इस बार बजट को लेकर जैसी उदासीनता रही वैसे हाल के दिनों में कई बजटों में नहीं देखने को मिली। बजट बिल्कुल सपाट और रूटीन का था और इसलिए बहुत जल्दी सामान्य चर्चा से बाहर हो गया। असल में यह बजट ऐसा ही होने वाला था। इसका कारण यह है कि यह नरेंद्र मोदी की तीसरी सरकार का तीसरा और मध्यावधि का बजट था। इसके बाद चुनावी बजट होंगे। अगले साल 2027 में उत्तर प्रदेश सहित सात राज्यों के चुनाव हैं। सो, बजट का फोकस उन राज्यों पर होगा और 2028 मोदी की तीसरी सरकार का आखिरी पूर्ण बजट होगा तो उसका फोकस 2029 के चुनाव पर होगा। इसलिए, जो कुछ भी अलोकप्रिय या अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक सुधार के नीतिगत फैसले करने थे उनके लिए यही बजट था। इसके अलावा पिछले बजट में सरकार ने आयकर छूट 12 लाख रुपए करके इतनी बड़ी आतिशबाजी कर दी थी कि इस बार करने को कुछ नहीं था।
वैसे भी जब से अप्रत्यक्ष कर का बड़ा हिस्सा बजट से बाहर हुआ है तब से आम लोगों की दिलचस्पी वाली बहुत कम चीजें बजट में होती हैं। गौरतलब है कि वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी का मामला बजट से बाहर है। इसलिए सस्ता और महंगा का थोड़ा बहुत मामला कस्टम ड्यूटी से जुड़ा होता है, जिसका जिक्र बजट में किया जाता है। ध्यान रहे सरकार ने पिछले साल जीएसटी 2.0 लॉन्च किया, जिसमें रोजमर्रा के इस्तेमाल की ज्यादातर चीजें पांच फीसदी या जीरो फीसदी के स्लैब में डाल दी गईं। सरकार ने एक तरह से राजस्व कम होने का रिस्क लिया। हालांकि कीमतें कम होने से व्यापार का वॉल्यूम बढ़ा। इसकी वजह से पिछले तीन महीने में हर महीने जीएसटी का संग्रह भी बढ़ा है। सो, बजट में इस साल प्रत्यक्ष कर यानी आयकर पर कोई फैसला नही होना था और अप्रत्यक्ष कर यानी जीएसटी बजट से बाहर है, जिसमें सरकार ने ऑलरेडी बड़ी छूट दे दी थी तो बजट को सपाट होना ही था। इसलिए इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है।
आम बजट सरकार के आय और व्यय का लेखा जोखा होता है और साथ ही नीतिगत दस्तावेज भी होता है। लेकिन यह भी ध्यान रखने की बात है कि बहुत सारे नीतिगत फैसले सरकार अब बजट से बाहर करती है। जैसे श्रम सुधारों के लिए नए लेबर कोड लाए गए तो सरकार ने उसके लिए बजट का इंतजार नहीं किया। पिछले साल सरकार ने इसे लागू कर दिया। ऐसे ही ग्रामीण रोजगार की महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना की जगह विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका यानी वीबी जी राम जी कानून बना तो उसके लिए भी सरकार ने बजट का इंतजार नहीं किया। सो, बजट अब नीतिगत फैसले करने का मौका भी नहीं रह गया है। इसलिए मोटे तौर पर बजट को एक ऐसा दस्तावेज माना जाए, जिसमें सरकार बताती है कि उसे कहां कहां से कितना पैसा आएगा और उसे वह कहां कहां किस रूप में खर्च करेगी। सरकार ने बताया कि उसे टैक्स और गैर टैक्स सोर्स से कुल आमदनी 36.5 लाख करोड़ रुपए की होगी और कुल खर्च 53.5 लाख करोड़ रुपए का होगा। कमाई से ज्यादा खर्च हो रहा है इसलिए सरकार 12 लाख करोड़ रुपए के करीब कर्ज लेगी और बाकी इंतजाम आम आदमी की छोटी बचतों से किया जाएगा। करीब 80 हजार करोड़ रुपए विनिवेश से भी जुटाए जाएंगे। हालांकि विनिवेश पर एक तरह से रोक ही लग गई है। इसके राजनीतिक कारण हैं लेकिन एक कारण यह भी है कि भारत के ज्यादातर बड़े सार्वजनिक उपक्रम अब लाभ कमाने लगे हैं।
बहरहाल, बजट दस्तावेजों की मानें तो सब कुछ काबू में है और अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स बहुत मजबूत हैं। भारत के जीडीपी के मुकाबले कर्ज 56 फीसदी के करीब है, जिसे घटा कर 55 और फिर 50 फीसदी तक लाना है। ध्यान रहे अमेरिका पर कर्ज उसके जीडीपी के 128 फीसदी तक है। दुनिया के ज्यादातर विकसित देशों में जीडीपी के अनुपात में कर्ज एक सौ फीसदी या उससे ज्यादा है। दूसरी बात यह है कि भारत ने राजकोषीय घाटे को चार फीसदी से नीचे लाने के लक्ष्य पर काम शुरू कर दिया है। पिछले साल राजकोषीय़ घाटा 4.4 फीसदी रहा, जिसे अगले वित्त वर्ष में 4.3 फीसदी करने का लक्ष्य रखा गया है। इसी तरह महंगाई भी अगले वित्त वर्ष में रिजर्व बैंक की ओर से तय चार फीसदी के लक्ष्य से नीचे ही रहने का अनुमान है। ध्यान रहे सरकार महंगाई के बास्केट में खाने पीने की चीजों का वजन कम करने वाली है। इसे 46 फीसदी से घटा कर 36 वया 37 फीसदी किया जाएगा। इससे सीजनल महंगाई का आंकड़ा भी काबू में दिखेगा। बहरहाल, इन आंकड़ों से सरकार ने बताया कि वह वित्तीय अनुशासन को ध्यान में रख कर ही काम कर रही है।
सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के बजट को इस रूप में पेश किया है, जैसे यह दुनिया के देशों के साथ हो रही मुक्त व्यापार संधियों के लिए प्लेटफॉर्म तैयार करने वाला दस्तावेज है। सरकार ने विनिर्माण के ऊपर ध्यान दिया और उन सेक्टर में ज्यादा सुधार के प्रयास किए हैं, जिनमें भारत अपना निर्यात बढ़ा सकता है। ध्यान रहे भारत के लिए इस समय सबसे जरूरी यही है कि अगर दुनिया का बाजार उसके लिए खुल रहा है तो वह उस मौके का इस्तेमाल करने के लिए तैयार हो। आयात शुल्क के ढांचे में जो भी बदलाव हुए हैं वह भी इसी को ध्यान में रख कर किए गए हैं। सरकार ने 12.20 लाख करोड़ रुपए पूंजीगत खर्च के लिए आवंटित किए हैं, जिसका 47 फीसदी हिस्सा सड़क और रेल नेटवर्क के विस्तार पर खर्च होगा। जाहिर है बुनियादी ढांचा मजबूत रखने के लिए यह जरूरी है लेकिन चूंकि भारत में निजी पूंजी निवेश बहुत कम है इसलिए अर्थव्यवस्था को चलाए रखने के लिए सरकार की ही खर्च करने की मजबूरी है।
यही इस बजट की और भारत की अर्थव्यवस्था की कमजोरी जाहिर होती है। बजट से पहले आए आर्थिक सर्वे में निजी पूंजी निवेश कम होने पर चिंता जताई गई थी लेकिन ऐसा कोई उपाय नहीं दिख रहा है, जिससे लगे कि अगले वित्त वर्ष में निजी निवेश बढ़ेगा। चिंता की दूसरी बात भारत का नॉमिनल जीडीपी लगातार दो साल से सिंगल डिजिट में है यानी 10 फीसदी से नीचे है। इसका अर्थ है कि वस्तुओं और सेवाओं का उपभोग कम हो रहा है, जिससे अर्थव्यवस्था वांछित गति से नहीं बढ़ रही है। रियल जीडीपी भले छह से आठ फीसदी के बीच रहे लेकिन भारत में नॉमिनल जीडीपी यानी मुद्रास्फीति को एडजस्ट किए बगैर उत्पादित आय के बढ़ने का प्रतिशत हमेशा दहाई में होता था। ध्यान रहे भारत उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था है और कुल जीडीपी में निजी उपभोग का हिस्सा 61 फीसदी है। अगर उसमें वांछित रफ्तार से बढ़ोतरी नहीं होगी तो फिर यह एक बड़ी समस्या है।
एक चिंता सरकार के राजस्व में कॉरपोरेट टैक्स का हिस्सा कम होने से भी पैदा हुई है। टैक्स सोर्स से होने वाली आय में लगभग आधा हिस्सा आयकर, जीएसटी और कस्टम ड्यूटी का है, जो सीधे आम आदमी की जेब से जाता है। सरकार ने इस बात का बहुत दावा किया कि जीएसटी में कटौती से एक लाख करोड़ रुपए का राजस्व कम होगा लेकिन इसकी चर्चा कम होती है कि कॉरपोरेट टैक्स में कटौती से डेढ़ लाख करोड़ रुपए का सालाना राजस्व कम होता है। यह भी बहुत चिंताजनक बात है कि शिक्षा पर बजट का सिर्फ दो फीसदी और स्वास्थ्य पर दो फीसदी से कुछ ज्यादा का आवंटन हुआ है। दोनों पर कम से कम तीन तीन फीसदी बजट आवंटन होना चाहिए। सरकार अगर विकसित भारत या भविष्य को ध्यान में रख कर काम कर रही है तो उसे इन बुनियादी चिंताओं को दूर करने पर ध्यान देना चाहिए।


