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एक देश, एक मुद्दा, एक प्रदर्शन

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग विपक्ष नहीं छोड़ेगा। इस मुद्दे पर हो सकता है कि अभी त्योहारों के कारण प्रदर्शन कुछ धीमा पड़े लेकिन विपक्ष का अभियान जारी रहेगा। ऐसे ही मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को रद्द कराने की लड़ाई भी चलती रहेगी। यह लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ी जाएगी, सड़क पर प्रदर्शन होंगे और अगले महीने संसद के शीतकालीन सत्र में विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को घेरेगा, जवाब मांगेगा। सुप्रीम कोर्ट से लेकर सड़क और संसद की लड़ाई विपक्ष साझा तौर पर लड़ेगा।

राहुल गांधी के सुप्रीम कोर्ट मार्च और उसके अगले दिन उनके सुनहरी बाग लेन आवास पर हुई विपक्ष की बैठक के बाद जो तस्वीर दिखाई दी उसका संकेत यही है कि अब विपक्ष एक साथ प्रदर्शन करने पर सहमत हो गया है। इससे पहले विपक्ष का विरोध बिखरा हुआ था। सरकार भी अपने तरीके से इस बिखराव को बढ़ा रही थी। विपक्ष के नेताओं ने सरकार के रवैए को समझा और आपस में संवाद करके एक देश, एक मुद्दा, एक प्रदर्शन की रणनीति बनाई।

पिछले दो हफ्ते से यह बात बार बार उठ रही थी कि जब मुद्दा एक है कि एसआईआर के जरिए गड़बड़ी की गई है और मुख्य चुनाव आयुक्त ने मनमाने तरीके से आयोग को चलाया है तो फिर उस पर अलग अलग प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं? एक तरफ ‘इंडिया’ ब्लॉक ने बैठक करके विरोध प्रदर्शन की रणनीति बनाई थी तो दूसरी ओर आम आदमी पार्टी ने कॉकरोच जनता पार्टी को समर्थन देकर उनके प्रदर्शन की हवा बनवाई थी।

कम्युनिस्ट पार्टियों की दुविधा दिख रही थी। वे दोनों तरफ थे। लेफ्ट पार्टियों के छात्र संगठन के नेता सीजेपी के प्रोटेस्ट में भी शामिल हो रहे थे और विपक्ष के प्रोटेस्ट में भी। जमीन पर विरोध बिखरा हुआ था तो सोशल मीडिया में सीजेपी और आप ने कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ था।

विपक्ष के इस अंतर्विरोध को सरकार ने और बढ़ाया। जब कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन ने प्रदर्शन किया तो दिल्ली पुलिस ने उसको रूटीन के अंदाज में हैंडल किया। लेकिन सीजेपी ने जब प्रदर्शन का ऐलान किया तो सरकार ने अर्धसैनिक बलों को सड़क पर उतार दिया। अर्धसैनिक बलों और दिल्ली पुलिस के करीब 40 हजार जवान तैनात किए गए। दिल्ली को किले में तब्दील कर दिया गया। सरकार ने दिखाया कि वह कांग्रेस और समूचे विपक्ष के मुकाबले सीजेपी के प्रोटेस्ट को ज्यादा तवज्जो दे रही है। पहले दिन यानी 10 अक्टूबर को इसका असर भी दिखा। कांग्रेस और सपा जैसी विपक्षी पार्टियों ने इस मुकाम पर समझदारी दिखाई। उन्होंने सीजेपी की आलोचना करने की बजाय उनको नैतिक समर्थन दिया और प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई का विरोध किया।

लेकिन इसके बाद ही विपक्ष के नेताओं ने बिखराव को दूर करने का प्रयास शुरू किया। ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस को इस प्रयास में कामयाबी मिली है। विपक्ष की जो पार्टियां सीजेपी का समर्थन कर रही थीं उन्होंने उसे छोड़ दिया है। तभी मंगलवार, 13 अक्टूबर को सीजेपी के लोग जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने पहुंचे तो वहां मुश्किल से 10 लोग जुटे। आशुतोष रांका, सौरव दास और अजिंक्य शिंदे को थाने में रखा गया तो वहां कोई भी नारेबाजी करने नहीं पहुंचा। अगले दिन यानी बुधवार, 14 अक्टूबर को इन सबको कोर्ट में पेश किया गया तो वहां न वकीलों की फौज दिखी और न समर्थक दिखे। शिंदे बॉन्ड भर कर छूटे तो रांका और दास को जेल भेज दिया गया। सोचें, पहले वाली बात होती तो हजारों लोग सड़क पर होते, ऑनलाइन मुहिम चल रही होती और सीजेपी के नेताओं के लिए कपिल सिब्बल अदालत में खड़े होते।

ऐसा लग रहा है कि सीजेपी ने जन समर्थन भी गंवा दिया है और विपक्षी पार्टियों का सद्भाव भी कम हो गया है। उनके पास अपना कोई कैडर या संगठन है नहीं। यह अब भी एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है। इनकी अपील का भी असर नहीं दिख रहा है क्योंकि छात्रों व युवाओं को भी लग रहा है कि सीजेपी के नेता अब उनके हितों की बजाय राजनीतिक नैरेटिव को प्रभावित करने की लड़ाई में उतर गए हैं। ऐसे में वे सीजेपी जैसे किसी संगठन के साथ जुड़ने की बजाय सीधे मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों का ही समर्थन कर सकते हैं।

सीजेपी के नेताओं ने कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोल कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी। उन्होंने सोशल मीडिया में यह लिखना शुरू कर दिया कि कोई एक पार्टी या संगठन लोकतंत्र बचाने की लड़ाई पर अपना एकाधिकार नहीं बता सकता है। इस क्रम में वे भूल गए कि कांग्रेस और दूसरी पार्टियां यह लड़ाई पहले से लड़ रही हैं और इसकी कीमत चुका रही हैं। सीजेपी मुख्यधारा की कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है। उसका काम एक दबाव समूह का था और सबको पता है कि दबाव समूह किसी एक मुद्दे को लेकर काम करते हैं। पहले भी अलग अलग मुद्दों पर अलग अलग गैर सरकारी संगठन काम करते थे। कोई नर्मदा बचाओ आंदोलन कर रहा था तो कोई सूचना के अधिकार की लडाई लड़ता था।

यहां सीजेपी ने पेपर लीक के मसले पर युवाओं के दिल दिमाग में जगह बनाई। छात्र और युवा उसके साथ जुड़े। इसका लाभ सीजेपी को हुआ। लेकिन उसके बाद सीजेपी ने हर मुद्दे पर, जिसमें विशुद्ध राजनीतिक मुद्दा भी शामिल था, विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। उन्होंने शिक्षा में सुधार और स्कूल बदलो अभियान को छोड़ दिया और राजनीतिक मुद्दों पर मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के साथ मुकाबला शुरू कर दिया। पुरानी सफलता की वजह से शुरुआत में इस मामले में भी उनको तवज्जो मिली लेकिन जल्दी ही मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों ने उनकी मंशा भांप ली और अपने को अलग किया।

सो, अब करॉकरोच जनता पार्टी पूरी तरह से अलग थलग है और विपक्षी पार्टियां एकजुट होकर ल़ड़ने को तैयार हैं। सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर को रद्द कराने के साथ साथ उन मुद्दों पर भी याचिका दायर की गई है, जो मुद्दे ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपनी खोजी रिपोर्ट में उठाए थे। दो चुनाव आयुक्तों को दरकिनार करके मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा फैसले करना और ईसीआईनेट व ईआरओनेट के एक्सेस को सीमित करना, ये दो ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर विपक्ष चुनाव आयोग और सरकार पर निशाना साध रहा है। बहरहाल, अब यह देखना होगा कि विपक्ष की एकता कब तक कायम रहती है, आम आदमी पार्टी क्या करती है और कॉकरोच जनता पार्टी की आगे की रणनीति क्या होती है? सरकार की नजर भी इसी पर रहेगी। अगर विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त और एसआईआर के खिलाफ साझा आंदोलन जारी रखता है तो सरकार की मुश्किलें बढ़ेंगी।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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