. वह चाहेंगे 2023 की पटकथा में हर किरदार उनकी पसंद का हो और नाथ की कृपा के बिना कोई संगठन और भविष्य की सत्ता में नवाजा नहीं जाए.. मध्य प्रदेश कांग्रेस में यूं तो सारे सूत्र कमलनाथ के पास है .. 2019 लोकसभा चुनाव में सिर्फ एक लोक सभा सीट पर जीत का बड़ा झटका हो या फिर सिंधिया की बगावत के साथ सत्ता हाथ से चली जाना नाथ अब गलती सुधार के साथ अपने पंजे की पकड़ हर हाल में दिल्ली से लेकर भोपाल के संगठन पर मजबूत रखना चाहते हैं.. फिर भी दिग्गी राजा की जमावट से भी इनकार नहीं किया जा सकता.. नाथ और राजा की तकरार की कानाफूसी के बीच बेकरार युवा नेतृत्व की जोर आजमाइश अभी थमी जरूर लेकिन खत्म नहीं हुई है.. जीतू पटवारी ,अरुण यादव, अजय सिंह, गोविंद सिंह, सुरेश पचौरी , सज्जन सिंह वर्मा ,विक्रांत भूरिया, जयवर्धन सिंह जैसे नेताओं को शायद सही समय का इंतजार है.. जो 2023 विधानसभा चुनाव के बाद नई पोजिशनिंग ले सकते हैं..

अजय – अरुण, जय – जीतू की काट नही बन पाए कमलेश्वर..
कमलनाथ ने अपनी धमक का एहसास रायपुर अधिवेशन में कराया इसमें कोई दो राय नहीं.. मध्य प्रदेश के ही और दूसरे नेताओं में शामिल दिग्विजय सिंह जी मंच पर सोनिया, राहुल, प्रियंका के कान में खुसुर पुसुर करते नजर आए .. दस जनपथ में सीधी एंट्री रखने वाले राजा और नाथ के बाद दूसरी पीढ़ी के नए चेहरों को तराशना शुरू हो गया है.. कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में कोई अपनी प्रतिभा कोई जोड़-तोड़ तो कोई किसी की बिसात का मोहरा बनकर मंच तक जा पहुंचा ..कुछ युवा तेजतर्रार पूर्व मंत्री प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष जीतू पटवारी के अलावा पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल और पीसी शर्मा को भी मंच से बोलने का मौका मिला ..दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन पीछे रहे लेकिन राजा के सबसे भरोसेमंद पीसी को भी मंच नसीब हुआ.. इससे पहले भी पीसी को भारत जोड़ो यात्रा के दौरान बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी ..कमलेश्वर पटेल कमलनाथ की व्यक्तिगत पसंद बनकर उभरे.. अभी तक जिनको आगे रखकर नाथ ने विंध्य क्षेत्र की कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे अजय सिंह की घेराबंदी चर्चा का विषय बनती है.. कमलनाथ ने मुख्यमंत्री रहते उससे पहले और उसके बाद भी संतुलन की राजनीति कर कमलेश्वर को प्राथमिकता दी.. अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह चुनाव हारने के बावजूद मैदान छोड़ने को तैयार नहीं है ..जिनका उपयोग राजा और नाथ अपनी सुविधा से करते रहे ..सीएम चेहरे की बहस के दौरान अजय सिंह ने भविष्य में विधानसभा चुनाव लड़ने का अपना इरादा जता दिया था.. कमलनाथ की पसंद कमलेश्वर पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व करते जबकि इसी वर्ग के अरुण यादव और जीतू पटवारी पहले ही राष्ट्रीय नेतृत्व के सीधे संपर्क में है.. अरुण यादव पार्टी के पूर्व अध्यक्ष हैं तो जीतू कार्यकारी अध्यक्ष रहते हुए अभी भी अध्यक्ष के दावेदार बने हुए.. जीतू और कमलेश्वर ने अधिवेशन के जरिए कांग्रेस के ही दूसरे नेताओं को अपने बढ़ते कदम और इरादों का एहसास कराया..

जबकि अरुण यादव पार्टी नेतृत्व को भरोसे में लेकर अधिवेशन के समापन से एक दिन पहले ही अहीर रेजिमेंट को समर्थन देने के लिए भोपाल लौट आए थे.. अरुण और उनके भाई पूर्व मंत्री सचिन यादव दोनों ने यादव समाज पर अपनी पकड़ मजबूत करने को प्राथमिकता दी.. इन दिनों कांग्रेस के अंदर जीतू पटवारी सभी पर भारी साबित हो रहे.. चाहे फिर वह सड़क की राजनीति हो या सदन के अंदर जीतू अपने पेंतेरे से सिर्फ विरोधियों को नहीं भाजपा नेताओं को नहीं बल्कि पार्टी के अपने नेताओं को भी सोचने को मजबूर कर देते.. राष्ट्रीय अधिवेशन में सुर्खियां बटोरने के बाद मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के पहले दिन हल लेकर पहुंचे.. जीतू ने किसानों की समस्याओं को पुरजोर तरीके से उठाने के साथ सियासी हित भी खूब साधे.. भारत जोड़ो यात्रा के दौरान जीतू राहुल के और करीब जा पहुंचे हैं.. जो पिछले विधानसभा चुनाव से पहले मंदसौर गोली कांड के बाद राहुल को मोटर साइकिल की सवारी भी करवा चुके है.. कमलनाथ के बाद आर्थिक मोर्चे पर जीतू एक सक्षम नेता बनकर उभरे.. कांग्रेस की दूसरी पंक्ति के दूसरे नेताओं की तुलना में जीतू का बढ़ता कद उनके जुझारू तेवर और कुछ नया करने ज्ज्ज्बा और जोखिम उन्हें अलग खड़ा करता है.. यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके जीतू की युवा कार्यकर्ताओ पर पैनी पकड़ है.. तो कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया पैनलिस्ट के भी वह सदस्य है..

भविष्य की कॉन्ग्रेस में दो बार विधानसभा चुनाव जीत चुके जीतू को अरुण यादव के बाद विरासत की राजनीति का प्रतिनिधित्व कर रहे जयवर्धन सिंह और कमलनाथ के पुत्र नकुल नाथ के मुकाबले में अभी तक बड़ा चेहरा लंबी रेस का नेता माना जाता है.. जबकि 2023 के बाद की कांग्रेस में ओबीसी पॉलिटिक्स से जुड़े कमलेश्वर पटेल, युवा आदिवासी चेहरा विक्रांत भूरिया भी इस दौड़ में शामिल है.. नाथ ने प्रदेश अध्यक्ष मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष रहते हैं कमलेश्वर का कद आगे बढ़ाया तो अब पटेल के जरिए ओबीसी जीतू पटवारी अरुण यादव और विंध्य के कद्दावर नेता अजय सिंह तीनों को बड़ा सियासी संदेश दिया जा रहा है.. वह बात और है कि नाथ के वरदहस्त और कई मौके मिलने के बावजूद पूर्व मंत्री कमलेश्वर समूचे विंध्य तो दूर अपने विधानसभा क्षेत्र तक सीमित होकर रह गए.. पिछड़े वर्ग के होने के बावजूद वो ना कांग्रेस की जरूरत और ना ही भाजपा तोड़ साबित हो पाए..

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