nayaindia महुआ मोइत्रा: आरोप, संसद, और विश्वास का संघर्ष
अजीत द्विवेदी

महुआ ने विपक्ष का बड़ा नुकसान किया!

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यह हर बार समय की कसौटी पर हर बार खरा उतरने वाला डायलॉग है, जिसे ‘वक्त’ फिल्म में अभिनेता राजकुमार ने रहमान के सामने बोला था- शीशे के घरों में रहने वाले दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते चिनॉय सेठ! महुआ मोइत्रा के मामले में ऐसा ही कुछ दिख रहा है। हालांकि अभी संसद की अनुशासन समिति को इस पर मामले में सुनवाई करनी है और संभव है कि सीबीआई और ईडी भी दूसरे कई पहलुओं की जांच करें। लेकिन जिस तरह की बातें सामने आ रही हैं उससे संदेह गहरा हो रहा है।

महुआ मोइत्रा चौतरफा घिरी हैं। उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने भी उनका साथ छोड़ दिया है। पार्टी ने कहा है कि संसदीय समिति की सुनवाई के बाद वह कोई कदम उठाएगी। यह अपने आप में इस बात का संकेत है कि महुआ के ऊपर जो आरोप लगे हैं उन्हें तृणमूल कांग्रेस के बचाव के लायक नहीं मान रही है। अन्यथा जो पार्टी शिक्षक भर्ती घोटाले, पशु तस्करी मामले और चिटफंड मामले में आरोपी बनाए गए अपने दर्जन भर नेताओं का बचाव कर रही है और उनके लिए लड़ रही है वह भाजपा और गौतम अडानी से लड़ने का मौका कैसे छोड़ देती?

महुआ मोइत्रा का आरोप है कि वे अडानी समूह के खिलाफ आवाज उठा रही हैं इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई हो रही है। उन्होंने हिंडनबर्ग रिपोर्ट के समय भी और बाद में कोयला आयात में कथित गड़बड़ियों पर आई ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ की रिपोर्ट के बाद अडानी समूह पर हमला बोला। उन्होंने कोयला आयात मामले में अडानी समूह पर 13 हजार करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप लगाया है। इसी मामले में यानी कोयला आयात मामले में ही कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 32 हजार करोड़ रुपए की गड़बड़ी का आरोप लगाया है। यह दिलचस्प बात है कि राहुल गांधी भी कहते हैं कि अन्होंने अडानी समूह के खिलाफ संसद में बोला तो उनकी सदस्यता खत्म कर दी गई।

हो सकता है कि अडानी समूह पर हमला करने वालों के खिलाफ सरकार सख्त हो क्योंकि अगर अडानी समूह का कोई भी घोटाला पकड़ा जाता है या उसके सबूत सामने आते हैं या घोटाला प्रमाणित होता है तो उससे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की बुनियाद हिल जाएगी। आखिर नरेंद्र मोदी की राजनीति की बुनियाद ही भ्रष्टाचार विरोध की राजनीति पर टिकी है। लेकिन यह भी सवाल है क्या सरकार सख्त होकर किसी सांसद को किसी झूठे मामले में फंसा देगी? दूसरा सवाल यह भी है कि क्या आरोप लगाने वालों को पता नहीं है कि इस मामले में सरकार सख्ती करेगी और इसलिए उनको खुद सौ फीसदी ईमानदार रहना चाहिए? यह भी एक पुरानी कहावत है कि पहला पत्थर वह मारे, जिसने खुद कभी कोई गलत काम नहीं किया हो!

तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा के मामले में यही सवाल मुख्य है कि क्या सरकार उनको जान-बूझकर फंसा रही है या उन्होंने गलती की है? ध्यान रहे विपक्षी पार्टियों की ओर से नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर लगाए जाने वाले आरोप इसलिए व्यापक समाज में स्वीकृत नहीं होते हैं क्योंकि आरोप लगाने वालों की विश्वसनीयता संदिग्ध होती है। भारतीय राजनीति के एकाध नेताओं को छोड़ दें तो लगभग सारे नेता और लगभग सारी पार्टियां नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय क्षितिज पर आकर राजनीति करने के पहले से भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हैं।

आरोप कितने सही हैं या कितने गलत यह बहस का विषय हो सकता है लेकिन यह सही है कि पार्टियों पर गंभीर आरोप लगे हैं और वो आरोप मोदी और शाह के पहले के हैं। कांग्रेस के ऊपर दर्जनों आरोप मोदी-शाह के आने से पहले लग गए थे। इन दोनों ने तो प्रचार के जरिए लोगों के जेहन में उन आरोपों को जिंदा रखा है ताकि कांग्रेस नेताओं की ओर से लगाए जाने वाले किसी भी आरोप की विश्वसनीयता को पहले ही खत्म किया जा सके।

यही बात लगभग सभी प्रादेशिक पार्टियों के मामले में है। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के ऊपर चिटफंड घोटाले का आरोप केंद्र में मोदी की सरकार बनने से पहले लगा था। राजद नेताओं पर चारा घोटाले का आरोप, जेएमएम नेताओं पर रिश्वत का आरोप, बसपा पर ताज कॉरिडोर, सपा पर आय से अधिक संपत्ति, डीएमके पर 2जी व एयरसेल-मैक्सिस, एनसीपी पर सिंचाई, अन्ना डीएमके व वाईएसआर कांग्रेस पर आय से अधिक संपत्ति के आरोप 2014 से पहले और बहुत पहले के हैं।

यह जरूर है कि मोदी और शाह की सरकार बनने के बाद इन पार्टियों के ऊपर कुछ नए आरोप लगे या कुछ पार्टियों को आरोपों से राहत मिली लेकिन कमोबेश जनता की नजर में सबकी विश्वसनीयता संदिग्ध है और यही कारण है कि इनके आरोप नरेंद्र मोदी के ऊपर चस्पां नहीं होते हैं। कह सकते हैं कि मोदी सरकार ने मीडिया को काबू में कर रखा है, केंद्रीय एजेंसियां पिंजरे में बंद तोता हो गई हैं, संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका कम कर दी गई है, गैर सरकारी संगठनों पर शिकंजा कस दिया गया है, विरोध की हर आवाज दबा दी जाती है आदि आदि। इसके बावजूद अगर आरोप लगाने वालों की ईमानदारी असंदिग्ध होती तो निश्चित रूप से जनता को उस पर यकीन होता।

ऐसा लग रहा था कि महुआ मोइत्रा भारतीय संसद में हवा के एक ताजा झोंके की तरह आई हैं। वे जिस अंदाज में संसद के अंदर भाषण देती थीं। जैसे उन्होंने भाजपा की सरकार को फासिस्ट ठहराने वाला भाषण दिया या गौतम अडानी के मामले में जितने आक्रामक अंदाज में तथ्यों के साथ आरोप लगाए या आरटीआई वगैरह के दस्तावेजों के आधार पर जिस तरह से भाजपा के सबसे मुखर सांसदों में से एक निशिकांत दुबे पर आरोप लगाए, उससे लोगों में एक भरोसा बना था। लेकिन अब वह भरोसा टूटता दिख रहा है।

उन पर लगे आरोपों से लग रहा है कि वे खुद शीशे के घर में रहती हैं और दूसरों पर पत्थर फेंक रही थीं। उन्होंने इस बुनियादी सिद्धांत का पालन नहीं किया कि दूसरों को बेईमान ठहराने से पहले खुद शत प्रतिशत ईमानदार होना होता है। आम लोग किसी भी व्यक्ति का आकलन उसके निजी आचरण से करते हैं। ध्यान रहे 2011 में अगर भाजपा के नेता कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते तो वह उतना कारगर नहीं होता, जितना अन्ना हजारे के लगाने से हुआ। अन्ना हजारे पर चाहे जितने तरह के आरोप लगें लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि वे पैसे-रुपए के मामले में बेईमान थे। तभी लोगों ने उन पर यकीन किया और कांग्रेस सहित उसकी तमाम सहयोगी पार्टियों को सबक सिखाया।

यहां महुआ मोइत्रा संदेह से परे नहीं दिख रही हैं। उनके ऊपर आरोप लगे हैं कि उन्होंने अडानी समूह के खिलाफ हमला करने के लिए हीरानंदानी समूह से नकद पैसे और महंगे उपहार लिए। दर्शन हीरानंदानी ने संसद की अनुशासन समिति को लिख कर दिया है कि महुआ ने पैसे मांगे, महंगे उपहार मांगे, उनके पैसे से विदेश यात्राएं कीं और हीरानंदानी समूह ने उनके सरकारी आवास की साज-सज्जा पर खर्च किया। बदले में महुआ ने उनके हिसाब से संसद में सवाल पूछे।

यहां तक कि लोकसभा की वेबसाइट का अपना लॉगिन और पासवर्ड भी हीरानंदानी को दिया, जिसके बारे में अब खबर आ रही है कि महुआ जब दिल्ली में थीं तब दुबई में उनके लॉगिन और पासवर्ड का इस्तेमाल करके लोकसभा की वेबसाइट एक्सेस की गई। तकनीकी रूप से यह किसी व्यक्ति की जानकारी के बगैर भी संभव है लेकिन उसके लिए सिस्टम को हैक करना होता है। महुआ मोइत्रा ने सिस्टम हैक होने या पासवर्ड चोरी होने की शिकायत नहीं की है। जब उनके लॉगिन की जांच की मांग की गई तब भी उन्होंने किसी और को पासवर्ड दिए होने से इनकार नहीं किया, बल्कि यह कहा कि बाकी सभी सांसदों के लॉगिन की भी जांच की जाए। इससे अंदाजा लगता है कि उनको पता है कि उनके लॉगिन का इस्तेमाल दूसरे लोगों ने किया है।

अगर महुआ मोइत्रा पर लगे आरोप प्रमाणित होते हैं तो उनकी सदस्यता जाएगी और आपराधिक कार्रवाई होगी वह उनका निजी मामला होगा लेकिन इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार और अडानी समूह के संबंधों को लेकर क्रोनी कैपिटलिज्म के जो आरोप लगाए जा रहे हैं और विपक्ष जो अभियान चला रहा है उसको बड़ा झटका लगेगा।

सरकार और अडानी समूह को यह धारणा बनाने में आसानी हो जाएगी कि उनके खिलाफ दूसरे कारोबारियों के इशारे पर विपक्ष अभियान चला रहा है। इससे समूचा विपक्ष बदनाम होगा और विपक्ष की पूरी लड़ाई कमजोर होगी। इससे यह भी प्रमाणित होगा कि कॉरपोरेट में नौकरी करने, विदेश में पढ़े होने, अच्छी अंग्रेजी बोलने की बजाय राजनीतिक प्रशिक्षण ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। अचानक अपने वक्तृता के दम पर बड़ा नेता बन जाने की चाह में महुआ मोइत्रा ने विपक्ष का बड़ा नुकसान किया दिखता है।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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