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गपशप

बेरोजगार नौजवानों से बरबादी के खतरे!

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ध्यान नहीं आ रहा है कि आबादी से जुड़े आंकड़ों के अलावा भारत किसी और मामले में दुनिया में नंबर एक है। भारत में सबसे ज्यादा युवा आबादी है, दुनिया में सबसे ज्यादा प्रवासी भारतीय हैं आदि आदि। अगले कुछ दिन में भारत आबादी में दुनिया का नंबर एक देश बनेगा। उसके बाद भारत क्या करेगा? स्वाभाविक है कि आबादी के आधार पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य बनाए जाने की गुहार तेज करेगा। लेकिन इसके अलावा क्या करेगा? भारत के पास क्या कोई योजना है कि वह कैसे अपनी विशाल आबादी का इस्तेमाल करे? खास कर युवा आबादी को अपनी ताकत बनाए और महाशक्ति बनने की ओर बढ़े? भारत के पास पहले एक मानव संसाधन विकास मंत्रालय होता था। हालांकि वह भी मानव संसाधन के विकास के लिए कोई खास काम नहीं करता था लेकिन अब उसका नाम बदल कर शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया है। सो, आधिकारिक रूप से मानव को संसाधन मानने का जो दिखावा था वह भी खत्म है। भारत की विशाल आबादी से देश में पर्यावरण और संसाधनों पर कैसा दबाव बनेगा उसे सिर्फ इस तथ्य से समझ सकते है कि भारत में दुनिया की करीब 18 फीसदी आबादी रहती है, जबकि भारत के पास कुल जमीन सिर्फ 2.45 फीसदी है। दुनिया के जल संसाधन में से भी भारत के पास सिर्फ चार फीसदी रिसोर्स है।

तभी सवाल है कि भारत इतने विशाल मानव संसाधन का क्या करेगा? सन् 2023 के अप्रैल में भारत सबसे बड़ी आबादी वाला देश होगा और सात साल बाद आबादी डेढ़ अरब होगी। यानी 150 करोड़ और तब हर साल करीब एक करोड़ नए लोग रोजगार की तलाश में निकलेंगे। सोचें, उनके लिए रोजगार की क्या व्यवस्था है? उनको अच्छा रोजगार मिले इसके लिए जरूरी है कि उनको अच्छी शिक्षा मिले और कौशल विकास हो। वे किसी न किसी काम में कुशल हो । लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था यूनिसेफ की 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 47 फीसदी किशोर और युवा शिक्षा व कौशल विकास के उस रास्ते पर नहीं हैं, जिससे उनको 2030 में रोजगार मिल सके।

सोचें, 2030 में नौकरी और कामकाज की तलाश कर रहे आधे लोग ऐसी स्थिति में नहीं होंगे कि उनको रोजगार मिल सके। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार  भारत में 95 फीसदी बच्चे प्राथमिक शिक्षा के लिए दाखिला लेते हैं लेकिन सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे की कमी, अच्छे शिक्षकों की कमी और कुपोषण की वजह से उनका लर्निंग आउटपुट बहुत खराब है। बच्चे कुछ सीख नहीं पाते हैं। चूंकि ज्यादातर बच्चे सरकारी स्कूलों में ही जाते हैं इसलिए बड़ी आबादी का विकास रोजगार हासिल करने के नजरिए से नहीं हो रहा है। भारत में अभी 66 फीसदी आबादी 35 साल से कम उम्र के लोगों की है। ये अपने करियर और जीवन के सबसे बेहतरीन समय में हैं लेकिन उनके लिए काम नहीं है। बेरोजगारी की दर आठ प्रतिशत के करीब है।

आबादी का विश्लेषण करने वाले जानकार  बरसों से ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड बनाम डेमोग्राफिक डिजास्टर’ पर विचार कर रहे हैं। संभव है युवाओं को अच्छी शिक्षा नहीं मिले,उनका कौशल विकास और रोजगार नहीं हुआ तो बड़ी आबादी विध्वंस का कारण बनेगी। सामाजिक स्तर पर इससे संकट पैदा होंगे। आर्थिक मोर्चे पर नुकसान होगा। कम पढ़ी लिखी, अविकसित, बेरोजगार और बेचैन युवाओं की फौज सामाजिक सद्भाव और आर्थिक विकास दोनों के लिए खतरा बनेगी। इसका खतरा भारत में इसलिए भी बड़ा है क्योंकि लोग धर्म और जाति याकि हिंदू बनाम मुस्लिम के झगडों के पानीपत मैदान भी बनवाते हुएअ है।  तमाम अलग आंकड़ों के बावजूद एक खास धर्म के लोगों को आबादी बढ़ने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। सबसे ज्यादा आबादी पर ही  राजनीति हो रही है। इसलिए आगे की और आबादी कितने  संकट लिए हुए है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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