nayaindia दशक के आगे बढ़ती व्यवस्था: समाज की अभिशाप्त नियति
पंकज शर्मा

कलूटाक्षरों में लिखे जाने वाले इतिहास का दशक

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समाज

सब होते हुए टुकुर-टुकुर देखते रहने में ही अगर हमें सुख मिलता है तो फिर एक दशक से चल रही व्यवस्था ही आगे भी हमारी नियति है। अगर हम अपनी आंखें मसलने को तैयार नहीं हैं तो आने वाले कई दशक ऐसे ही नतमस्तक बने रहने को हम अभिशप्त हैं। ऐसे में ‘परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्’ भी आसमान से उतर कर हमारे प्रारब्ध को बदलने में बुरी तरह हांफ जाएंगे। सो, ख़ुद के हाथ-पैर हिलाने को जो समाज तैयार नहीं हो, उसकी दरकती काया का भला चरक ऋषि भी कहां से पुनरुद्धार कर देंगे?

किसी और एक दशक में आपने भारत के प्रधानमंत्री को इतने खिलंदड़ी करतब करते नहीं देखा होगा। किसी और एक दशक में आपने समूची मंत्रिपरिषद के चेहरे पर इतने असहाय-भाव नहीं देखे होंगे। किसी और एक दशक में आपने विधायिका के सत्तासीन धड़े को ऐसी जी-हुज़ूरी करते नहीे देखा होगा। किसी और एक दशक में आपने पूरी-की-पूरी कार्यपालिका को इस तरह हाथ बांधे खड़ा नहीं देख होगा। इसलिए भारत की राजनीति के इस दशक का किस्सा इतिहास के पन्नों पर कलूटाक्षरों में लिखा जाएगा।

बुनियादी बदलाव लाने के नाम पर पांच सौ और एक हज़ार रुपए के नोट रातोंरात बंद कर दिए गए। उनकी जगह पांच सौ और दो हज़ार रुपए के नए नोट जारी हुए। काले धन को ख़त्म करने की दलील धरी-की-धरी रह गई और हज़ार-पांच सौ के सारे नोट बैंकों में जमा हो गए। उन्हें बदलने में खुल कर कमीशनख़ोरी हुई। सात बरस बीतते-बीतते दो हज़ार रुपए के नोट चलन से बाहर करने का हुक़्म सुना दिया गया। फ़रमान आया कि नोट वैध रहेगा, मगर बाज़ार में चलेगा नहीं। किसी ने नहीं पूछा कि आख़िर यह कैसी कलाबाज़ी है? बताने वाले तो ज़ाहिर है कि बताने को तैयार नहीं हैं कि ऐसा करने के पीछे क्या वज़ह है, मगर पूछने वाले भी नहीं पूछ रहे हैं कि कौन-से सबूत मिटाने के लिए यह गोरखधंधा हो रहा है?

कोरोना का विषाणु भगाने के लिए हम ताली-थाली बजाते रहे और वैक्सीन निर्माताओं के विदेशों में आलीशान महल बन गए। लोग अपने बूढ़े माता-पिता और नन्हे बच्चों को कंधे पर लादे हज़ारों मील नंगे पांव भटकते रहे और अस्पताल माफ़िया मालामाल हो गया। पूरी अर्थव्यवस्था तबाह हो गई, मगर शेयर बाज़ार फलता-फूलता रहा। हम में से किसी ने नहीं पूछा कि अर्थशास्त्र के किस नियम के तहत यह चमत्कार होता है कि सरकार की फ़ाइलों में तरक़्की के आंकड़ों का मोटापा बढ़ता जाए और सड़कों पर बेरोज़गारों की कतार भी लंबी होती जाए। हमें रोज़मर्रा के जीवन-यापन की तंग गलियों में ही उलझा कर रख दिया गया और धनपशुओं का राजमार्ग चौड़ा होता चला गया।

तीन साल पहले किसान-विरोधी और धनपशुओं की हिमायत करने वाले तीन क़ानूनों का विरोध करते हुए हज़ारों किसान सर्दी, गर्मी और बारिश में खुले आसमान के नीचे सड़कों पर पड़े रहे। क्या किसी और दशक में आपने इतनी संवेदनहीन और  अड़ियल शासन व्यवस्था देखी थी कि सैकड़ों किसान मर जाएं और वह कतई न पसीजे? जब देस-परदेस पूरी तरह किसानों के पक्ष में खड़े हो गए, तब हमारे प्रधानमंत्री जी ने मन मार कर वे क़ानून वापस लिए। मगर क्या किसानों की बाकी मांगें पूरी हो गईं? हम ने हर हाल में जीना सीख लिया है। यही हमारी सबसे बड़ी मुसीबत है।

प्रधानमंत्री जी के आवास तक जाने वाली सड़क का नाम बदल कर लोक कल्याण मार्ग रखे इस महीने की 21 तारीख़ को सात साल पूरे हो रहे हैं और आप देख ही रहे हैं कि देश में लोक कल्याण की एक ऐसी बयार बह रही है कि थामे नहीं थम रही। एक बरस पहले जब से राजपथ को कर्तव्यपथ का नाम दिया गया है, पूरा देश कर्तव्यबोध और कर्तव्यपरायणता के सुखद महासागर में गोते लगा रहा है। पाच साल पहले तीन मूर्ति चौक का नाम हाइफ़ा चौक रख दिया गया था। तब से हमारे पूरे मुल्क़ के रोंगटे इज़राइल में हाइफ़ा पर कब्जे के लिए हुए युद्ध के रोमांच से ऐसे खड़े हो गए हैं कि बैठने का नाम ही नहीं ले रहे हैं।

नौ साल में देश के 19 शहरों के नाम बदल दिए गए और देखते-ही-देखते वहां के संस्कारों से पवित्रता की ऐसी ख़ुशबू आने लगी है कि चार हज़ार रुपए प्रति बूंद की कीमत वाला दुनिया का सबसे महंगा शुमुख परफ़्यूम भी लजाता फिर रहा है। अभी तो जब अहमदाबाद का नाम कर्नावती और हैदराबाद का नाम भाग्यनगर हो जाएगा, तब देखना कि हमारा नसीब कैसी अंगड़ाई लेता है।

तब आपके भीतर से यह पाप-बोध हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगा कि कहां भारत में जन्म ले लिया? भारत-बोध की आपकी भावना को उत्तुंग शिखर तक पहुंचाने के संकल्प ने ही अब हमें ‘प्रेसिडेंट ऑफ़ भारत’ और ‘प्राइम मिनिस्टर ऑफ़ भारत’ के नए शीर्षकों का तोहफ़ा दिया है। जो फुकरे सोच रहे हैं कि विपक्ष के ‘इंडिया समूह’ से डर कर हमारे प्रधानमंत्री जी ने यह क़दम उठाया है, वे नादान इस संपूर्ण उपक्रम का मर्म जानते ही नहीं हैं। अपनी वैचारिक स्थूलता के चलते वे प्रधानमंत्री जी की नई सोच के पीछे की बारीकी समझ ही नहीं रहे हैं।

सब होते हुए टुकुर-टुकुर देखते रहने में ही अगर हमें सुख मिलता है तो फिर एक दशक से चल रही व्यवस्था ही आगे भी हमारी नियति है। अगर हम अपनी आंखें मसलने को तैयार नहीं हैं तो आने वाले कई दशक ऐसे ही नतमस्तक बने रहने को हम अभिशप्त हैं। ऐसे में ‘परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्’ भी आसमान से उतर कर हमारे प्रारब्ध को बदलने में बुरी तरह हांफ जाएंगे। सो, ख़ुद के हाथ-पैर हिलाने को जो समाज तैयार नहीं हो, उसकी दरकती काया का भला चरक ऋषि भी कहां से पुनरुद्धार कर देंगे?

छोटे परदे के सायंकालीन भोंपुओं ने समूचे बुनियादी विमर्श को बहुरूपिया बनाने का जैसा ठेका एक दशक से ले रखा है, क्या किसी और एक दशक में ऐसा होते आपने देखा था? अख़बारों के पन्नों पर पसरे अक्षर क्या आपको इस तरह पहले कभी मुंह चिढ़ाते थे? क्या सूचनाओं के सशस्त्रीकरण के ऐसे बर्छीले दौर से आप पहले कभी गुज़रे थे? क्या नक्कालों की नक्काशी के ऐसे माहौल से पहले कभी आपका साबका पड़ा था? और, इस सब की आंशिक-सी आहट मिलते ही क्या आप पहले कभी इसी तरह चुप्पी साधे बैठे रह पाते थे? तो फिर क्या आपको यह बात नहीं सालती कि इस एक दशक में आपका रक्त-बीज ऐसा बांझ क्यों हो गया है?

यह बट्ठरपन आपको अपनी अंतिम क्रिया के नज़दीक ले जा रहा है। आपको नहीं समझना है तो मत समझिए। आपका शवासन एकाध नहीं, कई-कई पीढ़ियों का भविष्य बर्बाद कर रहा है। इस पाप की गठरी ले कर आपको चित्रगुप्त के दरबार में पहुंचना है तो ज़रूर पहुंचिए। लेकिन एक बात गांठ से बांध लीजिए कि अतीत के शिलालेख जब कभी खुदाई में बाहर निकलते हैं तो सदियों बाद भी उन पर लिखे हर्फ़ पढ़े जाते हैं। और, एक बात और, कि शिलालेखों पर हमेशा कसीदे ही नहीं लिखे जाते हैं। कभी-कभी उन पर पतनगाथाएं भी बहुत गहरे उकेरी जाती हैं।

सो, आप तय करिए कि आप कैसे पुरखों की तरह याद किए जाएंगे। तय कीजिए कि आने वाली संतानें अप पर गर्व करेंगी या आपका ज़िक्र आने पर अपनी आंखें शर्म से झुका लिया करेगी? बहुतेरे आए, बहुतेरे गए। यादें सबकी क़ायम हैं। उनकी भी जिन्होंने चीरहरण किया, उनकी भी जो चुपचाप ऐसा होते देखते रहे और उनकी भी जिन्होंने धर्म और कर्तव्यपालन के राज की पुनर्रचना में अपनी भूमिका निभाई। आपकी करनी, आपको मुबारक!

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स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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