nayaindia भारी बारिश और आपदा: देश की चेतावनी
अजीत द्विवेदी

आपदा से सबक नहीं लेती हैं सरकारें

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आपदा

देश में भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन से तबाही मची है। उत्तर भारत के सात राज्यों में 48 घंटे के भीतर 56 लोगों की मौत हो गई। सैकड़ों घर टूटे हैं, गाड़ियां नदियों में बह गई हैं और हजारों लोग विस्थापित हुए हैं। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब की नदियां उफान पर हैं और राजधानी दिल्ली में बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। दिल्ली में बारिश का 41 साल का रिकॉर्ड टूटा है तो हिमाचल प्रदेश में 52 साल का रिकॉर्ड टूटा है। देश में मॉनसून के पूरे सीजन में जितनी बारिश होनी चाहिए उससे अधिक बारिश अभी तक हो चुकी।

हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में कई जगह बादल फटे हैं और भूस्खलन की घटना हुई है। देश के पहाड़ी और ग्रामीण इलाकों के साथ साथ राजधानी दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के शहरों- गुरुग्राम, फरीदाबाद, नोएडा, गाजियाबाद आदि में भी त्राहिमाम की स्थिति है। मिलेनियम सिटी गुरुग्राम में बारिश की वजह से इतना पानी जमा हो गया कि स्कूल बंद करने पड़े और लोगों से घर से ही काम करने को कहना पड़ा। भारत के सिलिकॉन वैली यानी बेंगलुरू में भारी बारिश से लोगों का जन-जीवन अस्त-व्यस्त हुआ।

सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है? जिससे भी यह सवाल पूछा जाता है उसका जवाब होता है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से इंसान मौसम का यह अतिरेक झेलने को अभिशप्त है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जलवायु परिवर्तन ने मौसम का पूरा चक्र बदल दिया है। अत्यधिक बारिश, अत्यधिक सर्दी और अत्यधिक गरमी अब सामान्य बात हो गई है। जलवायु परिवर्तन की घटना इतनी तेजी से हो रही है कि वैज्ञानिकों के सारे अनुमान फेल हो रहे हैं।

वैज्ञानिक इस दशक के अंत तक वैश्विक तापमान 17 डिग्री पहुंचने का अनुमान लगा रहे थे। लेकिन पिछले सोमवार यानी तीन जुलाई को वैश्विक तापमान औसतन 17 डिग्री से ऊपर चला गया। यह अभी रूकने वाला नहीं है। जैसे जैसे धरती गर्म होगी वैसे वैसे ग्लेशियर पिघलेंगे, समुद्र का स्तर बढ़ेगा और उसी अनुपात में सर्दी, गर्मी और बारिश बढ़ती जाएगी। तत्काल इसे रोकना इंसान के वश में नहीं दिख रहा है। इसके बावजूद मौसम के अतिरेक से पैदा होने वाली आपदा से निपटने के बेहतर उपाय किए जा सकते हैं। उससे जान-माल का नुकसान कम से कम हो यह सुनिश्चित किया जा सकता है। लेकिन अफसोस की बात है कि भारत में सरकारें हर साल आने वाली आपदा से कोई सबक नहीं सीखती हैं।

पिछले कोई दो दशक में शायद ही कोई साल होगा, जब मॉनसून के सीजन में देश के किसी न किसी हिस्से में कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा नहीं आई होगी। 26 जुलाई 2005 का मुंबई का जल प्रलय पिछले दो दशक की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में से एक है। दो दिन में भयंकर बारिश से देश की पूरी वित्तीय राजधानी अस्त-व्यस्त हो गई थी। मुंबई सहित महाराष्ट्र के कई हिस्से भारी बारिश और बाढ़ से प्रभावित हुए थे और कोई 11 सौ लोग मारे गए थे। इससे ठीक एक महीने पहले जून के महीने में समूचा गुजरात भारी बारिश और बाढ़ से प्रभावित हुआ था। इसके तीन साल बाद बिहार के कोशी में भयंकर बाढ़ आई थी, जिसमें ढाई सौ से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और लाखों लोग बेघर हुए थे।

करीब तीन लाख घर नष्ट हुए थे और साढ़े आठ लाख एकड़ में लगी फसल नष्ट हुई थी। ऐसे ही जून 2013 में उत्तराखंड के केदारनाथ में आई बाढ़ इस सदी की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में से एक है, जिसमें छह हजार के करीब लोग मारे गए थे और साढ़े चार हजार गांव तबाह हुए थे। सैकड़ों लोग बाढ़ में बह गए, जिनके शव का पता नहीं चला। मुंबई, कोशी और केदारनाथ ये तीन पिछले दो दशक की प्रतीक घटनाएं हैं, जिनकी स्मृतियां अब भी जीवित हैं।

इसके अलावा हर साल देश के किसी न किसी हिस्से में मॉनसून के समय अत्यधिक बारिश, बाढ़ और भूस्खलन की बड़ी घटनाएं होती हैं लेकिन ऐसा लगता है कि उसे मौसमी बीमारी की तरह की एक बीमारी मान कर जल्दी ही भुला दिया जाता है। लंबे समय में ऐसी घटनाओं के दोहराव की संभावना को देखते हुए बचाव के स्थायी उपाय नहीं किए जाते हैं।

भारत में सरकारें और आपदा से निपटने वाली संस्थाएं घरेलू और वैश्विक घटनाओं से कोई सबक नहीं लेती हैं। जापान की मिसाल सबके सामने है, जहां आए दिन भूकंप और सुनामी की घटनाएं होती हैं। लेकिन बड़े से बड़े भूकंप में भी वहां जान-माल का नुकसान न्यूनतम होता है और जन-जीवन सामान्य रूप से चलता रहता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि प्रकृति को समझते हुए वहां के शासकों ने बुनियादी ढांचे का ऐसा निर्माण किया है, जिसमें न्यूनतम नुकसान की संभावना रहे। भारत में इसका उलटा होता है।

भारत में प्राकृतिक आपदा की आशंका वाले क्षेत्र में भी अंधाधुंध निर्माण होता है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में इतनी पनबिजली की परियोजनाएं लगी हैं, दवा की इतनी फैक्टरियां बनी हैं और पर्यटकों के लिए इतने रिसॉर्ट व होटल बने हैं कि समूचा पहाड़ खोखला हो गया है। जरा सी बारिश या बादल फटने की घटना होते ही पहाड़ दरकने लगते हैं। यह सिर्फ दो राज्यों की परिघटना नहीं है। हर पहाड़ी राज्य में विकास के नाम पर अंधाधुंध जंगल और पहाड़ काटे जा रहे हैं, जिसका खामियाजा हर साल आम लोगों को भुगतना पड़ता है।

जहां तक महानगरों और बड़े शहरों की बात है तो वहां दो कारणों से हर साल बारिश में बाढ़ के हालात बनते हैं और मॉनसून की बारिश लोगों के लिए आफत लेकर आती है। सबसे पहला कारण तो यह है कि महानगरों और शहरों को बेतरतीब तरीके से बढ़ने दिया गया है। अंधाधुंध शहरीकरण हुआ है और चारों तरफ कंक्रीट के जंगल उग आए हैं।

अवैध निर्माण बड़ी संख्या में हुआ है, जिससे इमारतें कमजोर हुई हैं और बारिश में उनके गिरने का खतरा बढ़ गया है। दूसरा कारण यह है कि किसी भी महानगर या बड़े-छोटे शहर में पानी के निकासी की अच्छी व्यवस्था नहीं हुई है। हर शहर पर आबादी का बोझ बढ़ा है और ड्रेनेज या सीवेज का सिस्टम वहीं पुराना है। शहरों के बीच या बगल से बहने वाली नदियां गाद से भरी हुई हैं। उनका तल ऊंचा हो गया है, जिससे जरा सी बारिश होते ही नदियां उफनने लगती हैं।

राजधानी दिल्ली के बीचों बीच बहने वाली यमुना की सफाई पर बरसों से काम हो रहा है, लेकिन पांच फीसदी भी यमुना साफ नहीं हुई है। दिल्ली सरकार ने 2011 में आईआईटी दिल्ली को एक ड्रेनेज सिस्टम का मास्टर प्लान बनाने को कहा था। सात साल के बाद 2018 में आईआईटी ने मास्टर प्लान दिया था और 2021 में उसे लागू किया गया लेकिन तत्काल ही रोक दिया गया क्योंकि उससे दिल्ली की समस्या का समाधान नहीं हो रहा था। बाद में 2022 में दिल्ली सरकार ने एक कॉम्प्रिहेंसिव ड्रेनेज मास्टर प्लान का टेंडर निकाला लेकिन उस पर कोई अच्छा रिस्पांस नहीं मिला है। सोचें, राष्ट्रीय राजधानी की यह स्थिति है कि पिछले 12 साल से ड्रेनेज सिस्टम का मास्टर प्लान बन रहा है? यही स्थिति गुरुग्राम से लेकर समूचे एनसीआर की है।

सो, पहाड़ी राज्यों से लेकर मैदानी राज्यों तक और महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक हर साल मॉनसून के सीजन में कोई न कोई प्राकृतिक आपदा आ रही है। इसे प्रकृति की चेतावनी समझना चाहिए और किसी बड़े खतरे से निपटने की तैयारी करनी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से सरकारें और आपदा प्रबंधन करने वाली एजेंसियां हर काम तात्कालिकता में करती हैं। वे लंबे समय की योजना नहीं बनाती हैं। यही कारण है कि बारिश होते ही जन-जीवन ठप्प हो जाता है।

सड़क परिवहन से लेकर ट्रेन और विमानन सेवाएं स्थगित हो जाती हैं। कहीं लोग बाढ़ में बह जाते हैं, कहीं उनके घर गिर जाते हैं, कहीं जल-जमाव में गाड़ी फंस जाती हैं, कहीं करंट लगने से लोग मरते हैं तो कहीं बिजली गिरने से लोगों की मौत होती है। यह सही है कि प्राकृतिक आपदा को रोका नहीं जा सकता है लेकिन आपदा से सबक लेकर उससे होने वाले नुकसान को न्यूनतम करने के उपाय जरूर किए जा सकते हैं।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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