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गांधी कमाल से क्या तुर्क तानाशाह हारेगा?

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कमाल कलचदारलूको कहा जाता है तुर्की का महात्मा गाँधी! और वहा के महात्मा गांधी चुनाव लड़ रहे है तानाशाह राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआनके खिलाफ। पिछले बीस वर्षों से सत्ता पर काबिज शक्तिशाली राजनीतिज्ञ अर्दोआन को यदि कोई बाहर का रास्ता दिखला सकता है तो माना जाता है कि वे केवल कमाल कलचदारलू हैं। लेकिन क्या 14 मई को ऐसा संभव होगा?

तुर्की में 14 मई को चुनाव होने जा रहे हैं। मध्यकाल में एक विशाल साम्राज्य की धुरी रहे तुर्की के लिए ये चुनाव बहुत अहम हैं। यूरोप और एशिया के मिलन स्थल के तुर्की ने लम्बे समय तक विश्व को आकार देने में महती भूमिका निभाई। परन्तु तैयबअर्दोआनके शासनकाल में तुर्की पूरी तरह बदल गया। अर्दोआन तुर्की में खासे लोकप्रिय थे और उन्होंने उम्मीद, बदलाव, मसीहा और राष्ट्रवाद जैसे भावनात्मक और अमूर्त शब्दों के प्रयोग व सांस्कृतिक संघर्षों के ज़रिये देश को ध्रुवीकृत करके 2003 में सत्ता हासिल की। शुरुआती सालों में अर्दोआन और उनकी पार्टी एकेपी ने काफी बढ़िया काम किया। उनके नेतृत्व में तुर्की अपने इतिहास के एक सुनहरे दौर से गुजरा। उस दौर में अर्थव्यवस्था काफी मज़बूत थी, तुलनात्मक रूप से बोलने और लिखने की अधिक आज़ादी थी। कई ऐसे कानून बनाए गए जिनसे राजनीति में सेना की दखल कम हुई। राजनैतिक व्यवस्था को अस्थिर करने के प्रयासों कर रोक लगी। तुर्की की अर्थव्यस्था फल-फूल रही थी और देश के भीतर और बाहर अर्दोआन की प्रशस्ति में गीत गाए जा रहे थे। ऐसा कहा जा रहा था कि तुर्की के अत्यंत सम्मानित राष्ट्रपिता मुस्तफा कमल अतातुर्क के बाद अर्दोआन वे नेता हैं जिन्होनें देश को एक नया आकार दिया।

उनके खिलाफ एक विद्रोह असफल रहा और गृहयुद्ध में बर्बाद सीरिया में व्यापक हिंसा भी उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकी। परन्तु आर्थिक संकट, पर्यटन उद्योग में गिरावट और फरवरी में देश को झकझोर का रख देने वाले दो शक्तिशाली भूकंपों के बाद अनमने राहत और बचाव कार्यों के चलते अर्दोआन की सत्ता और लोगों के दिलों, दोनों पर उनकी पकड़ कमज़ोर हुई है। बिना किसी बाधा और बिना किसी प्रतिद्वंद्वी के बीस साल तक लगातार राज करने के बाद अर्दोआन के समक्ष कठिन चुनौतियां उपस्थित हैं। चुनाव सर्वेक्षणों से पता चला है कि उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी कमाल कलचदारलू, जो एक पूर्व अकाउंटेंट हैं और लम्बे समय तक नौकरशाह रहे हैं, की स्थिति उनसे थोड़ी बेहतर है। तुर्की के नागरिकों के सामने दो स्पष्ट विकल्प हैं –अर्दोआन को फिर से चुनो और एक व्यक्ति के एकछत्र राज को और लम्बा खींचो। या फिर उनके विरोधी को चुनो जो यह वायदा कर रहे हैं कि तुर्की में राष्ट्रपति प्रणाली के स्थान पर फिर से संसदीय शासन व्यवस्था कायम की जाएगी।

कमाल कलचदारलू तुर्की के छह पार्टियों के विपक्षी गठबंधन के नेता हैं। इस गठबंधन को एक करने वाली एकमात्र चीज़ है अर्दोआन को सत्ताच्युत करने की उत्कट इच्छा। परन्तु कलचदारलू जानते हैं कि यह आसान नहीं होगा और वे अपने करियर की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहे हैं। एक भाषण में उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि “अर्दोआन पद पर बने रहने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। वे न्यायपालिका पर दबाव डालेंगे। स्वतंत्र मीडिया को मुंह बंद करेंगे और इलेक्शन बोर्ड के ज़रिये गड़बड़ियाँ करवाने का प्रयास करेंगे।”अर्दोआनके अनेक आलोचकों को भी कलचदारलू के क्षमताओं पर बहुत भरोसा नहीं है। विपक्ष के कई समर्थकों का मानना है कि वेअर्दोआनसे मुकाबले करने के लिए सही उम्मीदवार नहीं हैं। चौहत्तर साल के कलचदारलू अत्यंत शांत स्वभाव के मृदुभाषी व्यक्ति हैं और यह माना जा रहा है कि वे तुर्की की राजनैतिक संस्कृति में आमूलचूल परिवर्तन और देश के कायाकल्प के प्रतीक नहीं बन सकते।कलचदारलू के सामने जो चुनौती है वह अत्यंत कठिन है। उन्हें एक ऐसे व्यक्ति को हराना है जिसका अपना आभामंडल है और जिसने अपने बीस वर्षों के कार्यकाल में तुर्की के मतदाताओं के दिलों में अपने लिए एक अलग जगह बना ली है। गार्डियन अखबार से बातचीत में एक मतदाता ने कहा, “मैंअर्दोआनको पसंद करता हूँ – शायद उनकी राजनीति के कारण, या शायद उनके व्यक्तित्व के कारण। वे सचमुच एक अनुभवी राजनेता हैं और अगर वे अर्थव्यस्था और अभिव्यक्ति से स्वतंत्रता से जुड़ी कुछ मामूली समस्याओं को हल कर दें तो जिंदगी एकदम ठीक नहीं तो कम से कम बेहतर तो बन जाएगी।”

और यही बात कलचदारलू के लिए संभावनाओं के द्वार खोलती है। उनमें बारे में बहुत सी अच्छी बातें कहीं जा सकतीं हैं। पहली बात तो यह है कि पिछले एक दशक में वे अपनी पार्टी को एक नई दिशा में ले गए हैं। उनकी पार्टी अब जुनूनी धर्मनिरपेक्ष नहीं है बल्कि केवल किंचित संयत और समावेशी राजनीति की हिमायती है। उन्होंने धार्मिक नेताओं और कुर्द और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं को अपनी पार्टी में जगह दी है ताकि वे अपने देश को बता सकें कि रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी बदल गई है। इसके अलावा, वे मीठा बोलते हैं और शारीरिक हमलों पर भी उनकी प्रतिक्रिया शांतिपूर्ण होती है। यह सब और कुछ हद तक महात्मा गाँधी जैसा दिखने के कारण उन्हें गाँधी कमाल कहा जाने लगा है। उनके मृदु स्वभाव का एकमात्र अपवाद है तुर्की में रह रहे करीब 40 लाख सीरियाई शरणार्थियों के प्रति उनका दृष्टिकोण। वे कहते हैं कि इन शरणार्थियों को सीरिया वापस भेजा जायेगा। परन्तु वे यह भी जोड़ते हैं वेकिसी को जाने पर मजबूर नहीं करेंगे परन्तु सीरिया का पुनर्निर्माण कर ऐसे स्थितियां निर्मित कर देंगे जिससे शरणार्थियों का अपने देश जाना आसान हो जायेगा।

मई में होने वाले चुनाव में रजब तैयबअर्दोआनऔर उनकी एकेपी पार्टी का तख्तापलट करना मुश्किल तो होगा परन्तु असंभव नहीं।अर्दोआनके लिए पहले की तरह फिर से सत्ता हासिल करना आसान नहीं है। तुर्की के अपने महात्मा गाँधीअर्दोआनकी राह में एक बड़ा रोड़ा होंगे।(कॉपी: अमरीश हरदेनिया)

By श्रुति व्यास

संवाददाता/स्तंभकार/ संपादक नया इंडिया में संवाददता और स्तंभकार। प्रबंध संपादक- www.nayaindia.com राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समसामयिक विषयों पर रिपोर्टिंग और कॉलम लेखन। स्कॉटलेंड की सेंट एंड्रियूज विश्वविधालय में इंटरनेशनल रिलेशन व मेनेजमेंट के अध्ययन के साथ बीबीसी, दिल्ली आदि में वर्क अनुभव ले पत्रकारिता और भारत की राजनीति की राजनीति में दिलचस्पी से समसामयिक विषयों पर लिखना शुरू किया। लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों की ग्राउंड रिपोर्टिंग, यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के साथ अंग्रेजी वेबसाइट दिप्रिंट, रिडिफ आदि में लेखन योगदान। लिखने का पसंदीदा विषय लोकसभा-विधानसभा चुनावों को कवर करते हुए लोगों के मूड़, उनमें चरचे-चरखे और जमीनी हकीकत को समझना-बूझना।

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