बयान पर हस्ताक्षर करने के पीछे भारत का आकलन यह रहा होगा कि ये चीन को घेरने की कोशिश का हिस्सा है। जबकि अमेरिका खुद भारत के खिलाफ ऐसे ही आरोपों की जांच कर रहा है।
भारत जी-20 के अंदर एक ऐसी अमेरिकी पहल का हिस्सा बना है, जिसका घोषित उद्देश्य अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता और मुक्त बाजार विरोधी नीतियों पर अंकुश लगाना है। इस मंत्री-स्तरीय बयान पर दस्तखत करने के पीछे भारत का आकलन यह रहा होगा कि यह चीन को घेरने की कोशिश का हिस्सा है। लेकिन विडंबना यह है कि अमेरिका खुद भारत के खिलाफ ऐसे ही आरोपों की जांच कर रहा है। वह ये जांच अपने व्यापार कानून की धारा 301 के तहत कर रहा है। भारत के पेट्रो-केमिकल्स, इस्पात और सौर मॉड्यूल जैसे क्षेत्र इस जांच के दायरे में हैं। भारत निर्मित सौर मॉड्यूल्स के लिए तो अमेरिकी बाजार में बड़ी रुकावट पहले ही खड़ी की जा चुकी है।
तो अब यह बड़ा सवाल है कि भारत विश्व व्यापार में कथित अनुचित प्रतिस्पर्धा के मुद्दे पर अमेरिका से सहयोग करते हुए अपनी औद्योगिक विकास नीति और घरेलू उद्योगों के लिए संरक्षण को कैसे सुनिश्चित करेगा? जी-20 के अंदर ब्राजील, इंडोनेशिया, रूस, सऊदी अरब और दक्षिण अफ्रीका ने उपरोक्त साझा बयान पर हस्ताक्षर नहीं किए। चीन ने तो इस पर एतराज जताया ही। वैसे, चीन अमेरिका और यूरोप से अपनी आर्थिक ताकत के आधार पर डील कर रहा है। इलेक्ट्रिक वाहनों के मामले में लंबे समय से दबाव बनाने के बाद बीते हफ्ते यूरोपियन यूनियन ने चीन के साथ करार कर लिया, जिसके तहत 45.3 प्रतिशत के सामान्य टैरिफ को हटा कर मूल्य आधारित शुल्क लगाने पर ईयू राजी हो गया है।
अमेरिका ने हाल में खुद चीन से बराबरी के स्तर पर करार किए हैं। जबकि भारत पर उसकी नकेल कसती गई है। बीते हफ्ते अमेरिका ने टीसीएस, इंफोसिस, एचसीएल, कॉग्निजेंट और विप्रो जैसी चुनिंदा भारतीय टेक कंपनियों के लिए स्थायी श्रम प्रमाणन प्रक्रिया रोक दी। इसी सिलसिले में अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वैंस ने एच-1बी वीजा पर अमेरिका गए भारतीय टेक कर्मियों को ‘विदेशी बंधुआ मजदूर’ कहा। भारत ने इस टिप्पणी को ‘अत्यधिक आपत्तिजनक’ बताया। मगर इसी बीच भारत उस अमेरिकी पहल का हिस्सा भी बन गया, जो भारत के ही खिलाफ जा सकता है। नरेंद्र मोदी सरकार की यह अजीब नीति और विचित्र समझ है!
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