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अभिनेताओं और खिलाड़ियों को क्यों चुनना?

भारत ही नहीं पूरी दुनिया में आम लोगों के मन में अभिनय और खेल की दुनिया को लेकर ग्लैमर का भाव रहता है। इसी तरह का भाव अंडरवर्ल्ड और बाहुबलियों को लेकर भी रहता है। वे उनके बारे में जानना चाहते हैं, उनको देखना और सुनना चाहते हैं और जब इनमें से कोई जनता के बीच आ जाता है तो लोग उसे लेकर दिवाने हो जाते हैं। लोगों की इसी दिवानगी की वजह से 1984 में अमिताभ बच्चन इलाहाबाद में हेमवती नंदन बहुगुणा को हरा देते हैं, जिनको तीन साल पहले 1981 में इंदिरा गांधी और संजय गांधी पूरी ताकत लगा कर पौड़ी गढ़वाल सीट पर नहीं हरा पाए थे।

राजेश खन्ना ने 1991 के चुनाव में नई दिल्ली सीट पर भाजपा के दिग्गज लालकृष्ण आडवाणी को भी लगभग हरा ही दिया था। वह तो आखिरी राउंड में चमत्कार हुआ, जिससे आडवाणी डेढ़ हजार वोट से जीते। हालांकि उस समय आडवाणी गांधीनगर सीट से भी जीते थे इसलिए उन्होंने नई दिल्ली सीट छोड़ दी और उप चुनाव में राजेश खन्ना ने भाजपा के शत्रुघ्न सिन्हा को 28 हजार से ज्यादा वोट से हराया।

लेकिन भारत की राजनीति और सार्वजनिक जीवन में इन तीनों अभिनेताओं ने कोई सार्थक या गुणवत्तापूर्ण योगदान नहीं दिया। अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना और शत्रुघ्न सिन्हा तीनों सुपर सितारे रहे और करोड़ों लोगों ने इनको दिल से पसंद किया। शत्रुघ्न सिन्हा तो आज भी सांसद हैं और इस बार भी चुनाव लड़ रहे हैं। वे केंद्र में मंत्री भी रहे। लेकिन एक सांसद के तौर पर अपने चुनाव क्षेत्र में या राजनेता के तौर पर राजनीतिक जगत में या विधायी कामकाज में उनके योगदान को रेखांकित करना मुश्किल है। यह बात कमोबेश वैसे सभी लोगों पर लागू है, जो पूर्णकालिक राजनेता नहीं हैं।

राजनीति जिनके लिए पार्ट टाइम काम है उनसे यह उम्मीद भी नहीं की जा सकती है कि वे अपना पूर्णकालिक काम छोड़ कर राजनीति को समय देंगे या राजनीति में कोई सार्थक योगदान करेंगे। 17वीं लोकसभा में हेमामालिनी, शत्रुघ्न सिन्हा, सन्नी देओल, गौतम गंभीर, मनोज तिवारी, दिनेश लाल यादव निरहुआ, रविकिशन, लॉकेट चटर्जी, शताब्दी रॉय जैसे फिल्मों और खेल से जुड़ी कई हस्तियां सदस्य रहीं। लेकिन विधायी कामकाज में इन सबका संचित योगदान शून्य से ज्यादा नहीं होगा। दक्षिण भारत के फिल्मी सितारों और वहां की जनता का मामला अलग है। तमिलनाडु में तो एमजी रामचंद्रन और जयललिता जैसे सुपर सितारे कई बार मुख्यमंत्री बने। आंध्र प्रदेश में भी एनटी रामाराव मुख्यमंत्री रहे। वहां लोग फिल्मी सितारों को भगवान मानते हैं, पूजा करते हैं और फिल्मी सितारे भी लोगों के प्रति अपनी जवाबदेही मानते हैं और उनके लिए काम करते हैं। इसलिए उनकी बात अलग है।

तभी सवाल है कि फिर अभिनेता, अभिनेत्री, खिलाड़ी या गैंगेस्टर और बाहुबली को क्यों संसद सदस्य के तौर पर चुनना चाहिए? सुनीत दत्त जैसे एकाध गौरवशाली अपवादों को छोड़ दें ज्यादातर अभिनेताओं और खिलाड़ियों के लिए संसद की सदस्यता एक तमगे या एक फिल्मी अवार्ड की तरह है, जिसे वे अपने कंधे पर सजा कर घूमते हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें इससे कोई विशेषाधिकार मिल जाता है या राजनीति में वे पैसे कमाने के लिए आते हैं।

वे फिल्म और खेल बिरादरी के बाकी सदस्यों से अपने को अलग और विशिष्ठ दिखाने के लिए राजनीति में आते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि पार्टियां उनको खींच कर राजनीति में लाती हैं क्योंकि उनको लगता है कि मजमा जमाने के लिए किसी मदारी की जरुरत है। अभिनेता और खिलाड़ी भीड़ खींचते हैं। लोगों के दिमाग में उनकी फिल्म वाली काल्पनिक छवि बनी रहती है, जिसमें वे अपना मसीहा देखते हैं और उसे वोट देते हैं। इससे पार्टियों का तो हित सध जाता है और कुछ हद तक सितारों का भी हित सध जाता है लेकिन जनता तो ठगी जाती है।

इसलिए आम मतदाता को इस बारे में एक सिद्धांत तय करना चाहिए। इस बार भी कई फिल्मी सितारें चुनाव लड़ रहे हैं। मतदाताओं को उनका आकलन वस्तुनिष्ठ तरीके से करना चाहिए। उनसे सवाल पूछना चाहिए, उनकी प्रतिबद्धता जांचनी चाहिए और अगर लगे कि वे पूर्णकालिक राजनीति में उतर रहे हैं और हमेशा उनके सुख-दुख के सहभागी रहेंगे तभी उनको वोट देना चाहिए।

जो पूर्णकालिक नेता होते हैं उनमें भी अच्छे-बुरे होते हैं लेकिन सामान्यतः वे जनता के दुख-सुख के समय उसके साथ होते हैं। वे सांसद बनने के बाद फिल्म या सीरियल की शूटिंग करने और क्रिकेट खेलने या क्रिकेट की कमेंटरी करने नहीं चले जाते हैं। वे अपने चुनाव क्षेत्र में रहते हैं और संसद की कार्यवाहियों में भी हिस्सा लेते हैं। विधायी कामकाज में शामिल होते हैं और अपने क्षेत्र की जनता की समस्याएं भी संसद में उठाते हैं। वे कितने कामयाब होते हैं यह अलग बात है लेकिन सामान्यतः उनकी प्राथमिकताएं तय होती हैं।

यह समझने की जरुरत है कि राजनीति कोई पार्ट टाइम काम नहीं है। यह फुल टाइम जॉब है, जिसमें नेता को अपने को खपाना पड़ता है। पार्टी सिस्टम की जड़ें भारत में बहुत गहरी हैं फिर भी पार्टियों के उम्मीदवार का व्यक्तित्व और उसका कामकाज बहुत मायने रखता है। इसके उलट फिल्मी सितारों या खिलाड़ियों के पास राजनीति और जनता का काम करने के लिए समय नहीं होता है क्योंकि राजनीति या समाजसेवा उनकी प्राथमिकता नहीं होती है। इसके प्रति उनकी कोई प्रतिबद्धता नहीं होती है और न उनका कोई सरोकार होता है। कोई अभिनेता फिल्म में गरीब का रोल करता है तो इससे गरीबों के प्रति उसके मन में करुणा का सागर लहराने नहीं लगता है।

यह वैसे ही है जैसे वह अपराधी का रोल करके अपराधियों की तरह नहीं हो जाता है। फिल्मों में व्यवस्था विरोधी नायक की भूमिका निभाने वाला भी व्यवस्था और यथास्थिति का समर्थक होता है। इसलिए उसकी फिल्मी भूमिकाओं से प्रभावित होने की जरुरत नहीं है। सो, फिल्मी सितारे या खिलाड़ी चाहे जिस पार्टी से लड़ रहे हों उनको आंख मूंद कर समर्थन देने की जरुरत नहीं है। इसके उलट आम लोगों को पार्टियों से भी पूछना चाहिए कि उन्होंने उनके बीच का कोई नेता चुनाव में उतारने की बजाय कहीं बाहर से लाकर किसी फिल्मी सितारे को क्यों चुनाव लड़ाया है?

फिल्मी सितारों या खिलाड़ियों के बारे में यह कहने का मकसद उनका या उनके पेशे का अपमान करना नहीं है। उनका काम सम्मानजनक है और वे देश से बाहर भारत के राजदूत की तरह देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन जब वे राजनीति में आते हैं तो एकाध अपवाद को छोड़ दें तो वे उसके साथ न्याय नहीं कर पाते हैं और जब राजनीति के साथ न्याय नहीं कर पाते हैं तो वह सीधे तौर पर जनता के साथ अन्याय होता है। इसलिए उन्हें खुद भी राजनीति में उतरने का फैसला तभी करना चाहिए, जब उन्हें लगे कि वे राजनीति और सार्वजनिक जीवन में कोई सार्थक योगदान दे पाएंगे और विधायी कामकाज में उनकी हिस्सेदारी से आम लोगों का जीवन बेहतर होगा। अगर वे ऐसा नहीं कर सकते हैं तो उन्हें राजनीति में नहीं आना चाहिए। अगर कोई पार्टी खींच कर लाना चाहे तो उन्हें पार्टियों के लिए मदारी बनने से इनकार कर देना चाहिए।

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