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दिल्ली सत्ता है ही हिंदूओं की गुलामी के लिए!

पिछले कॉलम के मसले पर फिर विचार है। मतलब क्यों जरूरी है कि हिंदू दिल्ली की सत्ता से सावधान रहें? क्यों हिंदुओं को यह संकल्प गांठ बांधे रहना चाहिए कि वे कहीं वापिस आजादी का सत्व-तत्व (मूल ढांचा) नहीं गंवा बैठें। मैंने गुजरे सप्ताह ‘दिल्ली की सत्ता’ तासीर के इतिहास में हिंदू की लाचारगी को टटोटा। यह जान कर शर्म से पानी-पानी हूं कि ज्ञात इतिहास में सन् 1130  के अनंगपाल से 1947 तक के अंग्रेज राज के 817 सालों में हिंदुओं ने कैसी पशुगत बेसुधी से जिंदगी जी है। उन्हें कभी सुध ही नहीं हुई कि वे सत्ता की वजह से जानवरों से बदतर बंधुआ जिंदगी जी रहे हैं। हिंदू इतना गुलाम, श्रीहीन, बुद्धिहीन था कि दिल्ली सल्तनत का सुल्तान अपने गुलामों (बंदगॉ याकि गड़ेरियों) से हिंदुओं को गवर्न करता था। तभी सोचें, क्या वैसा जीवन एनिमल फार्म के भेड़-बकरी वाला नहीं था?

सत्ता के अनुभव का ऐसा इतिहास। तभी कौम को क्या यह सामूहिक संकल्प नहीं बनाना चाहिए कि कुछ भी हो जाए वे दिल्ली की सत्ता को सर्वशक्तिमान नहीं बनने देंगे। कुछ विषयांतर है पर दिल्ली की सत्ता के चरित्र-परिणाम को समझने के लिए दो हजार साल के ज्ञात इतिहास के इस निचोड़ पर गौर करेः 1) हिंदुओं की बरबादी, उनकी बुद्धि और आजादी को हरण करने की मूल और अकेली वजह है सत्ता। हां, धर्म और समाज ने नहीं, बल्कि सत्ता ने हिंदुओं को धोखा दिया। उन्हें बांटा और बुद्धि, पुरुषार्थ में कौम को मंद-कुंद बनाया। 2) सत्ता दिल्ली में अनंगपाल, पृथ्वीराज चौहान की रही हो या तुर्कों, सैयद, लोदी, मुगलों, अंग्रेजों की या आजाद भारत के हिंदू प्रधानमंत्रियों की, सबसे हिंदू छला गया है। उसी से समाज टुकड़ों-टुकड़ों में बिखरा। 3) दिल्ली की हर सत्ता ने हिंदुओं को डरा कर, भयाकुल बना कर उन पर शासन किया। 4) दिल्ली के तख्त पर बैठा तुर्क शासक कुतुबुद्दीन ऐबक हो या नरेंद्र मोदी, सबने अपने गुलाम ताबेदारों उर्फ बंदगॉ या सीबीआई-ईडी के नौकरीपेशा गुलाम अफसरों के जरिए राज किया। सुल्तान खिलजी और तुगलक दिल्ली से बंगाल-बिहार के सूबेदारों, क्षत्रपों पर अपने गुलाम बंदगॉ से वैसे ही कंट्रोल बनाते थे जैसे नरेंद्र मोदी इन दिनों सीबीआई-ईडी-आईटी के गुलाम नौकरशाहों से बनाते हैं!

जाहिर है दिल्ली की सत्ता का वंशानुगत डीएनए ऐसा है जो अमिट, अटल है। सत्ता पर कोई भी बैठा हो वह प्रजा, धर्म, समाज सबका अपने को मालिक समझेगा। कई भारत विचारक हिंदू समाज की रचना को खलनायक करार देते हैं। मगर इस वास्तविकता को नजरअंदाज करते हुए कि दो हजार वर्षों में हिंदू समाज व धर्म का भला किस राज्य व्यवस्था में वर्चस्व था? वे निर्णायक कब थे? ज्ञात इतिहास के प्रारंभ में भारत में पिछड़ी जातियों के राजाओं की सत्ता थी। फिर विदेशियों की सत्ता जो अपने धर्म, अपनी समाज-राजनीतिक व्यवस्था अनुसार शासन करते थे। दिल्ली की सत्ता हिंदू धर्म, वर्ण व्यवस्था, ब्राह्मणवादी व्यवस्था में कब रची-पकी थी? कभी नहीं। अनंगपाल से लेकर अंग्रेजों के दरबार इतिहास में क्या कभी किसी ब्राह्मण मंत्री की उपस्थिति हुई? अकबर दरबार के एक नाम गायक तानसेन का जरूर है। दिल्ली के दरबारी इतिहास में राजपूत जहां मनसबदार और सेनापति मिलेगे वही पिछड़ी व निचली जातियों के लोग बतौर कारिंदे। हां, गुलाम वंश के सुल्तानों के इतिहास में यह उल्लेखित है कि आश्रित निचली जातियों को ऊंचे ओहदों पर बैठा कर उनसे शासन चलवाया जाता था। इसका अर्थ है कि दिल्ली के सत्तावानों ने हर मोड़ पर वर्ण व्यवस्था को एक्सप्लॉयट किया। जातियों में छीनाझपटी बनवा कर, उनके झगड़े बनवा कर सत्ता का अपना उल्लू साधा। कहते हैं मुगलों से जाति शब्द आया और अंग्रेजों ने एक-एक जाति, उपजाति का आधिकारिक प्रोफाइल बना कर यह प्रचारित किया कि फलां जाति भरोसे वाली तो फलां चोर-ठग, फलां अत्याचारी आदि। तुर्क, मुगल और अंग्रेज तीनों ने अपने-अपने ढंग से वर्ण व्यवस्था का लाभ उठा समाज में जहर घोल अपनी सत्ता को मजबूत बनाया। क्या वैसे ही 15 अगस्त 1947 के बाद संविधान और लोकतंत्र के जरिए दिल्ली के सत्तावानकरते हुए नहीं है?

सत्ता ने हिंदू समाज को आरक्षण व जातिवादी राजनीति से बिखेरा है। हिंदू के मनोविज्ञान में आजादी, पुरुषार्थ के बजाय माई-बाप सरकार की पराधीनता और दस तरह की लूट व भूख पैदा की है! सोचें, सन् 2023 के मौजूदा वक्त पर। दिल्ली की सत्ता में कौन है? हिंदू राष्ट्र की बात करने वाले हिंदू प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। लेकिन उनका मकसद क्या है? जातियों के हवाले, उनमें आरक्षण के नाम पर अपनी सत्ता को वैसे ही पॉवरफुल-निरंकुश बनाना जैसा पिछले नौ सौ सालों की दिल्ली सल्तनत में हुआ। बतौर एक राष्ट्रवादी सोचें कि भारत के लोकतंत्र में, आधुनिक सत्ता में व्यवस्था-सस्थाएं क्या जाति निरपेक्ष, स्वायत्त होनी चाहिए या नहीं? क्यों अदालतों में, सेना में भी आरक्षण हो? क्यों जाट रेजिमेंट, यादव रेजिमेंट, दलित रेजिमेंट, ब्राह्मण रेजिमेंट जैसी मांग हो? क्यों अदालत का जज तुगलक बादशाह या नरेंद्र मोदी द्वारा नियुक्त हो? क्यों जजों की नियुक्ति भी जात अनुसार, अगड़े-पिछड़े की कसौटी पर हो ताकि देश-समाज वापिस उसी आबोहवा मे लौट जाए जो विदेशियों के राज में बांटो और राज करो की रीति-नीति से बना करती थी?

1947 से पहले और बाद के भारत का फर्क यह है कि 1947 के बाद दिल्ली की सत्ता में प्रजा के हवाले प्रजा को मूर्ख बनाने के नए मंत्रों से सत्ता का सशक्तिकरण हो रहा है। दिल्ली पर तुर्कों से ले कर अंग्रेज राज के लंबे इतिहास में लोगों को गुलाम बनाए रखने के लिए तलवार के भय के साथ चतुराई से धर्म और जाति का इस्तेमाल था। और दुर्भाग्य जो आजाद भारत की सत्ता भी लोगों की भय-भूख-भक्ति की मनोदशा को धर्म तथा जात की भट्टी पर पकाते हुए है। तभी लोकतांत्रिक सत्ता का चरित्र आजादी पूर्व के चरित्र से अधिक विषैला और घातक है। यह समझदारी को हर तरह से जर्जर बना रहा है। इसलिए इतिहास का रिपीट होना नाममुकिन नहीं है। लोगों को भान ही नहीं होगा देश की जर्जरता का और एक-दिन हिंदू अपनी दुर्लभ आजादी गंवा बैठेंगे!

तभी जरूरी है जो दिल्ली की सत्ता के वंशानुगत, इतिहासजन्य चरित्र पर सोचते हुए हिंदू सतर्क रहे।1947 में प्राप्त आजादी की लोकतंत्र भावना, उसकी कोर चाहना को बारीकी से समझे। सत्ता का दिमाग, हुकूमत की सत्ताखोरी लोकतंत्र की आत्मा को डसती हुई है। वह हिंदुओं को गुलाम प्रजा में कनवर्ट करने का तानाबाना बुनते हुए है। संभव है ऐसा अनजाने में हो रहा हो। नरेंद्र मोदी हिंदुओं के हित में मान रहे हों कि सब उनकी मुट्ठी में हुआ तो वह हिंदुओं की रियल आजादी का रास्ता होगा। पर 140 करोड़ लोगों की बेहतरी एक मुट्ठी से संभव नहीं है। जब यह साबित है कि सत्ता की मुट्ठी आजादी, अवसरों, समानता औरबुद्धि पर शिंकजा है और इतिहास सेइससे हिंदुओं ने गुलामी झेली है तो लापरवाही व मुगालते में जीना इतिहास की पुनरावृति होगी।

सवाल है क्या होना चाहिए? वह बंदोबस्त, जिससे सत्ता पर अंकुश रहे।जिससे दिल्ली का बादशाह अपनी कार्यपालिका याकि कारिंदों, अपने दरबारियों (मंत्रियों), अपनी सभा (विधायिका) को जनप्रतिनिधि, जनादेश बतलाते हुए, संविधान के हवाले अपनी मुट्ठी में सब कुछ नहीं समेट सके। जनता उसे अहसास कराती रहे कि लोकतंत्र में लोकतंत्र की ‘भावना’ का मान रख कर शासन करें। सवाल है‘भावना’ काक्या अर्थ? इस पर मेरा निष्कर्ष है कि हिंदुओं का यह आत्मबोध, यह जिद्द की वे वापिस कतई गुलाम नहीं बनेंगे। उन्हें वही मशाल, वही भावना पकड़े रहनी है जो 15 अगस्त 1947 को प्राप्त आजादी के क्षणों के उत्साह में थी। मेरा मानना है वह भावना, वह उत्साह ही हिंदुओं का इतिहासजन्य ‘अमृत’ है। संविधान की मूल ‘भावना’, उसका अलिखित ‘मूल ढांचा’ है।

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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