लोकतंत्र को लेकर पूरी दुनिया में दो बातों पर सहमति है। पहली, भले परफेक्ट नहीं हो लेकिन शासन के दूसरे सारे स्वरूपों के मुकाबले लोकतंत्र सबसे अच्छा है। और दूसरी, असहमति की आवाजों से लोकतंत्र मजबूत होता है। असहमति या प्रतिरोध का दमन लोकतंत्र को कमजोर करता है। इंदिरा गांधी ने 1975 में इमरजेंसी लगाई थी। वह कोई असंवैधानिक काम नहीं था। संविधान के प्रावधानों का इस्तेमाल करके उन्होंने इमरजेंसी लगाई थी लेकिन उस समय जिस तरह का दमन हुआ, आज तक कांग्रेस उसके दाग नहीं धो पाई है। कांग्रेस आज भी इमरजेंसी को लेकर बैकफुट पर रहती है। वह पीढ़ी अभी जिंदा है, जिसने इमरजेंसी की ज्यादतियां देखी या झेली हैं। जीते जी उनकी स्मृति से इमरजेंसी की यादें नहीं निकल सकती हैं।
उसी तरह से आज की पीढ़ी, जिसमें 14 से 29 साल की उम्र वाली पीढ़ी यानी ‘जेन जी’ और उससे पहले वाली दो पीढ़ियां यानी ‘मिलेनियल्स’ और ‘जेन एक्स’ की स्मृति में क्या दर्ज हो रहा है? उनकी कैसी यादें बन रही हैं? उनको भविष्य की झांकी यह दिखाई जा रही है कि 2047 में भारत विकसित हो जाएगा लेकिन वर्तमान ऐसा है, जिसमें पेपर लीक होने पर अगर वे प्रदर्शन करते हैं तो उनको देश विरोधी कहा जाता है। मतदाता सूची से नाम कटने के विरोध में प्रदर्शन करते हैं तो उनको असामाजिक तत्व और बाहरी ताकतों के हाथ का खिलौना कहा जाता है। मंदिर में चढ़ावा चोरी का विरोध करते हैं तो हिंदू विरोधी कहा जाता है। महंगाई और बेरोजगारी का विरोध करते हैं तो उन पर लाठियां चलाई जा रही हैं और हिरासत में लेकर गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। अगर वर्तमान ऐसा है तो उनके मन में भविष्य की कैसी उम्मीदें आकार ले रही होंगी!
राजधानी दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी, वामपंथी पार्टियों और सिविल सोसायटी के लोगों के प्रदर्शन को रोकने के लिए पुलिस ने जिस पैमाने पर कार्रवाई की है वह अभूतपूर्व है। इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ होगा कि किसी प्रतिरोध या असहमति को दबाने के लिए इतने बड़े पैमाने पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती करनी पड़ी हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले कुछ समय से ‘स्पीड’ और ‘स्केल’ की बहुत बात कर रहे हैं। उन्हीं के शब्दों में कहें तो पुलिस की तैयारी और कार्रवाई का जो ‘स्केल’ है वह इतिहास में कभी देखने को नहीं मिला। कम से कम जिन तीन पीढ़ियों की ऊपर बात हुई है उन्होंने तो नहीं देखा है। सवाल है कि इतना प्रयास करके या इतनी ज्यादती करके युवाओं और छात्रों को प्रदर्शन करने से रोकने का क्या उद्देश्य है? इससे सरकार क्या हासिल करना चाहती है?
अगर लोग जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर लेते तो क्या हो जाता है? या प्रदर्शन से पहले सरकार आउटरीच करती और प्रदर्शन का ऐलान करने वालों से बात कर लेती तो क्या बिगड़ जाता? ध्यान रहे कॉकरोच जनता पार्टी के लोगों के साथ सरकार ने पिछले प्रदर्शन के समय कई बार बात की और उनकी मांगें मान कर केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा कराया था। इसलिए ऐसा भी नहीं था कि कोई नया चैप्टर खुलने वाला था। सरकार चाहती तो उनसे बात हो सकती थी और उनको सीमित प्रदर्शन की मंजूरी भी दी जा सकती थी। बहुत सख्त सुरक्षा व्यवस्था के बीच उनका प्रदर्शन होने दिया जा सकता था। लेकिन ऐसा लगा, जैसे सरकार ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाया। उसने यह संकल्प किया कि किसी भी हाल में प्रदर्शनकारियों को जंतर मंतर नहीं पहुंचने देना है। इसमें तो काफी हद तक पुलिस और अर्धसैनिक बल कामयाब रहे लेकिन बड़ा सवाल है कि किस कीमत पर?
यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि पिछले कुछ समय से सरकार जो भी कदम उठा रही है वह उलटा पड़ रहा है या उसका वैसा सकारात्मक असर नहीं हो रहा है, जैसे असर की उम्मीद सरकार को होती है। इस बार जब कॉकरोच जनता पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन का ऐलान किया तो सरकार ने सोचा कि इस मामले में हमेशा के लिए सेटल कर देना है। शक्ति का ऐसा प्रदर्शन करना है कि सब डर जाएं और सरकार के खिलाफ खड़े होने के बारे में सोचे भी नहीं। लेकिन पूरा मामला उलटा पड़ गया। सरकार के ओर से इतना शक्ति प्रदर्शन करने के बाद ऐसा लग रहा है कि लोगों का डर समाप्त हो गया। वे सीधे पुलिस से भिड़ रहे हैं। सीजेपी और विपक्ष के प्रदर्शन को बदनाम करने के लिए दिल्ली पुलिस की महिला पुलिसकर्मियों के ऐसे वीडियो जारी किए गए, जिनमें उनकी बेहद दयनीय दशा दिख रही है। यह पहली बार हुआ कि सर्व शक्तिशाली सरकार ने दमन के अपने सबसे कारगर उपकरण यानी पुलिस को इतनी दयनीय अवस्था में और विक्टिम की तरह पेश किया। इससे पुलिस के प्रति पता नहीं सहानुभूति कितनी हुई, लेकिन उसकी कमजोरी जाहिर हो गई और उसकी साख व इकबाल पर नकारात्मक असर हुआ।
प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए सरकार ने दिल्ली के मेट्रो स्टेशन बंद किए और ढाई सौ के करीब ट्रेनें रद्द कीं। प्रदर्शनकारियों पर इसका रत्ती भर असर नहीं हुआ लेकिन लाखों आम आदमी, जिनकी यात्रा रद्द हुई या जिनको इस वजह से परेशानी उठानी पड़ी क्या उनकी कोई सकारात्मक स्मृति सरकार के प्रति बनी होगी? आठ अक्टूबर को यही सरकार आईआरसीटीसी के हवाले से मीडिया में खबर प्लांट करा रही थी कि राहुल गांधी और विपक्ष के राजघाट जाने के कारण रास्ता बंद हुआ और पांच हजार लोगों की ट्रेन छूटी। उसी सरकार ने बिना किसी पूर्व सूचना के नौ अक्टूबर को ऐलान किया कि लंबी दूरी की ढाई सौ ट्रेनें रद्द की जाती हैं।
क्या सरकार बताएगी कि इस वजह से कितने लोगों की ट्रेन छूटी, यात्रा स्थगित हुई? उनमें कितने लोग नौकरी, रोजगार, शिक्षा या स्वास्थ्य सेवाओं के लिए ट्रैवल करने वाले थे? कितने लोगों ने महीनों पहले सीट आरक्षित कराई थी और आगे उनको कितने दिन बाद का आरक्षण मिलेगा? नवरात्रों की शुरुआत से पहले खाने, पीने की दुकानों से लेकर शराब की दुकानों को बंद कराने का क्या असर कारोबार पर पड़ा क्या सरकार ने उसका आकलन कराया है? जिन कारोबारियों को इस रैंडम और मनमाने फैसले से परेशानी उठानी पड़ी क्या उनके मन में सरकार की सकारात्मक स्मृति बन रही है? जिन युवाओं के ऊपर लाठियां पड़ी हैं या जिन्हें जानवरों की तरह घसीट कर बसों में भरा गया और डिटेंशन सेंटर ले जाया गया, उनकी और उनके माता-पिता की क्या स्मृति बनी होगी!
वास्तविकता यह है कि ‘जेन एक्स’, ‘मिलेनियल्स’ और ‘जेन जी’ तीनों की स्मृतियों में पढ़ाई और परीक्षा का मतलब पेपर लीक के रूप में दर्ज हो रहा है। चुनाव का मतलब वोट चोरी और मंदिर का मतलब चढ़ावा चोरी के रूप में दर्ज हो रहा है। इसे उनके मन मस्तिष्क से नहीं निकाला जा सकेगा। स्मृतियां ऐसे ही बनती हैं और पीढ़ियों तक संरक्षित रहती हैं। तभी सनातन का समर्थन करने वाले इकोसिस्टम के लोग भी कहने लगे हैं कि अब सिर्फ ‘राज’ बचा है, ‘योग’ समाप्त हो गया है।
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