देश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी की आज वह स्थिति है, जो आजादी के बाद पांचवें और छठे दशक में कांग्रेस की थी। छठे दशक के आखिरी दिनों में कांग्रेस का किला दरकने लगे था और समाजवादी राजनीति करने वाली पार्टियों के साथ साथ भारतीय जनसंघ का भी असर दिखना शुरू हो गया था। कह सकते हैं कि आजादी के बाद दो दशक तक कांग्रेस की जो स्थिति थी, भाजपा आज उस स्थिति में है। केंद्र के साथ साथ वह लगभग पूरे देश में सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है। दक्षिण भारत को छोड़ दें तो देश के बाकी हिस्से में उसका वर्चस्व कायम हो गया है।
पश्चिम बंगाल की जीत ने पूर्वी और उत्तर पूर्वी भारत में भाजपा के वर्चस्व को बहुत मजबूती से स्थापित किया है। कहा नहीं जा सकता है कि यह संयोग है या भाजपा के प्रयोग का नतीजा है कि दो साल के अंदर पूर्वी भारत के तीनों बड़े राज्यों ओडिशा, बिहार और पश्चिम बंगाल में उसका मुख्यमंत्री बना है। ये तीनों राज्य भाजपा के लिए पहेली की तरह थे, जिसे आजादी के 75 साल बाद तक भारतीय जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी के नेता सुलझा नहीं सके थे। लेकिन वह पहेली दो साल में सुलझ गई। अब ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल के साथ असम में भाजपा का मुख्यमंत्री है।
यह भी संयोग है कि पश्चिम भारत के तीनों बड़े राज्यों राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र में भाजपा का अपना मुख्यमंत्री है। गुजरात में तो खैर पिछले 30 साल से भाजपा है और राजस्थान में भी वह काफी समय से जीतती और हारती रही थी। पश्चिम में विंध्य के पार का राज्य महाराष्ट्र उसके लिए पहेली था। शिव सेना के समर्थन से भाजपा को एक बार 1995 में सत्ता का सुख मिला था लेकिन उसके बाद 15 साल सत्ता का सूखा रहा। अब पिछले 12 साल से वहां भाजपा सत्ता में है। उसे 2024 में निर्णायक जीत मिली। वह अकेले दम पर बहुमत के करीब पहुंच गई।
ऐसे ही पहले भाजपा को उत्तर भारत की हिंदी पट्टी की पार्टी माना जाता था। लेकिन वहां भी भाजपा निर्णायक रूप से मजबूत नहीं थी। कहीं सहयोगियों के दम पर तो कहीं आधे अधूरे तरीके से उसकी सरकार बन रही थी। परंतु उत्तर प्रदेश में लगातार दो जीत के बाद भाजपा ने हिंदी पट्टी में भी निर्णायक वर्चस्व स्थापित किया है। झारखंड और हिमाचल प्रदेश छोड़ कर हिंदी पट्टी के हर राज्य में भाजपा का मुख्यमंत्री है। भाजपा के अखिल भारतीय वर्चस्व को इस बात से समझ सकते हैं कि उसने भाषायी अस्मिता और भाजपा की राजनीति से सांस्कृतिक भिन्नता वाले राज्यों में भी जीतना शुरू कर दिया है।
इसकी शुरुआत गुजरात से हुई थी, जो बाद में कर्नाटक पहुंची और अब पश्चिम बंगाल में भी भाजपा जीती है। हालांकि दक्षिण का दुर्ग तब तक टूटा नहीं माना जाएगा, जब तक भाजपा तमिलनाडु में नहीं जीतती है। उसे छोड कर बाकी सारे दुर्ग भाजपा ने तोड़ दिए हैं। दक्षिण के अलावा भाषायी अस्मिता वाले राज्यों में एक पंजाब है, जहां अगले साल चुनाव होने वाले हैं। वहां भी भाजपा ने बिसात बिछानी शुरू कर दी है। नतीजा पता नहीं है क्या होगा लेकिन भाजपा ने यह दिखाया है कि परिस्थितियां अनुकूल नहीं होने के नाम पर वह पंजाब को छोड़ने वाली नहीं है।
सो, उत्तर से लेकर पूरब और पश्चिम तक भाजपा ने अपना वर्चस्व स्थापित किया है? अब सवाल है कि क्या उसका यह वर्चस्व इसी तरह कायम रहेगा या चरम पर पहुंचने के बाद इसमें गिरावट आएगी? यह प्रकृति का नियम है कि जिसका उत्थान होता है उसका पतन भी होता है। तभी यह भी कहा जाता है कि शीर्ष पर पहुंचना आसान है, वहां लंबे समय तक बने रहना मुश्किल होता है। भाजपा शीर्ष पर पहुंच गई है वहां कितने समय तक बनी रहती है यह देखने वाली बात होगी। भाजपा कितने समय तक शीर्ष पर बनी रहेगी यह दो बातें पर निर्भर करेगा। पहला, अपने पतन का कारण वह स्वंय बनती है या कोई वैकल्पिक राजनीतिक ताकत उभरती है, जिसकी वजह से भाजपा का पराभव शुरू होता है। हालांकि यह अभी तत्काल नहीं होने जा रहा है।
भाजपा अगले कई दशक तक भारतीय राजनीति की केंद्रीय ताकत बनी रहने वाली है। जैसे आजादी के बाद राज्यों में कांग्रेस के हारने का सिलसिला 1967 में और केंद्र में हारने का सिलसिला 1977 में शुरू हुआ था लेकिन वह उसके बाद भी कई दशक तक भारतीय राजनीति की केंद्रीय ताकत बनी रही थी।
असल में भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी राजनीति को इस कदर साध लिया है कि उसे हराना नामुमकिन होता जा रहा है। एक समय राजनीति को क्रिकेट के बाद सबसे ज्यादा अनिश्चितता का खेल माना जाता था। बहुत दिलचस्प है कि एक समय ऑस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीम ने क्रिकेट की अनिश्चितता को समाप्त कर दिया था। वह टीम इतनी मजबूत हो गई थी कि जब वह खेलने उतरती थी तो माना जाता था कि वही जीतेगी। अगर वह हारती भी थी तो उसे अपवाद की तरह देखा जाता था। क्रिकेट में जुनून की हद तक रूचि रखने वाले हिंदी के विलक्षण पत्रकार प्रभाष जोशी ऑस्ट्रेलिया के इस वर्चस्व की बड़ी आलोचना करते थे।
उनका कहना था कि ऑस्ट्रेलिया ने क्रिकेट की सिर्फ अनिश्चितता को खत्म नहीं किया है, बल्कि इसके सौंदर्य को भी समाप्त कर दिया है। वे मानते थे कि ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी आते हैं और उसी तरह से खेल को आगे बढ़ाते हैं, जैसे कोई राजमिस्त्री किसी इमारत की तामीर करता है। जिस तरह नब्बे के दशक के आखिरी दिनों से लेकर नई सदी के पहले दशक के शुरुआती दिन तक की ऑस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीम ने खेल के रोमांच, उसकी रोचकता, अनिश्चितता और सौंदर्य को समाप्त कर दिया था उसी तरह भाजपा ने देश की राजनीति से इन तत्वों को समाप्त कर दिया है।
भाजपा चुनाव लड़ने उतरती है तो माना जाता है कि वह जीतेगी। अगर वह हारती है तो उसे एक अपवाद के तौर पर देखा जाता है। ऐसा लग रहा है कि भाजपा ने चुनाव जीतने का ऐसा फॉर्मूला हासिल कर लिया है, जिसकी काट किसी के पास नहीं है। जैसे कोई सधा हुआ राजमिस्त्री इमारत की तामीर करता है वैसे ही भाजपा ईंट पर ईंट जोड़ते हुए जीत की तामीर करती है। कांग्रेस अपने वर्चस्व के दिनों में भी ऐसा नहीं करती थी। उसकी किसी बड़ी रणनीति से जीत हासिल नहीं होती थी।
कांग्रेस की जीत व्यापक रूप से आजादी की लड़ाई की विरासत, मजबूत विकल्प की अनुपलब्धता और नेताओं के करिश्मे की वजह से होती थी। भाजपा के पास इनमें से सिर्फ एक चीज है नरेंद्र मोदी का करिश्मा। बाकी चीजें उसने खुद विकसित की है। उसने चुनाव लड़ने की विधा को साधा है। नेतृत्व के करिश्मे के साथ साथ उसने संगठन और संसाधन के मामले में अपने को इतना मजबूत किया है उसे हराना नामुमकिन की हद तक मुश्किल हो गया है। कांग्रेस के पास जैसे आजादी की विरासत थी और उसका नैरेटिव था, उसकी जगह भाजपा ने अपना वैकल्पिक विचार प्रस्तुत किया है।
कांग्रेस के आइडिया ऑफ इंडिया के बरक्स उसने अपना आइडिया प्रस्तुत किया है। उसके गुणदोष पर अलग अलग राय हो सकती है लेकिन अभी वह आइडिया भारत के लोग स्वीकार कर रहे हैं। इससे समाज में एक विभाजन बन रहा है, सामाजिक स्तर पर एक ऐसी फॉल्टलाइन क्रिएट हो रही है, जो आगे चल कर देश के लिए खतरा बन सकती है। लेकिन अभी उसका राजनीतिक लाभ भाजपा को मिल रहा है। जिस तरह से पश्चिम बंगाल और असम में जनसंख्या संरचना के आधार पर 70 बनाम 30 की राजनीति हुई और उत्तर प्रदेश में 80 बनाम 20 की राजनीति का बिगुल बज चुका है वैसे ही देश के स्तर पर 80 बनाम 20 का मुद्दा बनना अभी बाकी है। सो, कह सकते हैं कि भाजपा की राजनीति का चरम अभी आना बाकी है, इसलिए अभी तत्काल तो ढलान शुरू होने के आसार नहीं हैं।


