nayaindia भारतीय समाज में नोबल पुरस्कार और भारत रत्न की राजनीतिक धारा
अजीत द्विवेदी

राजनीतिक पैमाने पर रत्नों का चुनाव

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दुनिया का कोई भी पुरस्कार या सम्मान किसी व्यक्ति की महानता के मूल्यांकन का पैमाना नहीं हो सकता है। पिछली सदी के सबसे महान राजनीतिक व सामाजिक विचारक और आंदोलनकारी महात्मा गांधी को शांति का नोबल पुरस्कार नहीं मिला है। लेकिन इससे गांधी की महानता में रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता है। ऐसे ही जितने लोगों को नोबल पुरस्कार मिले हैं वे सब हर कसौटी पर महान हैं ऐसा भी नहीं माना जा सकता है। दुनिया का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, खासकर शांति, साहित्य और अर्थशास्त्र का नोबल अक्सर भू-राजनीतिक स्थितियों से प्रभावित होता है।

अमेरिकी और पश्चिमी दुनिया के राजनीतिक नैरेटिव के हिसाब से ये पुरस्कार दिए जाते हैं। तभी इस सर्वोच्च पुरस्कार के विरोधाभास कई बार हैरान करने वाले होते हैं। महात्मा गांधी को शांति का नोबल नहीं मिला, लेकिन जिस व्यक्ति की कूटनीति से दुनिया के कई हिस्सों में हजारों लोग मारे गए उस हेनरी किसिंजर को शांति का नोबल मिला। अमेरिका को एक के बाद एक छह युद्धों में धकेलने वाले बराक ओबामा को भी नोबल मिला और दुनिया में युद्ध नीति के सबसे बड़े जानकार माने गए विंस्टन चर्चिल को शांति का तो नहीं लेकिन साहित्य का नोबल मिला।

दुनिया में नोबल पुरस्कारों को लेकर जैसी राजनीति होती रही है और पुरस्कार जिस तरह से भू-राजनीतिक स्थितियों से प्रभावित होते रहे हैं उसी तरह भारत रत्न का भी मामला है। भारत के अनेक महान स्वतंत्रता सेनानियों को उनके निधन को दशकों बाद भारत रत्न दिया गया। सोचें, कैसी विडंबना है कि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को एमजी रामचंद्रन के दो साल बाद 1990 में भारत रत्न मिला और सरदार वल्लभ भाई पटेल व मोरारजी देसाई को राजीव गांधी के साथ 1991 में भारत रत्न दिया गया। महान स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण को तो और भी इंतजार करना पड़ा। उनको 1999 में भारत रत्न मिला तो मदन मोहन मालवीय को 2015 में सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया गया।

भारत रत्न दिए जाने के इस पैटर्न को देख कर समझा जा सकता है कि किस तरह से विचारधारा के आधार पर सरकारों ने भेदभाव किया और भारत रत्नों का चुनाव किया। अब भी इस देश के सबसे मौलिक राजनीतिक-सामाजिक विचारक राममनोहर लोहिया को भारत रत्न नहीं मिला। बाबू जगजीवन राम से लेकर कांशीराम तक अनेक नेता ऐसे हैं, जिनको यह सम्मान नहीं मिला है। लेकिन इससे भारतीय राजनीति और समाज में उनक योगदान कम नहीं हो जाता है। चूंकि भारत रत्न के लिए ऐसी महान विभूतियों के नाम पर विचार नहीं होता है, जिनका निधन आजादी से पहले हो गया था इसलिए विभूतियों की सूची थोड़ी छोटी हो जाती है फिर भी ऐसी अनेक विभूतियां हैं, जो इससे वंचित रह गई हैं।

असम में आजादी के बाद ही कांग्रेस की सरकारों ने इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान को राजनीति का एक टूल बना दिया था। आखिरी बार जब कांग्रेस की सरकार को भारत रत्न देने का मौका मिला तो उसने 2014 में सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दिया था। उस समय सचिन की उम्र 40 साल के करीब थी और वे खेल से रिटायर भी नहीं हुए थे।

सोचें, भारत रत्न में खेल की श्रेणी नहीं थी इसलिए पहले की सरकारों ने महान ध्यानचंद या मिल्खा सिंह को इससे सम्मानित नहीं किया था। लेकिन जब खेल की श्रेणी में पुरस्कार दिया गया तो कांग्रेस की सरकार को सचिन तेंदुलकर पहले खिलाड़ी मिले, जिनको भारत रत्न दिया गया। उस समय लोकसभा के साथ ही महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव भी थे तो किसी ने कांग्रेस के नेताओं को समझाया होगा कि इससे महाराष्ट्र लगातार चौथी जीत मिल सकती है। सोचें, कैसी विडंबना है कि भारत रत्न सचिन अभी तक कोल्ड ड्रिंक्स से लेकर इनवर्टर का विज्ञापन कर रहे हैं!

भारत रत्न को लेकर जब भी यह बात उठती है कि पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी ने खुद प्रधानमंत्री रहते भारत रत्न ले लिया तो कांग्रेस के नेता या उसके इको सिस्टम में काम करने वाले फ्रीलांस विचारक कुछ तथ्य निकाल कर समझाते हैं कि कैसे नेहरू और इंदिरा ने खुद भारत रत्न नहीं मिला था, बल्कि राष्ट्रपति या दूसरे लोगों ने जबरदस्ती करके दिलाया था। सोचें, क्या आज राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू या सरकार के मंत्री जैसे राजनाथ सिंह या एस जयशंकर, निर्मला सीतारमण आदि जिद करके नरेंद्र मोदी को भारत रत्न दिला दें तो कांग्रेस इसे बरदाश्त करेगी? क्या इसकी आलोचना नहीं होगी? यह एक बहुत खराब परंपरा है, जिसकी शुरुआत कांग्रेस ने आजादी के सबसे बड़े नायकों में से एक और आधुनिक भारत के निर्माता पंडित नेहरू के समय ही कर दी थी।

बहरहाल, कांग्रेस ने जिस तरह भारत रत्न का इस्तेमाल किया अब भाजपा की सरकार भी उसी तरह इसका इस्तेमाल कर रही है। नरेंद्र मोदी ने अपने 10 साल के शासन में 10 भारत रत्न दिए हैं, जिनमें से आठ राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले हैं। भूपेन हजारिका और एमएस स्वामीनाथन दो ही ऐसे भारत रत्न हैं, जिनका राजनीति से मतलब नहीं था। नानाजी देशमुख भी राजनीति में रहे थे और बाद में सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में ज्यादा समय दिया। इनके अलावा बाकी भारत रत्न पाने वाली राजनीतिक हस्तियों को देखें तो स्पष्ट रूप से राजनीतिक पैटर्न दिखेगा।

मोदी सरकार ने पहले साल में अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न दिया। इसका पैमाना एक ही था कि वे भाजपा के संस्थापक नेता था और देश के प्रधानमंत्री रहे। अगर देश का प्रधानमंत्री होना भारत रत्न का पैमाना है तो फिर वीपी सिंह, चंद्रशेखर, एचडी देवगौड़ा, आईके गुजराल और मनमोहन सिंह क्यों वंचित रहेंगे? इनके पांच के अलावा सिर्फ नरेंद्र मोदी ही भारत रत्न से वंचित हैं। बाकी सभी आठ प्रधानमंत्रियों और दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे गुलजारीलाल नंदा को भारत रत्न मिल चुका है।

भारत रत्न के बारे में कुछ नियम तय हैं। जैसे एक अघोषित नियम यह है कि इसकी घोषणा आमतौर पर गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर की जाती है। इस साल गणतंत्र दिवस से पहले एक और बाद में चार पुरस्कारों की घोषणा हुई है। एक नियम यह भी है कि एक साल में तीन से ज्यादा भारत रत्न नहीं दिए जाएंगे लेकिन इस साल पांच भारत रत्न दिए गए हैं। चुनावी साल में पांच लोगों को भारत रत्न देकर अलग अलग जातियों, समुदायों और भौगोलिक क्षेत्र के सामाजिक, राजनीतिक समीकरण को साधने का प्रयास साफ दिख रहा है।

जिस तरह से पहले राजनीतिक नफा-नुकसान को ध्यान में रख कर अलग अलग समुदायों या भौगोलिक क्षेत्र में रहने वालों को खुश करने के लिए भारत रत्न चुने जाते थे वही परंपरा अब भी चल रही है। नरसिंह राव को भारत रत्न दिया गया, जिन्होंने आर्थिक सुधार किए थे लेकिन यह देखने की जरुरत नहीं समझी गई कि वे पहले प्रधानमंत्री थे, जिनके ऊपर सांसदों को रिश्वत देकर अपनी सरकार बचाने के आरोप लगे थे। ये आरोप प्रमाणित भी हुए थे। यह अलग बात है कि संसदीय विशेषाधिकार की वजह से रिश्वत लेने वाले सांसद और देने वाले सभी बच गए थे।

चौधरी चरण सिंह महान किसान नेता थे। उनकी ईमानदारी के भी किस्से कहे जाते हैं। लेकिन उतना ही अकल्पनीय उनका सत्ता मोह था। प्रधानमंत्री बनने के लिए उन्होंने राजनारायण के साथ मिल कर जिस तरह से जोड़ तोड़ किए थे, कई बार पार्टियां बदलीं और उस समय बाबू जगजीवन राम को बदनाम करने के लिए उनके बेटे सुरेश राम की एक महिला के साथ अश्लील तस्वीरों का कांग्रेस के साथ मिल कर जैसा इस्तेमाल हुआ था वह उनकी राजनीति के उजले पक्ष को नहीं दिखाता है। जिस कांग्रेस के खिलाफ जीवन भर लड़े उसकी मदद से प्रधानमंत्री बनने और अपमानजनक तरीके से हटने के घटनाक्रम से कोई अच्छा राजनीतिक मानक स्थापित नहीं हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने वैचारिक व राजनीतिक मार्गदर्शक लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न दिया।

उनके ऊपर बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा तोड़ने का मुकदमा चला था और लंबी मुकदमेबाजी के बाद नवंबर 2022 में वे बरी हुए। उनका नाम जैन हवाला डायरी में भी था और उस समय सुब्रह्मण्यम स्वामी ने दावा किया था कि वे साबित कर देंगे कि आडवाणी को दो करोड़ रुपए मिले थे। हालांकि बाद में इस मामले में भी आडवाणी बरी हो गए थे। उनके अलावा मोदी सरकार ने प्रणब मुखर्जी को भी भारत रत्न दिया, जिनके बारे में यह आम धारणा है कि देश में क्रोनी कैपिटलिज्म को एक राजनीतिक शिष्टाचार के तौर पर स्थापित करने में उनका अतुलनीय योगदान रहा।

देश के एक बड़े कारोबारी घराने को किस तरह उन्होंने स्थापित किया, मदद की, वह लोक कथा की तरह प्रचलित है। भारतीय राजनीति में उनके सकारात्मक और निर्मल योगदान की तलाश के लिए बहुत गहरी खुदाई की जरुरत होगी। इन सबके बीच एक चमकदार टापू की तरह कर्पूरी ठाकुर का भी नाम है, जिन्हें इस साल भारत रत्न मिला है।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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