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भारत का टर्निंग वर्ष है 2023

हां, सन् 2023 के अप्रैल महीने से भारत दुनिया में नंबर एक होगा। पृथ्वी का वह देश, जिसकी सर्वाधिक आबादी। चीन इस अप्रैल में नंबर दो होगा और भारत नंबर एक! अगले सौ साल या शायद उसके बाद भी भारत दुनिया का सबसे बड़ा, सर्वाधिक आबादी वाला देश होगा! तो इस मोड़ को, भारत के राष्ट्र-राज्य के टर्निंग प्वाइंट को हम और दुनिया कैसे लें? यह गौरव की बात या चिंता की? यह गर्व की बात या शर्म की? इस पर हम कैसे सोचें और दुनिया कैसे सोचेगी? दुनिया भारत को बड़ा मानेगी या उस पर तरस खाएगी? हम भारतीयों के लिए यह संतोष की बात या बेचैनी वाली? इन सवालों पर दुनिया का नजरिया जरूर सर्वमान्यता बनाए हुए होगा लेकिन भारत के हम लोगों में ऐसा इसलिए असंभव है क्योंकि हम लोगों का मानसिक विकास इतना ऊलजलूल हैं कि भारत को चलाने, उसमें सोचने वाले मूर्ख, संकीर्ण, अल्प दृष्टि लिए गंवार तो लोग अपने-अपने कुंओं (धर्म-जात, वर्ग-वर्ण आदि) में बंद, कुंद और मंद!

तभी घटती आबादी वाले चीन और भारत के प्रति वैश्विक नजरिया दिन-रात का फर्क लिए हुए है। चीन में माओत्से तुंग से ले कर शी जिनफिंग, तथा सत्तारूढ कम्युनिस्ट पार्टी ने 75 वर्ष लगातार इस संकल्प में काम किया कि उसे आबादी की अपनी भीड़ को दुनिया की वर्किंग क्लास, औद्योगिक क्रांति का वाहक बनाना है। चाबुक से या गाजर से, शोषण से या मुनाफे से देश के लोगों को कर्मयोगी, मेहनती, पुरुषार्थी, दुनिया की उत्पादक आबादी बना कर राष्ट्र को दुनिया की फैक्टरी बनाना है। मतलब चीन केवल लोगों की भीड़ में नंबर एक देश नहीं, बल्कि दुनिया का नंबर एक विश्वकर्मा देश भी!

पिछले 75 वर्षों में चीन का वैश्विक नैरेटिव क्या था? क्रांतियों का देश! सौ फूल खिलने से लेकर साम्यवाद, पूंजीवाद के एक्स्ट्रिम प्रयोगों का देश। कभी रूस से, कभी अमेरिका से विचार, तकनीक, पूंजी लेकर अपने को महान देश, महाशक्ति बनाने वाला देश! दुनिया के आगे यह प्रमाणित करता हुआ कि वह यदि आबादी में नंबर एक देश है, सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य है, दुनिया का चौधरी-महाशक्ति है तो किसी की कृपा, मेहरबानी, भीख, दिखावे से नहीं, बल्कि अपनी काबलियत, क्षमताओं, वैश्विक प्रतिस्पर्धाओं, मापदंडों, अवसरों की आबोहवा में पूंजी और श्रम के लिए अनुकूलताओं वाली आबोहवा, ओलंपिक, सभ्यता-संस्कृति की धरोहरों के वैश्विक पर्यटन और चमक-धमक से गौरवों से है।

हां, चीन में जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी जैसा प्रधानमंत्री या कृष्ण मेनन से लेकर जयशंकर जैसा कोई रक्षा मंत्री-विदेश मंत्री नहीं हुआ, जिसकी राष्ट्र नीति, रक्षा नीति, विदेश नीति पाखंड, दिखावे और अपनी जनता को मूर्ख के मकसदों से थी। इस वर्ष जैसे नरेंद्र मोदी जी-20 की बैठक का भारत में ढिंढोरा बनवाने वाले हैं या हाल में सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता नहीं होने का रोना रोते हुए भारत के विदेश मंत्री ने दुनिया से कहा कि कैसी स्थिति होगी जब (अप्रैल से) दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं होगा! ऐसा करना या कहना कभी किसी चाइनीज नेता के व्यवहार से इसलिए नहीं झलका क्योंकि उसका हर नेता आजादी के बाद से लेकर आज तक अंदरूनी मामलों में जितना फौलादी रहा है उतना ही वैदेशिक मामलों में भी रहा। चीन की कूटनीति न देश की जनता को उल्लू बनाए रखने की होती है और न मध्य मार्ग की और न ही वह आतंकवाद, पड़ोसी देश की परवाह, मुस्लिम आबादी जैसी बातों पर रोता-धोता है, बल्कि दो टूक फैसलों, राष्ट्रहित में मर-मिटने, दुनिया में झंडा गाड़ने, दुनिया को बाजार बनाने, उसे खरीदने की विस्तारवादी, साम्राज्यवाद का होता है।

विषयातंर हो गया है। लेकिन यह इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि जिस व्यवहार से आबादी पर चीन के नंबर एक होने का वैश्विक रूतबा बना था, उसे समझना जरूरी है। वैसा क्या अप्रैल 2023 की आबादी से भारत का बनेगा? भले इस वर्ष या इस दशक भी न हो क्या सन् 2064 तक भी रूतबा तब होगा जब भारत 170 करोड़ लोगों की पीक आबादी लिए हुए होगा?

कतई नहीं! असंभव! मेरा अनुमान है, भविष्याणी है कि भारत की आबादी दुनिया की निगाह में भीड़ बनी रहेगी। भीड़ भी ऐसी जो बेगारी करते हुए धमार्दों, रेवड़ियों के भरोसे जीते हुए। वहीं लोग अवसरों के लिए आरक्षणों, भ्रष्टाचारों, भाई भतीजावाद की छीनाझपटी के साथ भाग्य और भक्ति में टाइमपास करते हुए! इसलिए कि भारत की भीड़ में अब न मानसिक-नागरिक विकास संभव है और न समाज, राजनीति, आर्थिकी में रियलिटी, सत्य का आग्रह लौट सकता है। सोचें, भाजपा-संघ, कांग्रेस या सपा-क्षेत्रीय दलों का कोई भी नेता, कार्यकर्ता, सिविल सोसायटी का सुधीजन, दिल पर हाथ रख करके विचारे कि क्या भारत आज के नंबर एक चीन को क्वालिटी के किसी भी पहलू में रिप्लेस कर सकता है? क्या भारत दुनिया की फैक्टरी बन सकता है? दुनिया को सर्विस (याकि सर्विस सेक्टर) देने का एकाधिकारी हो सकता है? दुनिया का खेत बन सकता है? दुनिया का नंबर एक लेबर सप्लायर हो सकता है? या वैश्विक मनोरंजन, इनोवेशन का नंबर एक देश हो सकता है?

मेरा मानना है दुनिया की किसी भी जरूरत, किसी स्किल, भविष्य के किसी ट्रेंड में भारत के 140 करोड़ लोग या 170 करोड़ लोगों की भीड़ में वह सोच बनना ही नहीं है, जिसमें काबिल होने की चाहना हो। अमेरिका में कमला हैरिस, ब्रिटेन में ऋषि सुनक या तमाम प्रवासी भारतीयों के कीर्तिमानों को देखते हुए भी देश के परकोटे में रह रहे भारतीयों में यह सुध नहीं बन सकती है कि बना तब जाता है जब काबलियत बने। बुद्धि बने। हार्वर्ड-ऑक्सफोर्ड बने। सत्य बने। लेकिन वैश्विक मान-सम्मान, कंपीटिशन लायक बनने की जरूरतों पर भारत में अब इतने ताले लग गए हैं कि हम भारतीयों को भी सुध नहीं होती कि हम क्या बने हैं?

सोचें, सन् 2023 या इस दशक का सर्वाधिक तेजी से बढ़ता उद्योग क्या है? अपना मानना है कि पूजा-पाठ, भागवत कथा, धर्म पर्यटन, मंदिर निर्माण, भक्ति, अंधविश्वासों और टोटकों का उद्योग! सबसे बड़ा सर्विस सेक्टर कौन सा? बच्चों-नौजवानों की रट्टा मार कोचिंग का धंधा! मुनाफे का सर्वाधिक बड़ा बाजार कौन सा है? चिकित्सा और शिक्षा। नौजवानों में क्रेज नंबर एक क्या है? लाठी, पॉवर और लूट के मौके देने वाली सरकारी नौकरी। कभी ये काम लोक सेवा, जन सेवा की परिभाषा के थे जैसे आज भी दुनिया के सभ्य-विकसित देशों में है। और उन देशों में सरकारों की प्राथमिकता में जनता को समर्थ बनाने की इन सेवाओं का मोल है। मगर भारत में क्या होता हुआ है? नौकरशाही के बाद सर्वाधिक कमाई और खाऊ सेक्टर यदि कोई बना है तो वह चिकित्सा और शिक्षा का। तीनों (नौकरशाही, शिक्षा, चिकित्सा) बिना जवाबदेही के। चौथे नंबर पर भी राजनीति का सेक्टर। सभी बुनियादी तौर नीम-हकीमी वाले! भक्ति, कोचिंग, चिकित्सा, नौकरशाही, राजनीति के पांच सेक्टरों को प्रमोट करने वाला, इनसे अधिक भयावह क्षेत्र जन-जन की बुद्धि को प्रदूषित बनाते राष्ट्रयज्ञ है। मतलब व्हाटसऐप विश्वविद्यालयों, मीडिया-सोशल मीडिया और टीवी चैनलों से चौबीसों घंटे झूठ-मूर्खताओं का प्रसारण और विश्व गुरू बनने के नित-नए पाठ!

क्या यह सब आप सही नहीं मानते?

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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