nayaindia नरेंद्र भाई: दस साल, दर्द, और दौर-ए-वफा की कहानी
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फुद्दू प्रजा का ओजस्वी राजा

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नरेंद्र भाई

मैं तो नरेंद्र भाई का मुरीद हूं कि दस साल में उन्होंने हमें कभी होश में नहीं आने दिया। वे जानते थे कि उन के दिए दर्द ऐसे हैं कि होश-हवास में कोई उन्हें बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। इसलिए बेसुध बनाए रखने के लिए वे एकदम सही अंतराल पर अपनी दवा की पुड़िया हमें देते रहे।एक गीत था – ‘खाली से मत नफ़रत करना, खाली सब संसार’अपने स्कूली दिनों में सुना यह गाना मुझे इसलिए याद आया कि हम ने पिछला एक दशक इसी गारंटी के भरोसे बिताया है – खाली की गारंटी। प्रजा के लिए सिर्फ़ यही एक गारंटी है।

अगले साल जेठ का महीना लगने के बाद आने वाली शनि जयंती के आसपास अगर नरेंद्र भाई मोदी तीसरी बार रथारूढ़ नहीं हो पाए तो, आप करें, न करें, मैं तो उन का अभाव सचमुच बहुत शिद्दत से महसूस करूंगा। अगर वे विदा हो गए तो मैं यह सोच-सोच कर ही घुलता रहूंगा कि पूरे एक दशक हमें अपनी ‘गिली गिली गाला’ में उलझाए रखने वाला ऐसा अजब-ग़ज़ब प्रधानमंत्री अब पता नहीं देश को कब मिलेगा?

ठीक है कि नरेंद्र भाई ऐसे नसीब वाले हैं कि उन्हें ‘दूसरो न कोई’ का जाप करती रहने वाली इतनी फुद्दू प्रजा मिल गई, मगर हमीं कौन-से अभागे हैं? हमें भी तो पूरे दस बरस खेल-तमाशा दिखा-दिखा कर हमारा दिल बहलाते रहने वाला, हमें मीठी तंद्रा में डुबोए रखने वाला, एक प्रधानमंत्री मिला। वरना इस दौरान प्रजा पर जो-जो बीती है, क्या नरेंद्र भाई की मुहैया कराई अफ़ीम चाटे बिना प्रजा झेल पाती?

सो, मैं तो नरेंद्र भाई का मुरीद हूं कि दस साल में उन्होंने हमें कभी होश में नहीं आने दिया। वे जानते थे कि उन के दिए दर्द ऐसे हैं कि होश-हवास में कोई उन्हें बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। इसलिए बेसुध बनाए रखने के लिए वे एकदम सही अंतराल पर अपनी दवा की पुड़िया हमें देते रहे। दर्द से मुक्ति दिलाना भले ही इसलिए उनके वश में नहीं था कि अपनी नीम-हक़ीमी के चलते ये दर्द दिए हुए ही उन्हीं के थे, लेकिन एक ऐसे चिकित्सक के नाते वे हमारी तारीफ़ के हक़दार हैं, जिसने अपने मरीज़ों को दर्द का बोध नहीं होने देने के लिए हर तरह के तिलिस्म गढ़ने में दस साल कोई कसर बाकी नहीं रखी। अपना सारा ध्यान और देश के सारे संसाधन, बिना एक दिन की छुट्टी लिए, इसी की उठापटक में झौंक दिए।

इस चक्कर में सामाजिक ताना-बाना भुरभुरा गया तो भुरभुरा गया, अर्थव्यवस्था चूर-चूर हो गई तो हो गई, अस्सी करोड़ आबादी हाथ-पसारू बन गई तो बन गई; मगर एक बार की नाकामी के बावजूद हमारा चंद्रयान तो चांद पर उतर गया न! अपने शहरी ग़रीब-गुरबों को परदे की आड़ में ठेल कर हम ने जी-20 की आलीशान मेज़बानी का मज़ा तो ले लिया न!

अब की बार-ट्रंप सरकार का नारा बुलंद कर हम विश्वगुरू तो बन गए न! दस साल के भीतर-भीतर इतना जीवनोदक उलीच कर अपनी प्रजा को अमृत-काल में ला कर खड़ा कर देने वाला ऐसा सामर्थ्यवान, ऐसा ओजस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई के आने के पहले 67 साल में तो कोई हुआ नहीं था। फिर भी जिन्हें उन्हें पनौती-वनौती कहना है, कहते रहें। मैं तो उन्हें भारतमाता का शुभंकर मानने के लिए ही जन्मा हूं और जीते-जी उन्हें ‘मंगल भवन अमंगलहारी’ मानते रहने को ही शापित हूं।

एक थे पन्नालाल माहेश्वरी। हमारे नरेंद्र भाई के बालिग होने वाले साल, यानी 1968, में, उन की बनाई एक फ़िल्म रिलीज़ हुई थी – नीलकमल। ख़ूब चली थी। उस फ़िल्म में सारे वेद-उपनिषदों के निचोड़ से हमें फ़िल्मी अंदाज़ में परिचित कराने वाला एक गीत था – ‘खाली से मत नफ़रत करना, खाली सब संसार’। संसार और जीवन की व्यर्थता बोध के भारतीय दर्शन को अपना शीर्ष-वाक्य बना कर लिखा गया यह गीत साहिर लुधियानवी की देन था और मन्ना डे ने उसे अपनी रूहानी आवाज़ में गाया था।

मैं आज भी सोचता हूं कि साहिर, मन्ना डे और संगीतकार रवि के समन्वय से उपजी इस रचना को मसखरे अभिनेता महमूद पर क्यों फ़िल्माया गया था? शायद इसलिए कि पूरा गीत ‘खाली डिब्बा, खाली बोतल, ले-ले मेरे यार’ और ‘खाली की गारंटी दूंगा, भरे हुए की क्या गारंटी’ जैसे खिलंदड़े व्यंग्य से सराबोर था। अपने स्कूली दिनों में सुना यह गाना मुझे इसलिए याद आया कि हम ने पिछला एक दशक इसी गारंटी के भरोसे बिताया है – खाली की गारंटी। प्रजा के लिए सिर्फ़ यही एक गारंटी है।

मगर नरेंद्र भाई इतने नाशुक्रे भी नहीं हैं। जितनी मेरी समझ है, मैं ने तो दुनिया में ऐसा यारबाज़ प्रधानमंत्री कभी देखा ही नहीं। अगर आप उन के साथ हैं तो आप के सौ खून माफ़ हैं। अगर उन्होंने आप को अपना यार मान लिया तो फिर भरे हुए की भरपूर गारंटी आप के लिए हाज़िर है। एक मिसाल बताइए, जब नरेंद्र भाई ने अपने किसी हमजोली पर कोई भी आंच आने दी हो। महिला पहलवानों को रोना है, रोती रहें, ब्रजभूषण सिंह महफ़ूज़ रहेंगे। मन से माफ़ भले न कर पाएं, मगर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की ठकुरास सलामत रहेगी।

मणिपुर जल-जल कर भस्म होता है तो हो जाए, एन. बीरेन सिंह ही मुख्यमंत्री बने रहेंगे। और-तो-और, प्रधानमंत्री कार्यालय के नकली अफसर बन कर धंधेबाज़ी करने वालों तक का कुछ नहीं होगा। ऐसे में मंत्री-पुत्र के वीडियो और एक ख़ास उद्योग समूह के देश की संपत्ति पर होते जा रहे एकाधिकार पर जिन्हें जंगल-विलाप करना है, करते रहें। यारबाज़ी की इस अदा पर कायल होना अगर आप को नहीं आता है तो यह आप की बदनसीबी है।

यह तो आज नरेंद्र भाई प्रधानमंत्री हैं तो आप को उन की क़द्र नहीं है। उन के होने का असली अर्थ तो आप उस दिन समझेंगे, जब वे प्रधानमंत्री नहीं होंगे। परिधान तो दिन में तीन बार वे तब भी बदलेंगे, मगर तब आप को उन की रंगबिरंगी छटाओं में वह आनंद नहीं आएगा। राडार, मौसम और वायुयान की अपनी विशेषज्ञता से ले कर मथुरा में मीराबाई के भजनों पर अपने आख्यान वे तब भी देंगे, मगर उन में ऐसा मज़ा आप को तब नहीं आएगा।

‘मित्रों’ से शुरू कर के ‘मेरे बहनों-भाइयों’ और ‘मेरे प्यारे देशवासियों’ से होते हुए ‘मेरे परिवारजनों’ तक की पुनर्यात्रा शायद वे तब भी करेंगे, लेकिन उस का ऐसा लुत्फ़ आप तब नहीं उठा पाएंगे। इसलिए मैं तो अपने मुल्क़ के प्रधानमंत्री के सिंहासन को नरेंद्र भाई विहीन हो जाने की कल्पना से ही सिहर-सिहर उठता हूं। वे जो भी हैं, जैसे भी हैं, जो भी कर रहे हैं, जैसा भी कर रहे हैं, कम-से-कम अपनी प्रजा का दिल तो लगाए हुए हैं। वे नहीं होंगे तो प्रजा अपनी बोरियत कौन-सी बूटी के सेवन से दूर करेगी?

वक़्त नज़दीक आ रहा है। एक दिन हमारा समय हमारे सामने मुंह उठा कर खड़ा हो जाएगा। तब वह हम से हमारा फ़ैसला पूछेगा। हमारा फ़ैसला हमारी भावी नियति का फ़ैसला करेगा। हमारे सामने दो ही विकल्प होंगे। क़दमताल या लातमलात। क़दमताल का फ़ायदा है कि दर्द से भले नहीं, मगर दर्द के अहसास से छुटकारे के लिए ख़ुमारी का लिहाफ़ ओढ़ाने की गारंटी।

लातमलात का नुक़सान है कि कुछ वक़्त के लिए आत्मज्ञान के सदमे का सामना। क़दमताल का नुक़सान है कि भेड-चाल के गड्ढे की अंतिम मंज़िल तक पंहुचने की गारंटी। लातमलात का फ़ायदा है कि पुनर्जन्म का अवलंब। चुनना हमें है। जो चुनना है, आप-हम अपने लिए चुन लें। इतनी ज़रूर गांठ बांध लें कि जेठ का महीना आते-आते आप का चयन किस दिशा में हो, यह बताने के लिए आसमान से कोई उतर कर फ़िलहाल तो नहीं आ रहा है। इसलिए जो फ़ैसला करना है आप को अपने बूते, अपने भरोसे और अपने लिए करना है। बाकी आप की मर्ज़ी।

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By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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